बुद्ध के करीब जाना है? तो जानिए क्या है त्रिरत्न और इन्हें पाने का मार्ग – three jewels of Buddhism

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three jewels of Buddhism: अगर आपसे ये पूछा जाये कि बुद्ध के सबसे करीब जाने के लिए सबसे पहले क्या करना अनिवार्य है, तो आपका क्या जवाब होगा.. शायद बुद्ध ने जैसे वैराग्य अपनाया. वैसे ही आपको संसारिक साधनो से दूरी बनानी होगी.. नहीं.. बुद्ध के करीब जाने के लिए सबसे पहला नियम है कि आप बुद्ध की शरण में आये.. यानि की बुद्ध की शरण लेना.. उनका अधीन खुद को कर देना.. शरण लेना का मतलब कोई पलायन नहीं है.. बल्कि ये पहली सीढ़ी है बुद्ध के तीन रत्नों को हासिल करने की पहली सीढ़ी है। ये रत्न है बुद्ध, धर्म और संघ। जिसे स्वयं बुद्ध ने ही तय किया है। अपने इस लेख में हम बात करें बुद्ध के बताये तीन रत्नों के बारे में औऱ कैसे आप उन रत्नों को पा सकते है।

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जीवन को सही दिशा देने वाले ‘त्रिरत्न

बौद्ध धर्म की हर परंपरा चाहे वो महायान हो या थेरवाद, सभी का पहला नियम कहता है कि जो इन परंपराओं में शामिल होगा उसे शरण लेना पड़ेगा, समय के साथ नियमों में बगलाव हुए लेकिन तीन रत्नों सभी के लिए आज भी वहीं है.. जिसमें पहला है बुद्ध – बुद्ध को भगवान की तरह मानने के बजाय हर एक अनुयायी को एक मार्गदर्शक के रूप में, एक शिक्षक के रूप में माना जायें, जो इस बात के साक्षी है। प्रमाण है कि गुरु के सामिध्य में व्यक्ति की सच्ची मुक्ति संभव है। उसके दुखों की मुक्ति संभव है। बुद्ध का अर्थ ही ज्ञान प्राप्त किया हुआ व्यक्ति है।

जो बुद्धत्व को प्राप्त कर चुका हो.. और यहां बुद्ध सिद्दार्थ गौतम को कहा गया है, आर्यपरियेसना सूत्र (महान खोज पर प्रवचन, एमएन 26) में बुद्ध ने एक राजकुमार से साधक और सत्या की खोज, लोगो के दुखों का कारण जानने के लिए जो कठिन तपस्या की, और उसके बाद उन्हें जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसके बारे में बुद्ध ने चर्चा की है। बुद्ध का मानना था कि सच्चा ज्ञान मानव के अपने साधना पर ही निर्भर करता है। अपनी मृत्यु से पहले बुद्ध ने अंतिम बार प्रवचन किया था जिसमें उन्होंने संसार को ये संदेश दिया था कि सभी बद्ध वस्तुएँ क्षणभंगुर हैं। लगन से प्रयास करते रहो।” आप अपने जीवन के मुक्तिदाता स्वयं ही है। बौद्ध धर्म के अनुयायियो का मानना है कि जब कोई बुद्ध की शरण में आता है तो बुद्ध कोई मोक्ष नहीं दिलाते है बल्कि वो तो  उन्हें पवित्रता, ज्ञान और करुणा के सर्वोच्च स्वरूप को दिखाते है, वो केवल मार्गदशक की भूमिका निभात है। बुद्ध इस बात का प्रतीक है कि मुक्ति कोई मिथक नहीं बल्कि व्यक्ति के स्वयं के प्रयासों से हासिल की जा सकने वाली एक वास्तविक वास्तविकता है। निरंतर अभ्यास की आपको बुद्ध के करीब ले जायेगा।

