UP Dalit Politics: रोहिणी घावरी की एंट्री से गरमाई दलित राजनीति, पश्चिमी यूपी की 21 सीटों पर टिकीं निगाहें

Rohini Gawari, UP Politics
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UP Dalit Politics: जून 2025 में सोशल मीडिया पर उस वक्त भूचाल आया जब स्विटजरलैंड में रहने वाली और वाल्मिकी समाज से आने वाले स्कॉलर रोहिणी घावरी ने यूपी के नगीना सांसद चंद्र शेखर आजाद पर धोखाध़ड़ी और यौन उत्पीड़न का संगीन आरोप लगाया था। रोहिणी घावरी, जिसे शायद तब तक चुनिंदा लोग ही जानते होंगे, वो रातो रात इंटरनेट संशेशन बन गई। आजाद के खिलाफ महिला आयोग में शिकायत तक दर्ज कराई गई.. और उसके बाद से लेकर आज तक रोहिणी घावरी एक ऐसा नाम बन चुका है जो न केवल आजाद की मुश्किलें बढ़ाने के लिए जानी जाती हौ, बल्कि वो उन्हें राजनीति से उखाड़ फैंकने के लिए भी कमर कस चुकी है.. 11 सितंबर को आखिरकार घावरी भारत की धरती पर कदम रख चुकी है..और जैसा कि उन्होंने आने से पहले ही कहा था कि वो आजाद को बर्बाद कर देंगी.. वो अपने रास्ते पर चल चुकी है। रोहिणी घावरी की एंट्री राजनीति में हो चुकी है..लेकिन सवाल ये है कि क्या वो आजाद के वोट बैंक को काट सकती है। अपने इस लेख में हम घावरी के उस मास्टरस्ट्रोक की बात कर करेंगे.. जिसके दम पर वो आजाद को मात देना चाहती है।

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यूपी की राजनीति में नए दलित चेहरे की एंट्री

रोहिणी घावरी, जो खुद वाल्मिकी समाज की बेटी कहती है,.. असल में उन पर अपने ही समाज के साथ धोखा करने का संगीन आरोप लगता है। पिछले कुछ समय से आजाद की लोकप्रियता कितनी बढ़ी, वो उनकी रैलियों को देख कर पता चलता है। आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में भी वो कड़ी टक्कर देने वाले है, तो वहीं घावरी भी अब सक्रिय राजनीति में उतर रही है। जिसमें उनका फोकस पश्चिमी यूपी के वो 21 विधानसभा सीटें जिसमें फिरोजाबाद, मेरठ कैंट, मेरठ शहर, गाजियाबाद, लोनी, सीसामऊ, आर्यनगर, किदवईनगर, अलीगढ़, आगरा कैंट, एत्मादपुर, जसराना समेत कई और विधानसभा सीटों पर होने वाला है, जहां वाल्मिकी समुदाय का बोलबाला बहुत है.. साथ ही इस क्षेत्र से आजाद का बेहद मजबूत वोटबैंक भी है।

चंद्रशेखर के वोट बैंक में बड़ी सेंध की तैयारी!

वहीं घावरी ने अपना मास्टरस्ट्रोक खेलते हुए वाल्मिकी समुदाय के लोगो के राजनैतिक नेतृत्व को लेकर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। वो कहती है कि ये उनकी दिली ख्वाहिश के अगले 5 सालो में किसी भी राज्य में वाल्मिकी समुदाय का एक सीएम तो बनना चाहिए। घावरी ने कहा कि ये बेहद दुख की बात है कि आज भी समाज में वाल्मिकी समुदाय को सफाई करने से ज्यादा पहचान नहीं मिली है। लेकिन वो इस सोच को बदलना चाहती है। घावरी का विजन तो वाकई में बेहतरीन है लेकिन जिसके दम पर वो आजाद को टक्कर देने की तैयारी में है, सच तो ये है कि उनकी खुद की स्थिति ही बेहद बुरी है। मई जून महीने में घावरी ने कहा था कि राजनीति के रास्ते में उन्हे सपा के मुखिया अखिलेश यादव का साथ मिला है। वहीं अभी हाल ही में आजाद ने बयान दिया कि वो बसपा औऱ सपा से कोई संबंध नही रखता चाहते है।

घावरी सवर्ण समाज की हितैषी

बसपा जहां पूरी तरह से खत्म हो चुकी है तो वहीं सपा नए नए हथकंडे अपना रही है वोटर्स को लुभाने के लिए.. लेकिन घावरी का आना सपा को फायदा कम नुकसान ज्यादा पहुंचा सकता है.. वजह साफ है.. घावरी का अपने समाज से ज्यादा सवर्ण समाज का हितैषी होना। करणी सेना द्वारा उन्हें राजमाता का सम्मान देना.. उन्हें सिंहासन पर बिठाना.. दर्शाता है कि सवर्ण समाज के प्रति घावरी की निष्ठा दलित पिछड़े समुदाय से ज्यादा है। उनके सोशल मीडिया पर भी अपने ही समाज के लोगो के खिलाफ बोलना कहीं न कहीं उनकी छवि को सवर्णवादी मानसिकता वाली बना चुका है। वहीं घावरी के अनगिनत आरोपी लगाने के बाद भी आजाद की पलट कर प्रतिक्रिया न देना भी घावरी को छवि को कमजोर करने लगा था। आजाद जहां हमेशा हर मोर्चे पर दलित पिछड़े समाज के लिए खड़े रहते है।

इस संदर्भ में, घावरी के आरोपों को एक राजनीतिक साज़िश मानकर खारिज किया जा रहा है। यह भी माना जाता है कि सवर्ण (उच्च-जाति) समुदाय, *बहुजन* समुदाय में फूट डालने के लिए घावरी का इस्तेमाल एक राजनीतिक मोहरे के तौर पर कर रहा है। हालाँकि घावरी का दावा है कि वह बहुजन समुदाय—जिसमें वाल्मीकि समुदाय भी शामिल है—के लिए समानता और न्याय की लड़ाई लड़ रही हैं, लेकिन आज़ाद पर लगातार हमले और साथ ही सवर्ण समुदाय से आज़ाद को मिलने वाले भारी समर्थन ने इस टकराव को महज एक निजी झगड़े और “दलित बनाम सवर्ण” मुद्दे में बदल दिया है। इस सार्वजनिक छवि के कारण, घावरी ज़मीनी स्तर पर बहुजन और दलित समुदायों का समर्थन जुटाने में नाकाम हो रही हैं; इसके उलट, एक बड़ा वोट बैंक मजबूती से आज़ाद के साथ खड़ा है। नतीजतन, घावरी के मैदान में उतरने से आज़ाद के वोट बैंक को कोई खास नुकसान होने की संभावना नहीं है। हालाँकि, इस बात का जोखिम है कि राजनीति में कदम रखने से वह सोशल मीडिया पर अपने बड़ी संख्या में मौजूद फॉलोअर्स के बीच बनी अपनी छवि को खराब कर सकती हैं।

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