सरपंच भी सुरक्षित नहीं, गुजरात के साबरकांठा में जातिगत प्रताड़ना से तंग आकर दलितों ने दी पलायन की चेतावनी

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Gujarat News: बीते कुछ दिन पहले साबरकांठा (Sabarkantha) से एक चौंकाने वाली और परेशान करने वाली खबर सामने आई। जहाँ, मनुवादियों के आतंक से परेशान होकर, गांव के दलित समुदाय ने रेजिडेंट एडिशनल कलेक्टर को एक पत्र सौंपा था। साथ ही अपने ऊपर हो रहे ज़ुल्म के लिए इंसाफ़ की मांगा।  इतना ही नहीं उन्होंने समय पर इंसाफ़ न मिलने पर माइग्रेट करने की धमकी भी दी। लेकिन अभी तक इस मामले में कोई जांच पड़ताल नहीं होने पर दलित कम्युनिटी का गुस्सा अब सीम से बहार होता जा रहा है और उन्होंने कहा अगर उन्हें न्याय नहीं मिलना तो वो आंदोलन करेंगे।

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साबरकांठा में दलित करना चाहते है पलायन

ऐसा क्यों है कि जब किसी गैर-दलित को खरोंच भी आ जाती है तो उसे ऐसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है जैसे उसने कोई युद्ध लड़ा हो, और दलितों की आवाज़ तब तक प्रशासन तक नहीं पहुँचती जब तक वह एक आंदोलन न बन जाए…जी हाँ, ऐसा ही एक मामला गुजरात से है, जहां भले ही विकास के लिए गुजरात मॉडल की सराहना की जाती है लेकिन ये मॉडल जातिगत भेदभाव औऱ उत्पीड़न से दलितों को नहीं बचा सका।

नतीजा ये हुआ है कि गांव के 35 परिवार गांव छोड़ कर पलायन करना चाहते है, यहां तक कि दलित सरपंच को भी नहीं बख्शा गया। बता दें, दिल को झकझोर देने वाला ये मामला साबरकांठा में रूपाल गांव का है, जहां दलितों की आपबीति किसी को भी सोचने पर मजबूर कर देगी कि आखिर विकास हो रहा है तो हो किसका रहा है। वही इस घटना का एक विडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है।

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गांव में छुआछूत भेदभाव चरम पर

क्योंकि दलित तो आज भी जातिवादी आतंकियों द्वारा उतने ही पीड़ित है। पीड़ितों ने बताया कि गांव में छुआछूत भेदभाव चरम पर है, उन्हें तो आज भी उस रास्ते से गुजरने नहीं दिया जाता है जहां से उंची जाति के लोग जाते है, वहीं सरकार की नीतियों के कारण दलित सरपंच तो बन गए, लेकिन पद का जातिगत भेदभाव पर कोई असर नहीं है। वो पहले की ही तरह जातिगत भेदभाव और छुआछूत से प्रताड़ित है। ऐसे में तंग आकर गांव के 35 परिवार गांव छोड़ना चाहते है।

आज़ाद समाज पार्टी ने न्याय के लिए उठाई आवाज

उनकी इस स्थिति पर आज़ाद समाज पार्टी (ASP) एवं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष,सुनील आस्तेय ने पीड़ितो के लिए आवाज उठाई है.. और गुजरात पुलिस और गुजरात सीएम को टैग करके राज्य के दलित परिवारों के लिए कोई ठोस कदम उठाने की मांग की है, अब देखना ये होगा कि क्या आसपा के इस मुद्दे पर आवाज उठाने से दलित परिवारों की स्थिति में कोई सुधार होगा।

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