दूसरा रत्न बुद्ध ने बौद्ध धर्म  की स्थापना की

इसके बाद दूसरा रत्न है धर्म- बुद्ध ने बौद्ध धर्म  की स्थापना की थी, बुद्ध मानते थे कि सच्ची मुक्ति के लिए धर्म की सर्वक्षैष्ठ मार्ग है। जिन्हें पाली भाषा में धम्म कहा गया। कलामा सूत्र के अनुसार धर्म वो नहीं जिसे आप अँधाधुंद मान रहे है बिना ये समझ के क्या वो सही है, उनकी जो पद्दतियां है वो मानव कल्याण के लिए है, वो आपको मुक्ति के रास्ते पर ले भी जा रही है या नहीं.. लेकिन बुद्ध ने व्यक्ति को खुद से उस शिक्षाओं की जांच और सत्यापन करने के लिए प्रोत्साहित किया है, जिसे फॉलो करने के लिए दूसरे उन्हे कह रहे है। बौद्ध धर्म में एहिपस्सिको  एक शब्द है जिसे बुद्ध ने कहा था, जिसका अर्थ है आप खुद आइये और धम्म को देखने, उसे समझने के लिए आजाद है.. हम आपको धम्म को जानने के लिए आमंत्रित कर रहे है। बुद्ध ने चार आर्य सत्य के जरिये व्यक्ति को स्वयं के बारे में जानने के लिए प्रोत्साहित किया था, उन्होंने अनात्म  सिद्धांत को मानने से लिए प्रेरित किया, जिसके मुताबिक  प्राणियों या घटनाओं के भीतर कोई स्थायी, अपरिवर्तनीय आत्मा या सार नहीं है, बल्कि व्यक्ति का अस्तित्व पांच तत्वो के संयोजन से ही है,  रूप, भावना, बोध, मानसिक संरचनाएं और चेतना। अलागद्दुपमा सूत्र (एमएन 22) में धम्म को एक नांव के बराबर ही कहा है, जिस तरह से नदी पार करने के बाद व्यक्ति नांव को नदी किनारे छोड़ देता है सिर पर ढो कर नहीं चलता वैसे ही धम्म भी वो जरिया है जो आपको अपने लक्ष्य तक ले जाने वाला है लेकिन लक्ष्य तक पहुंच कर उससे चिपके नहीं रहना है। धम्म का सही अर्थ है कि बुद्ध के बताये शिक्षाओं का निरंतर अध्ययन किया जायें, उसका अभ्यास करें और जीवन में उतारना सबसे अनिवार्य है।

तिसरा रत्न बौद्ध धर्म का जिवंत समुदाय

तिसरा रत्न है संघ- संघ, बौद्ध धर्म का एक ऐसा जिवंत समुदाय, जो धम्म को सार्थक रूप देने में व्यक्ति की मदद करता है। जो धम्म का प्रचार प्रसार करता है। इसे दो रूप है परंपरागत और दूसरा आधुनिक । कोई बी भिक्षु संघ आर्य-संघ को संदर्भित करता है, आर्य संघ वो “महान समुदाय” है जहां साधना करने वाले भिक्षु कम से कम ज्ञानोदय की प्रथम अवस्था  यानि की धारा-प्रवेश को प्राप्त कर चुके है। ये भिक्षुओं और भिक्षुणियों का वो संघ कहलाता है जहां आने वाले साधक पूर्ण रूप से  वैराग्य धारण कर चुके है, स्वयं को मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर कर चुके है। विनय पिटक के मठवासी संहिता, में आर्य संघ के नियमों और दिशा-निर्देशों को विस्तारपूर्वक बताया गया है। पातिमोक्खा ग्रंथ में भिक्षुओं के लिए 227 और भिक्षुणियों के लिए 311 नियम हैं, जो भिक्षुओं के आचरण से लेकर उनके बीच पैदा हुए विवादों के समाधान को कैसे निकाला जायेगा.. उन सभी के बारे में है। वहीं आधुनिक संधर्भ में संघ का इस्तेमाल उन सभी लोगो के लिए किया जाता है जो बौद्ध धर्म का पालन पूरी निष्ठा से करता है।

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