Babasaheb advocacy: पिछले कुछ महीनों से आपने बाबा साहब को लेकर एक अफवाह काफी सुनी होगी… कुछ मनुवादी जातिवादी आतंकी ये दावा कर रहे है कि बाबा साहब ने भले ही बैरिस्टर की डिग्री ली थी लेकिन उन्होंने वकालत की प्रेक्टिस नहीं की था, उन्हें वकालत करने का मौका नही मिला था,, और न जाने क्या क्या दावे हो रहे है.. लेकिन बाबा साहब ने वकालत की प्रेक्टिस की या नहीं वो उनके द्वारा लड़े गए कुछ केस स्टडी से सामने आ ही जाता है.. सोचने वाली बात है कि अगर बाबा साहब कोर्ट नहीं गए तो वो चबूतरे वाले वकील कैसे कहलाये।
जाहिर है कि उनकी जाति के कारण उन्हें कोर्ट के अंदर जगह नहीं दी गई लेकिन उन्होंने खुद कोर्ट के बाहर ही चबूतरे को अपनी जगह बना ली थी.. बावजूद उसके अगर कोई कहता है कि बाबा साहब ने काम नहीं किया तो ऐसे लोगो के लिए करारा जवाब है आज का ये विडियो.. अपने इस लेख में हम एक ऐसे केस के बारे में बताने जा रहे है जिसके लिए बाबा साहब दिल्ली से बंगाल गए थे.. जहां न बाबा साहब ने एक अनसुलझा मामला सुलझाया बल्कि उन्होंने बताया कि वाकई में वकालत किसे कहा जाता है.. और क्यों बाबा साहब सभी से हटकर है .. क्यों उनकी दलीले इतनी पावरफुल होती है कि जज ही नहीं कोर्ट पूरा भी शांति से सुनने को मजबूर हो जाते है।
बाबा साहब ने बचाया बेकसूर को
ये वो दौर था जब बाबा साहब जातिवाद की लड़ाई तेज कर रहे थे, वो दलितों कमजोरो के लिए लड़ने वाले वकील के रूप में प्रसिद्ध थे.. औऱ वो उस वक्त मुम्बई में नहीं बल्कि दिल्ली में रहते थे। देश आजादी की तरफ बढ़ रहा था, लेकिन जातिवादी मानसिकता अब भी समाज में कोढ़ बनी हुई थी। इसी दौरान कलकत्ता के एक इलाके में राय हवेली के मालिक प्रताप राय की मौत एक बंद पड़े कमरे में हो गई थी। हैरानी की बात है कि जब पुलिस ने जांच की तो दरवाजा अंदर से बंद था औऱ प्रताप राय सोफे पर मरे पड़े थे और उनके पास पड़ी थी एक बंद पड़ी दीवार घड़ी।
पुलिस ने घर के लोगो से पूछताछ की.. तो पता चला कि प्रताप राय ने कुछ दिनों पहले अपने एक नौकर रवि को बहुत बुरी तरह से सबके सामने बेज्जत किया था। प्रताप राय जातिवादी मानसिकता से भरा हुआ था, और रवि एक दलित जाति से था, रवि की किसी छोटी सी गलती के कारण प्रताप राय ने उसे बहुत बेज्जत किया। जांच अधिकारी खुद भी उंची जाति से था.. बस फिर क्या था रवि पर प्रताप राय की हत्या का आरोप लगा कर उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
जब बाबा साहब के पास पहुंचा मामला
रवि एक दलित जाति से था, गरीबी में पला बढ़ा था, लेकिन उससे उसकी ईमानदारी में कोई कमी नही थी, इसलिए प्रताप राय के पास काफी लंबे समय से काम कर रहा था, रवि के घर में केवल उसकी बूढ़ी मां थी, गरीबी और लाचारी में किसी तरह से जीवन बिता रहे थे, लेकिन रवि की गिरफ्तारी से मां टूट गई.. बच्चे को बचाने के लिए वो दर दर भटकने लगी.. कई वकीलो के पास गई.. लेकिन सबने एक ही बात कहीं कि रवि के पास हत्या का मोटिव है.. इसलिए उसे बचाया नहीं जा सकता है। थक हार कर बूढ़ी मां मंदिर के बाहर बैठकर भगवान से प्रार्थना करने लगी.. तभी वहीं पास से गुजर रहे एक राहगीर ने उन्हें देखकर उनके रोने का कारण पूछा तो मां ने सबकुछ बता दिया।
