जब आधी रात को तड़पते हुए युवक के हाथ में बाबासाहेब ने थमा दिया हथियार, कांप जाएगी रूह!

Baba Sahib
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किसी भी योद्धा के लिए उसका हथियार सबसे अहम होता है लेकिन बाबा साहब अंबेडकर ने अपनी लड़ाई लड़ने के लिए एक ऐसे हथियार का सहारा लिया जो न केवल उनके लिए बल्कि सैकड़ो लोगो का हथियार बना। बाबा साहब के बचपन के संघर्ष से तो हम सभी रूबरू है स्कूल में दाखिला लेना हो या क्लास के बाहर खड़े होकर पढ़ना। चिलचिलाती धूप में भी केवल ज्ञान के सागर को पाने के लिए अपने गले की प्यास को भुला दिया था।

शिक्षा सभी के लिए एक समान

वह जानते थे उनकी आज की प्यास कल एक बड़े बदलाव की नींव बनेगी। उनके जैसे सैकड़ो दलित और पिछड़ों के लिए एक नया कल लेकर आएगी। उन्होंने सभी को शिक्षा की ताकत और महत्व दर्शाने के लिए 32 डिग्रियां हासिल की थी ताकि वो केवल ये बता सके कि शिक्षा पर किसी की बपौती अधिकार नहीं है। शिक्षा सभी के लिए एक समान है। वो भेदभाव से परे होना चाहिए और शिक्षा ही वो हथियार हैं जिसके दम पर बड़ी से बड़ी जंग आसानी से जीती जा सकती थी।

लेकिन क्या हो जब बाबा साहब ने उस काली बरसात की रात में एक बच्चे को अपने घर में बिठा कर शिक्षा के प्रति नफरत पैदा होने वाले इस बच्चे को अपनी कहानी सुनाई और उसके हाथों में दे दिया वो हथियार, जिसकी ताकत उस बच्चे को कुछ समय बाद समझ आने वाली थी। क्या था वो हथियार।। और कैसे बाबा साहब ने शिक्षा की ताकत दिखाई थी।

बाबा साहब की सीख

बाबासाहेब अंबेडकर की मानते थे कि आंखें बदले आंख लेने से पूरी दुनिया एक दिन अंधी हो जाएगी इसलिए हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं दिया जा सकता अगर आपको वाकई में अपने साथ हुए अन्याय का बदला चाहिए तो उसे हिंसा से नहीं बल्कि अपनी शिक्षा से दीजिए। खुद को इतना शिक्षित कीजिए कि सामने वाला खुद ही खुद को आपके ज्ञान के आगे बौना समझने लगे।

एक ऐसी ही सीख बाबा साहब ने उस रात को एक 18 साल के बच्चे को भी दी, जिसने अपने गांव में शिक्षा हासिल करने के बदले सजा भुगती थी, लेकिन बाबा साहब के एक हथियार ने उसकी दशा और जीवन की दिशा ही बदल दी। ये उस समय की बात है जब बाबा साहब मुम्बई में रहा करते थे, किताबों से उन्हें इतना प्यार था कि उनका पूरा कमरा सैकड़ो किताबों के साथ एक लाइब्रेरी में तब्दील हो गय़ा था। लेकिन दलितों को शिक्षा का अधिकार अभी भी नहीं मिला था।

बाबा साहब हमेशा गरीबों और वंचितो के लिए खड़े

ऐसे में एक शूद्र जाति से आने वाले बाबा साहब का विदेश जाकर पढ़ना औऱ इतने ज्ञानवान बनने की खबर पूरे भारत में फैल गई थी। बाबा साहब हमेशा गरीबों और वंचितो के लिए खड़े रहते थे। दलितों के लिए शिक्षा का अधिकार लेने के लिए वो लड़ाई लड़ रहे थे, लेकिन तब भी सामाजिक रूप से ये लड़ाई लंबी थी। इसी दौरान बरसात की एक रात में उनके दरवाजे पर एक दस्तक हुई। बाबा साहब उस वक्त भी खुद को किताबों में डुबोये हुए थे, दस्तक सुनकर वो ठिठक कर खड़े हो गये। उन्होंने दरवाजा खोला तो सामने एक 18 साल का लड़का खड़ा… जो खून से लथपथ था, शरीर पर चोटे के निशान थे, कपड़े फटे हुए थे, और उसकी भीगे हुए कांपते हाथों में एक फटी हुई किताब थी।

