Babasaheb Ambedkar: बाबासाहेब अपने पिता रामजी मालोजी सकपाल की चौदहवीं और सबसे छोटी संतान थे। हालाँकि, जब वे तीन साल के थे, तब उनकी माँ भीमाबाई का निधन हो गया; उस समय रामजी सकपाल की उम्र लगभग 53 साल थी। रामजी सकपाल बाबासाहेब के जन्म के कुछ ही साल बाद, 1894 में रिटायर हो गए। कम उम्र में ही माँ को खो देने के कारण, बाबासाहेब का अपने पिता के साथ बहुत गहरा भावनात्मक रिश्ता बन गया। चूँकि उनके पिता रिटायर हो चुके थे, इसलिए वे अपना ज़्यादातर समय बाबासाहेब के साथ बिताते थे। उन्हें अंग्रेज़ी और गणित की अच्छी जानकारी थी। बचपन से ही बाबासाहेब को अपने पिता की लगातार मौजूदगी और फ़ौजी जीवन के अनुशासन का फ़ायदा मिला; इससे भी ज़रूरी बात यह है कि उन्हें अपने पिता से जीवन के लिए अनमोल मार्गदर्शन मिला। बाबासाहेब को हर चीज़ के लिए—अपनी शिक्षा से लेकर अपने समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ने तक—अपने पिता से ही प्रेरणा मिली। उनके बीच गहरे रिश्ते के कारण वे लगभग हमेशा साथ रहते थे, हालाँकि एक समय ऐसा भी आया जब बाबासाहेब ने अपनी पढ़ाई छोड़ने के बारे में सोचा; लेकिन उनके पिता की सलाह ने सब कुछ बदल दिया।
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पिता की एक सीख ने बदल दी बाबा साहेब की जिंदगी
दरअसल 1897 में बाबा साहब का परिवार सतारा से बम्बई शिफ्ट हो गया था, और बाबा साहब ने दाखिला एल्फिंस्टन हाई स्कूल में ले लिया था, 1907 में बाबा साहब ने इसी स्कूल से दसवी की परिक्षा पास की थी.. जो उनके समाज में पहली बार हुआ था। लेकिन बाबा साहब के लिए शिक्षा हासिल करना कभी भी आसान नही था.. उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता था। जातिवाद इस कदर चरम पर था कि उन्हें सामान्य जाति के बच्चों की परछाई से भी दूर रहना पड़ता था। जातिगत भेदभाव सहते हुए बाबा साहब ने पढ़ना जारी रखा था.. लेकिन जब 1906 में बाबा साहब की शादी रमा बाई से हुई, तो घर का खर्च चलाने के लिए पैसों की जरूरत पड़ी। बाबा साहब के घर में आर्थिक तंगी रहा करती थी. एक तरफ पढ़ाई थी, वहीं दूसरी तरफ जातिगत भेदभाव था और तीसरी तरफ आर्थिक तंगी थी। इन सबसे बाबा साहब बेहद परेशान हो गए थे। बम्बई में बाबा साहब के पिता भी उनके साथ ही रहते थे।
किसी तरह से समय गुजर रहा था.. लेकिन जब उन्हें लगा कि अगर वो काम नहीं करेंगे तो घर का खर्च चलना मुश्किल हो जायेगा तो उन्होंने झल्ला कर पढ़ाई छोड़कर वो बम्बई की किसी कपड़ा मिल में नौकरी करने का फैसला किया। लेकिन बाबा साहब के पिता जानते थे कि उनका बच्चा किसी बड़े उद्देश्य के लिए जन्मा है.. उन्होंने किसी भी हाल में बाबा साहब की पढ़ाई को छूटने नही दिया..वो अपनी बहनो के गहने गिरवी रखकर भी बाबा साहब का पढ़ाने के लिए तैयार थे.. बाबा साहब अपने बूढ़े पिता पर अपनी जिम्मेदारी का बोझ नही डालना चाहते थे.. लेकिन जब उनके पिता को बाबा साहब के पढ़ाई छोड़ने की बात पता चली तो उन्होंने बाबा साहब को अपने पास बिठाया.. और बेहद प्रेरणादायी सीख दी.. बाबा साहब के पिता ने उनका मार्गदर्शन करते हुए कहा.. भीमा.. मैं जानता हूं कि तुमने बचपन से जातिगत भेदभाव और अपमान सहा है.. लेकिन इस भेदभाव को खत्म करने का एकमात्र तरीका शिक्षा ही है।
तुम अगर आज पढ़ाई छोड़ देते हो तो जिंदगी भर ये अपमान तुम्हें सहना पड़ेगा.. अगर तुम्हें समाज में बराबरी औऱ सम्मान चाहिए तो तुम्हें सबसे पहले शिक्षित होना होगा.. ताकि तुम्हें दाकियानूसी नियमों के बारे में सही जानकारी हो.. जब तक तुम्हें किसी बात की जानकारी ही नहीं होगी.. तो तुम उस नियम के खिलाफ लड़ोगे कैसे। तुम पढ़ लिक कर खुद को इतना बड़ा बनाओ की समाज की सोच खुद ही तुम्हें लेकर बदल जायें। शिक्षा आपको सभ्य और संस्कारवान बनाती है। वो आपमें विवेक लाती है.. बाबा साहब जानते थे कि उनकी पिता की कही एक एक बात बिल्कुल पत्थर की लकीर की तरह है.. उन्होंने तय किया कि वो तमाम अभावो के बाद भी पढाई करेंगे, उन्हे जितना पढ़ने का मौका मिलेगा वो पढ़ेंगे। जिसके बाद स्कूल छोड़ने का मन बना चुके बाबा साहब ने पूरे जीवन में 32 डिग्रियां हासिल की थी।
ऐसा था बाबा साहब के ऊपर उनके पिता का प्रभाव.. वैसे बहुत कम लोगो को पता है कि बाबा साहब का बौद्ध धर्म की तरफ मुड़ने में भी उनके पिता का बड़ा योगदान है। बाबा साहब के पिता कबीरपंथी थे.. और वो कबीर के ही विचारों को फॉलो करते थे, जातिपात, छूआछूत, पाखंड और मूर्तिपूजा का विरोध बाबा साहब ने बचपन से ही देखा था। वहीं उनके पिता के एक मित्र महान विद्वान और समाज सुधारक कृष्णराव अर्जुन केलुस्कर (जिन्हें ‘केलुस्कर गुरुजी’ भी कहा जाता है… उन्होंने ही बाबा साहब को दसवी की परिक्षा पास करने के बाद गौतम बुद्ध चरित्र की किताब उपहार में दी थी। केलुस्कर ने ही बाबा साहब की बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर बड़ौदा राज्य के सयाजी गायकवाड़ से उनका परिचय कराया था। बाबा साहब जो कुछ भी बने उसके पीछे उनके पिता का व्यक्तित्व औऱ उनका मार्गदर्शक हमेशा साथ रहा था।



