Dalit leader Pradeep Tamta: उत्तराखंड का कुमाऊं क्षेत्र.. जिसे सनातन धर्म की नींव का प्रतीक माना जाता है.. हिंदू धर्म के देवी देवताओं के मंदिरों से भरा हुआ ये क्षेत्र वैसे तो पवित्रता और धार्मिक भावना का अहसास कराता है, लेकिन बावजूद इसके उसकी इस चमक में जातिवाद भेदभाव नाम का काला दाग भी लगा है। जैसा कि अभी हाल ही का वाक्या देखिए.. कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उत्तराखंड के हलद्वानी में 2027 के विधानसभा चुनावो से पहले प्रचार के लिए पहुंचे थे। हल्द्वानी के जिस रामलीला मैदान में उन्होंने रैली की थी। उनके जाने के बाद उत्तराखंड की एक स्थानिय हिंदू संगठन ने पूरे रामलीला मैदान का ही शुद्धिकरण किया। ये केवल कांग्रेस नेता का ही अपमान नहीं था.. बल्कि उस संविधान का भी अपमान हुआ। जिसने सभी को एक समान होने का अधिकार दिया था.. अब आप राज्य में उन लोगो की स्थिति की कल्पना तो कर ही सकते है जो पिछड़ी, अछूत वंचित जाति से आते है.. उन्हें तो सिर उठा कर चलने के लिए भी कितनी कठिनाइयो का सामना करना पड़ता होगा। बावजूद इसके उत्तराखंड में दलितों की आवाज बन कर उभरे पूर्व सासंद प्रदीप टम्टा। उन्होंने बचपन से ही जातिवाद की सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई.. जिसने उन्हें वहां का एक मशहूर दलित चेहरा बनाया।
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कौन है प्रदीप टम्टा? – Pradeep Tamta
16 जून 1958 को उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के बागेश्वर जिले के लोब गांव में जन्मे प्रदीप टम्टा आज कांग्रेस पार्टी का जाना माना दलित चेहरा है। उनके पिता का नाम गुसैन राम औऱ मां पार्वती देवी थी। उनके पिता एक शिल्पकार थे, और मूर्तियां बना कर परिवार का गुजारा करते थे। जिसमें उनकी मां भी उनका साथ देती थी। लेकिन उत्तराखंड में शिल्पकार एक दलित जाति है इसलिए प्रदीप टम्टा के परिवार को भी गांव में दलित बस्ती में रहना पड़ता था। परिवार को आय इतनी ही थी किसी तरह से वो दो वक्त की रोटी खा सकें। बचपन से अपने परिवार की स्थिति को देखते हुए प्रदीप टम्टा को सामाजिक बदलाव और दलित अधिकारों के लिए कुछ करने की प्रेरणा मिली। वो छोटी से उम्र से ही दलित उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने लगे। स्कूल के दौरान वो एक ऐसे बागी स्टूडेंट थे जो जातिगत भेदभाव के खिलाफ खुल कर बोलते थे। उनका ये जज्बा कॉलेज में भी बरकरार रहा और कुमाऊं विश्वविद्यालय , नैनीताल जिले से ग्रेजुएशन किया, जिसके बाद उन्होंने बीएड और फिर लॉ की डिग्री हासिल की। अपनी पढ़ाई के दौरान वो कॉलेज में भी जातिगत भेदभाव के खिलाफ सबको एकजुट करके अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते थे। धीरे धीरे वो एक लोकप्रिय चेहरा बन गए। हालांकि उत्तराखंड जहां हमेशा से ही सवर्णो और ब्राह्मणों का बोलबाला रहा है चाहे वो सामाजिक स्तर पर हो या फिर राजनैतिक स्तर पर, दलित जहां बहिष्कृत हो वहां अपने लिए राजनीतिक जमीन तैयार करना गर्म रेगिस्तान में चलने जैसा है जहां न रास्ते का पता होता न मंजिल का। लेकिन प्रदीप टम्टा अपने इरादे के पक्के थे।