उस अंजान शख्स ने रवि को मां से कहा कि आप दिल्ली चले जाओं.. वहां बाबा साहब अंबेडकर रहते है, वहीं आपके बेटे को बचा सकते है। रवि की मां किसी तरह से दिल्ली पहुंची और बाबा साहब से मिलने पहुंची। बाबा साहब की मुलाकात जब रवि की मां से हुई तो बाबा साहब ने केवल एक सवाल पूछा कि क्या आपको पक्का यकीन है कि आपका बेटा बेगुनाह है। रवि की मां ने पूरे आत्मविश्वास से कहा कि हां, उनका बेटा बेगुनाह है। बस बाबा साहब पहुंच गए कलकत्ता.. लेकिम हैरानी की बात है कि वो रवि या पुलिस से मिलने के बजाय सीधा राय हवेली पहुंचे.. और उस कमरे में गए जहां प्रताप राय मृत पाये गए थे।
बाबा साहब की दलीलों के आगे झुके वकील
बाबा साहब ने पूरे कमरे का निरिक्षण किया,.. और उस घड़ी का भी.. जो प्रताप राय की हत्या के समय उसके पास थी। उसके निरिक्षण के दौरान बाबा साहब को कुछ ऐसा पता चला, जिसके कारण उनके चेहरे पर एक तीखी और विजयी मुस्कान आ गई। अगले दिन सुनवाई हुई.. सबसे पहले बाबा साहब का तर्क ये था कि एक बंद में हत्या कैसे की गई औऱ हत्या करके आरोपी भागा कैसे.. लेकिन जब ये दलील काम नहीं आई तब बाबा साहब ने कहा कि उनके पास गवाह है जिसने ये घटना शुरु से लेकर अंत तक देखी है।
सभी हैरान थे, लेकिन बाबा साहब आत्मविश्वास से भरे थे। बाबा साहब ने बंद पड़ी घड़ी को कोर्ट में पेश कर दिया.. उन्होंने कहा कि गवाही ये बंद घड़ी देगी.. सभी हंस पड़े लेकिन बाबा साहब ने बोलना जारी रखा.. उन्होंने कहा कि प्रताप राय की मौत रात को 12 बजकर 5 मिनट पर हुई थी, जबकि ये घड़ी 11.55 पर ही बंद हो गई थी.. और प्रताप राय की मौत भी इसी घड़ी के कारण हुई है।
चाभी भरने से साफ मनाही की
किसी को कुछ समझ नहीं आया.. बाबा साहब ने कहा कि इस घड़ी में एक खास तरह का अलार्म लगा है। जो हर 12 घंटे में एक चाइम बजाती है.. अचानक होने वाली तेज आवाज से प्रताप राय को अलर्जी थी, वो बिमार हो जाते थे.. वहीं जब तक घड़ी में चाभी न भरी जायें तब तक चाइम नहीं बजता था, और प्रताप राय को अलर्जी के कारण उन्होंने चाभी भरने से साफ मनाही की थी। लेकिन हत्या की रात घड़ी में चाभी भरी गई थी, फिर समय के अनुसार 12 बजते ही चाइम बजता जो कि पूरी हवेली में सुनाई देता, लेकिन ये बजने से पहले ही रोका गया था.. फिर चाभी किसने भरी थी।
बाबा साहब ने आगे खुलासा किया कि चाभी भरने की जिम्मेदारी प्रताप राय के ही एक नौकर राजू पर थी, जिसने प्रताप राय के इंकार करने के बाद भी चाभी भरी थी, वहीं उसके बजने के समय के साथ भी छेड़छाड़ की थी, इसलिए वो चाइम समय से पहले बजा.. जिससे प्रताप राय की अलर्जी ट्रिगर हो गई .. और जब तक उन्होंने घड़ी को बंद किया तब तक अलर्जी इतनी खतरनाक हो गई थी कि प्रताप राय की 10 मिनट में ही मौत हो गई थी। बाबा साहब ने असली आरोपी राजू को सलाखो के पीछे पहुंचा दिया था, जिससे बेगुनाह रवि बाइज्जत बरी हो गया और रवि की मां का विश्वास जीत गया। ऐसी थी बाबा साहब की वकालत… जो पूरी तरह से मामले को बदलने की ताकत रखते थे।