बाबा साहब ने जैसे ही उसे देखा.. सबसे पहले अपने घर में बुलाया.. इस वक्त बाबा साहब ने उस लड़के की जाति या धर्म के बारे में नहीं बल्कि केवल लड़की की हालत के बारे में सोचा था। बाबा साहब ने उसे तुरंत उसे सूखे कपड़े दिये और तौलियां दिया, साथ ही उसके बाद एक कप चाय दी ताकि उस लड़के की कंपकपाहट कुछ कम हो जाये… उसके घावों पर मरहम लगाया.. और जब वो कुछ शांत हुआ तो उससे पूछा कि वो कौन है और इतनी रात को उनके दरवाजे पर क्या कर रहा था।

शूद्रों और निचली जाति के लोगो को स्कूल में पढ़ने की इजाजत नहीं

लड़के ने बोलना शुरू किया.. मेरा नाम माधव है, और मैं एक दलित जाति से हूं। मेरा गांव मुम्बई के पास ही है। माधव ने कहा…मुझे किताबो से प्यार है, शब्दो का ज्ञान मुझे जीने की नई प्रेरणा देता है, लेकिन दुखद है कि हमारे गांव के स्कूल में केवल सवर्ण ही पढ़ सकते है। शूद्रों और निचली जाति के लोगो को स्कूल के पास भटकने की भी इजाजत नहीं है। लेकिन माधव को एख दिन सफाई करते समय एक किताब मिल गई। वो पढ़ना चाहता था इसलिए चोरी छिपे स्कूल की खिड़की के टीचर की बाते सुनने लगा। लेकिन उस दिन गांव के एक जंमीदार के बेटे ने उसे पढ़ते हुए देख लिया.. जिसके बाद उंची जाति के लोगो ने उसे बुरी तरह से पीटा और धमकी दी कि अगर उसने पढ़ाई करने की कोशिश की उसकी आंखो फोड़ देंगे।

हिंसा का बदला हिंसा नहीं हो सकता

माधव ने हिम्मत नहीं हारी..वो जानता था कि उसकी हारती जिंदगी में अगर कोई उम्मीद  की रोशनी पैदा कर सकता है तो वो बाबा साहब अंबेडकर.. वो अपने गांव से चल कर बाबा साहब के पास पहुंचा था.. बाबा साहब ने उसकी बातें सुनी तो वो पुरानी यादों में चले गए.. जब उन्हें पढ़ने के लिए संघर्ष करना पड़ा था, पानी के लिए पूरे दिन प्यासे रहते थे, लेकिन उनकी शिक्षा हासिल करने की प्यास के आगे सारी बाधाये हार गई।

बाबा साहब ने माधव का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि माधव अगर तुम वाकई में उनसे बदला लेना चाहते हो तो हिंसा का बदला हिंसा नहीं हो सकता। ध्यान रखों शिक्षा वो शेरनी का दूध है, जो इसे पियेगा वो जरूर दहाड़ेगा। तुम्हें भी इस शेरनी का दूध पीना है, अगर तुम पढ़ना चाहते हो तो एक काम करों.. दिन में काम करों और रात में पढ़ो.. अपने जैसे लोगो को भी शिक्षित करों, तभी समाज में वो लड़ने के काबिल होंगे।

माधव को बाबा साहब ने किताबे और पेन दिया

माधव समझ गया था कि असली जीत खून के बदले खून बहाने से नहीं बल्कि खुद को और ज्यादा ताकतवर करने से आयेगी। जिसके लिए सबसे सही हथियार है शिक्षा। अगली सुबह बाबा साहब ने माधव को वो हथियार दिया,, जिसके दम पर माधव एक इतिहास रचने जा रहा था.. अपने गांव की दिशा बदलने जा रहा था। बाबा साहब ने उसे नया बस्ता, किताबे और पेन दिया.. और कहा कि ये वो हथियार है जिससे तुम उन कुरुतियों को हमेशा के लिए खत्म कर सकते हो जो तुम्हें नीचा दिखाती है। माधव अपने गांव लौट आया और वो दिन में काम करता, रात में पढ़ाई.. उसने धीरे धीरे औरो को भी इसमें शामिल कर लिया।

रात की पाठशाला सालों चलती रही.. और कुछ सालों के बाद संविधान लिखे जाने के बाद माधव के गांव में एक दलित शिक्षक की नियुक्ति  हुई जो कि माधव की ही रात की पाठशाला का विद्यार्थी था… ये बाबा साहब की उस प्रेरणा की जीत थी, जिसने माधव को न केवल एक दिशा दी थी बल्कि उसने खुद के साथ अपने जैसे कई लोगों को भी शिक्षा का हथियार थमा दिया था। बाबा साहब ने कभी अपने ऊपर हुए अत्याचार का बदला हथियार से नहीं बल्कि शिक्षा से लेने की सीख दी… .यहीं अहिंसा और शिक्षा की राह ने उन्हें इतना महान बना दिया था।

 

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