प्रदीप टम्टा का राजनैतिक करियर
प्रदीप टम्टा अपने कॉलेज के दिनो से ही छात्र संघ से जुड़े थे औऱ उनकी लोकप्रियता के कारण वो अल्मोड़ा महाविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। साल 1990 में कांग्रेस ने प्रदीप टम्टा के पोटेंशियल को देखते हुए दलितों के बीच जगह बनाने के लिए उन्हें कांग्रेस अनूसूचित विभाग के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर चुना गया। उन्होंने भी कांग्रेस का भरोसा बनाने रखा और जमीनी स्तर पर उतरकर में कांग्रेस की जमीन तैयार की औऱ दलितों का रूख कांग्रेस की तरफ मोड़ा। उस वक्त उत्तराखंड यूपी का ही हिस्सा था। साल 2000 में यूपी से उत्तराखंड अलग हो गया और और प्रदीप टम्टा ने साल 2002 में उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में अल्मोड़ा जिले से सोमेश्वर सीट से निर्दलीय उम्मीदवार अजय टम्टा के खिलाफ चुनाव लड़ा.. और पहली ही बार में उन्होंने वहां जीत दर्ज की। 2002 में उत्तरखंड की पहली ही विधानसभा में प्रदीप टम्टा विधायक बन गए। उनकी इस जीत ने कांग्रेस का भरोसा और मजबूत कर दिया। लेकिन 2007 में अजय टम्टा बीजेपी का हाथ थाम कर आये और उन्होंने प्रदीप टम्टा को चुनौती दी.. उत्तराखंड की जनता ने इस बार बीजेपी को मौका दिया था जिस कारण प्रदीप टम्टा को भी हार का सामना करना पड़ा था।
लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में प्रदीप टम्टा अल्मोड़ा की आरक्षित संसदीय सीट से खड़े हुए.. और कांग्रेस का भरोसा बरकरार रखते हुए उन्होंने जीत दर्ज की.. इसी के साथ प्रदीप टम्टा साइंस एंड टेक्नोलॉजी, पर्यावरण एवं वन कमेटी के सदस्य चुने गए थे। 2014 लोकसभा चुनाव को भला कौन भूल सकता है, मोदी लहर की धूम थी.. बीजेपी ने फिर से अजय टम्टा पर दांव खेला औऱ मोदी लहर के कारण फिर से प्रदीप टम्टा को हार का सामना करना पड़ा। लेकिन कांग्रेस ने फिर भी उनकी काबिलियत पर भरोसा दिखाते हुए 2016 से 2022 तक उत्तराखंड के राज्यसभा का सदस्य नियुक्त कर दिया। हालांकि 2019 औऱ फिर 2024 में भी उनकी हार हुई। लेकिन फिर भी कांग्रेस के साथ पिछले 36 सालों से जुड़े है.. और वो हमेशा कांग्रेस पर ही भरोसा जताते है, जिसके कारण हार के बाद भी वो कांग्रेस में काफी सम्मानिय है।
दलितो के हक के लिए संसद में उठाई आवाज
प्रदीप टम्टा भले ही एक बड़े नेता बन गए लेकिन वो कभी भी अपने लक्ष्य से नहीं भटके। जहां और जब भी दलित के लिए आवाज उठाने की जरूरत पड़ी प्रदीप टम्टा ने सबसे पहले आवाज उठाई। प्रदीप टम्टा एक अंबेडकरवादी नेता है, और बाबा साहब के विचारों को भी फ़ॉलो करते है। इतना ही नहीं उन्होंने संसद में भी बाबा साहब की बात को दोहराते हुए एक ऐसे समाज को बनाने की बात की थी जो पूरी तरह से जातिवीहिन हो। वो उत्तराखंड में दलित उत्पीड़न को रोकने और उनके लिए समाजिक न्याय के लिए खुद जमीनी स्तर पर काम करते है। पीड़ित परिवारों से मिलने से लेकर संसद तक आवाज पहुंचान तक.. प्रदीप टम्टा कभी पीछे नहीं हटे। प्रदीप टम्टा भले ही सरकार में नही है लेकिन वो दलितों और पिछडो के लिए न्याय की आवाज उठाने के अपने मकसद से जुड़े है। जो उन्हें खास बनाता है।



