Gujarat Dalit Case: आजकल समाज में जो ‘गौ रक्षा’ का ठेका लेकर बैठे हैं, क्या वे खुद इसके लायक हैं? क्या बिना किसी जांच-पड़ताल के किसी को सरेआम पीट देना सही है? ऊना में पीड़ितों की चीखें क्यों नहीं सुनी गईं? आखिर क्यों उन्हें अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ीं? क्या सिर्फ इसलिए कि वे दलित समुदाय से आते थे? आज करीब 10 साल बाद अदालत का फैसला तो आया है, लेकिन क्या यह उन जख्मों को भर पाएगा जो न्याय के इंतजार में गहरे हो गए हैं?
केवल अदालतों को सजा देने का अधिकार
किसी भी सभ्य समाज में कानून हाथ में लेना अपराध है। जैसा कि इस केस में हुआ, पीड़ितों पर गोवंश की हत्या का झूठा आरोप लगाया गया, जबकि वे अपना पारंपरिक काम कर रहे थे। बिना किसी पुष्टि के सरेआम पिटाई करना न केवल अन्याय है, बल्कि मानवाधिकारों का उल्लंघन भी है। वहीं यह एक कड़वा सच है कि इस मामले में पीड़ितों की जातिगत पहचान ने उन्हें आसान निशाना बनाया।
कई मानवाधिकार संगठनों ने माना है कि ‘गौ रक्षा’ के नाम पर अक्सर दलित और अल्पसंख्यक समुदायों को ही हिंसा का शिकार बनाया जाता है। 10 साल बाद आया यह फैसला एक राहत जरूर है, लेकिन यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या ‘देरी से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है’? इतने सालों तक उस परिवार ने जो सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार झेला, उसकी भरपाई ये सजा नहीं कर सकती। साथ ही किसी भी जीव की रक्षा करना नेक काम है, लेकिन हिंसा और आतंक फैलाकर खुद को ‘रक्षक’ कहना विरोधाभासी है। कानून के मुताबिक, सजा देने का अधिकार केवल अदालतों को है, किसी स्वघोषित समूह को नहीं।
10 साल के बाद मिली सजा
मीडिया द्वारा मिली जानकारी के मुताबिक, गुजरात के ऊना स्थित मोटा समढियाला गांव में आज से करीब 10 साल पहले 2016 में, दलित परिवार के सदस्यों पर गोकशी का झूठा आरोप लगाकर उन पर बर्बर हमला किया गया था। जांच में सामने आया कि उस वक्त इस मामले में कुल 43 लोगों (जिनमें 4 पुलिसकर्मी भी शामिल थे) को आरोपी बनाया गया था। लेकिन अब पूरे 10 साल के बाद अदालत ने 37 आरोपियों को बरी कर 5 दोषियों को 5-5 साल की जेल की सजा सुनाई है और प्रत्येक पर 5,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
क्या है पूरा मामला
यह मामला 11 जुलाई 2016 का है, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इसकी पूरी कहानी कुछ इस तरह है। गुजरात के गीर सोमनाथ जिले के मोटा समढियाला गांव में दलित समुदाय के ‘सरवैया परिवार’ के सदस्य एक मृत गाय की खाल उतार रहे थे। यह उनका पारंपरिक पुश्तैनी काम था। तभी खुद को ‘गौ रक्षक’ बताने वाले कुछ लोग वहां पहुंचे। उन्होंने परिवार पर गोकशी (गाय मारने) का झूठा आरोप लगाया। जबकि बाद में जांच में यह साबित हुआ कि गाय को एक शेर ने मारा था और उसकी मौत प्राकृतिक थी।
लेकिन आरोपियों ने परिवार के चार सदस्यों (वशराम, रमेश, बेचर और अशोक) को निर्वस्त्र किया, उन्हें अपनी कार से बांधा और घसीटते हुए ऊना शहर ले गए। वहां बाजार में उन्हें लोहे की पाइपों और लाठियों से बेरहमी से पीटा गया। आरोपियों ने खुद इस पिटाई का वीडियो बनाया और सोशल मीडिया पर डाला। यह वीडियो वायरल होते ही देशभर में भारी विरोध प्रदर्शन हुए। तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को इस्तीफा देना पड़ा और दलित अस्मिता की एक नई लहर (ऊना आंदोलन) शुरू हुई।



