Buddha on Brahma: हिंदू धर्म के ग्रंथो और पुराणो के अनुसार तीन देवता सुप्रीम है.. विष्णु जो पालनकर्ता है, शिव जो संहारक है और तीसरे है ब्राहमा.. जो रचयिता है.. मतलब की संसार में जो भी है, नदिया, झरने, तालाब, रेगिस्तान, जीव, जंतु, जमीन, पेड़ पौधे,, सबकुछ ब्राह्मा द्वारा ही रची जाती है, इस कारण ये त्रिदेव कहलाते है। लेकिन उसके उलट बौद्ध धर्म में देवी देवताओं के होने, उनके चमत्कार, और सृष्टि के रचने से लेकर उसके विनाश करने की सारी कथाये केवल एक दंत कथा मात्र है और उसका वास्तविकता के कोई लेना देना नहीं है.. क्योंकि ये ग्रंथ अपने सहूलियत के हिसाब से किसी को देव तो किसी को दावन बना रहे है.. जैसे कि जहां शिव औऱ विष्णु परम पूज्य है तो वहीं ब्राह्मा जो सब कुछ निर्माण कर रहे है वो पूजनीय नहीं है,, ऐसा क्यों..हिंदू धर्म के अलग बुद्ध ने ब्रह्मा की पूजा न किये जाने को लेकर अपने विचार बतायें।
हिंदू धर्म में ब्रह्मा की पूजा न होने का रहस्य
बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद सबसे पहले ये सत्य समझा कि संसार किसी के इशारे पर नहीं बल्कि आपके कर्मो के आधार पर चल रहा है.. हम दुख से भागने की कोशिश करते है लेकिन दुख सबसे बड़ी सच्चाई है। हम दूसरो को दोष देते है लेकिन उस दुख के पीछे की सच्चाई नहीं देखना चाहते है.. वहीं अपने दुख के निवारण के लिए हम दूसरे पर निर्भर रहते है, लेकिन हम अपने दुखो का निवारण अपने मोह औऱ इच्छाओं का त्याग करके कर सकते है। वहीं बुद्ध ने इंसान को अपने जीवन में सभी दुखो से मुक्त करने के लिए आठ अष्टांगिक मार्ग बतायें। लेकिन इसमें कहीं भी किसी देवी देवता की पूजा करना, जाप करने जैसा कुछ नहीं है। बुद्ध ने कभी खुद को भगवान नहीं कहा.. उन्होंने खुद को मार्ग दर्शक कहा.. इस कारण बौद्ध धर्म में किसी को भी ये इच्छा नहीं है कि कोई की की पूजा करें। किसी की पूजा होती है या नहीं बुद्ध को इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता.. मगर हिंदू धर्म में ऐसा नहीं है। यहां ब्राह्मा का न पूजना भी चर्चा का विषय है.. लेकिन जब आप बुद्ध की नजरो से देखते है तो आपको समझ आता है कि बुद्ध ने ब्राह्मा की पूजा क्यों नहीं होती इस रहस्य से भी पर्दा उठाया।
बुद्ध कहते है कि ब्राह्मा कोई सृष्टिकर्ता नहीं
हिंदू धर्म ग्रंथो के मुताबित ब्राह्मणा जी को शिव जी के श्राप के कारण पूजने का हक छीन लिया गया, तो वहीं कहीं लिखा है सावित्री के श्राप के कारण उनकी पूजा नहीं होती है.. यानि की जिसे जैसी सहूलियत हुई, वैसे ही कथा बनाई गई। बुदध कहते है हमारा कर्म ही प्रधान है.. किसी देवी देवता की नाराजगी से आपको समय खराब नही होता, या समय अच्छा नहीं होता बल्कि वो आपके कर्मो के आधार पर निर्धारित होता है। आपकी खुद की इच्छा और अज्ञान ही आपको समाज में सम्मान औऱ अपमान दिलाते है। बुद्ध कहते है कि ब्राह्मा कोई सृष्टिकर्ता नहीं है.. वो बस एक दिव्य पुरूष है जिसे आत्मज्ञान प्राप्त हो गया था और वो दिव्य पुरुष हो गए थे। वो ब्राह्म लोक में रहते है इसलिए जीवन मरण के चक्र से तो वो भी आजाद नहीं है।
ब्रह्मा उच्च कोटी के देविय मनुष्य
ब्राह्मा की पूजा न होने के पीछे का कारण उसका अंहकार ही था.. क्योंकि उसे ये भ्रम था कि उसने संसार बनाया है, और संसार उसके इच्छा से चलता है,, ब्राह्मा को लगता था कि उसकी इच्छा से सब चलता है जो कि पूरी तरह से मिथ्य है। संसार असल में प्रकृति के नियमों और कर्म के आधार पर चलयमान है। हालांकि ब्रह्मा को एक ऐसे उच्च कोटी के देविय मनुष्य है जिन्होंने अपने परम कर्मो और गहरे ध्यान के जरिये उच्च स्थान पाया है। जो कि देविय अधिकार से नहीं बल्कि गहन ध्यान साधना से पाया जाता है, लेकिन ब्राह्मा कोई अजर अमर नहीं है, एक समय के बाद उन्हें फिर से जन्म लेना पड़ता है.. उनका जीवन भी प्रकृति के नियमो से बंधा है जो स्थाई नहीं अस्थाई है।
बौद्ध कथाओं में अक्सर इस बात का जिक्र है कि ब्राह्मणा खुद बुद्ध के उपदेशों को सुना करते थे। बुद्ध ने भी ये कहा कि जैसे बुद्धत्व को प्राप्त करने के लिए उन्हें बुद्ध के मार्ग पर चलना चाहिए, वैसे ही गहन ध्यान अवस्था को प्राप्त करके मनुष्य ब्राह्लोक का भागीदारी हो सकता है। ब्राह्म लोक वो स्थान है, जो मनुष्य को दीर्घायु, मानसिक शांति औऱ उच्च चेतना देती है। ब्राह्मा ने पूर्ण शांति और गहन ज्ञान प्राप्त कर लिया था, इस कारण उन्हें पूजा पाठ से कोई मोह नही था। मगर वो भी संसारिक चक्र से मुक्त तभी हो सकते है जब वो स्थाई मुक्ति पायें जो कि निर्वाण के माध्यम से ही संभंव है। इस कारण ब्रहामा को कभी अपने पूजे जाने या न पूजे जाने की फिक्र ही नही हुई। बुद्ध की नजरो में ब्रहामा एक महान ज्ञानी थे, जिन्होंने अपने तप के दम पर ब्राह्मलोक को प्राप्त किया था। इसलिए कहीं भी उन्होंने पूजे जाने के बारे में बात नहीं की।



