जब ओशो ने बताया बाबा साहेब का सच! डॉ. अम्बेडकर से ज्यादा बुद्धिमान व्यक्ति मैंने नहीं देखा – Osho on Dr BR Ambedkar

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Osho on Dr BR Ambedkar: बाबा साहब ने आजीवन मनुवादी विचार वाले इस समाज से लड़ाई लड़ी थी। लेकिन उनका लक्ष्य क्या था.. लक्ष्य केवल एक था कि समाज में हर एक मनुष्य को आंतरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से स्वतंत्रता मिल सके.. बाबा साहब लड़े.. और अंतिम सांस तक लड़े.. लेकिन जरा सोचिये.. आज अगर बाबा साहब होते तो क्या वो वाकई खुश होते.. बाबा साहब को भगवान बना दिया.. उन्हें मसीहा बना कर उनके नाम की पूजा शुरु कर दी.. मगर आज हम में से कितने है जो सच्चे मन से उनका अनुसरण करते है। कोई भी ऐसा हो, जो उनकी आंखो में आँखे डाल कर कह सकें कि बाबा साहब की हिम्मत उसके अंदर भी है.. और वो सही मायने में अन्याय और विकृत मानसिकता के खिलाफ खड़ा है.. सच तो ये है कि बाबा साहब जो रीढ़ बनना चाहते थे उन्हें केवल एक नारा मात्र बना कर छोड़ दिया गया। लोगो के मन में आज भी वहीं डर और घृणा है।  जिसे खत्म करने के लिए ही बाबा साहब ने ताउम्र मेहनत की थी। खुद को बाबा साहब का अपना कहने वालों को आईना दिखाने में आध्यात्मिक गुरु ओशो ने भी बड़ी तीखी बातें कही है.. जानेंगे कि बाबा साहब को लेकर ओशो क्या सोचते थे और मौजूदा समय में क्या स्थिति है।

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ओशो के विचार में बाबा साहेब की प्रासंगिकता

ओशो कहते है कि बाबा साहब एक शिक्षित व्यक्ति थे..वो सवर्णों और ब्राह्मणों से लड़ रहे थे.. लेकिन एक सवाल का जवाब आप भी दिजिए.. क्या जातिवाद केवल उंची जाति में है.. क्या अछूत, पिछड़ी जाति के लोग ही आपस में भेदभाव नही करते.. कहते है न कि जब आपके खुद के घर में ही आग लगी है तो आप दूसरो के घर को नहीं बचा सकते.. ऐसा ही कुछ मौजूदा समय में दलितों और अछूतो का हाल है। बाबा साहब की सच्ची लड़ाई को तो आज के युवा दूर दूर तक समझते तक नहीं है। आचार्य रजनीश जिन्हें दुनिया ओशो के नाम से जानती है। वो अंबेडकर को लेकर अपने विचार औऱ आज के समय में उनकी लड़ाई का मजाक बनाने वाले लोगो के बारे में खुल कर बात करते है।

ओशो अंबेडकर को बुद्ध के बाद दूसरा बुद्धिजीवी मानते है, उन्होंने बाबा साहब की प्रतिभा को सराहते हुए कहा भले ही समाज की निचली जाति में जन्म हुआ हो लेकिन ये वहीं है जिन्होंने अपनी शिक्षा, ज्ञान और विवेक के जरिये हिंदुस्तान को एक ऐसा संविधान दिया जो हर जाति, हर धर्म का व्यक्ति सिर झुका कर स्वीकार करता है। उनका बौद्ध धर्म अपनाना, केवल उनकी हिंदू धर्म से घृणा का कारण नहीं था। बल्कि वो मानव चेतना में एक नई क्रांति ले कर आने वाला कदम था।

रूढ़ीवादी मानसिक कैद भारतीय समाज

ओशो कहते है कि भारतीय समाज एक रूढ़ीवादी मानसिक कैद में बंद है..जातिवाद असल मायने में एक मानसिक बिमारी है.. जो हिंदू धर्म को मानने वालों के रग रग में घुस चुकी है। जिससे निकालने के लिए बाबा साहब ने आध्यत्मिक तरीके से बदलाव लाने का निर्णय लिया। वो एक ऐसे धर्म की तऱफ देखना चाहते थे जो जातपात से मुक्त हो.. वो कहते है कि क्या आपको लगता है कि कानून इस लाइलाज मानसिक बीमारी का इलाज कर सकता है.. हरगिज नहीं.. ये तभी संभव है जब आध्यात्मिक तरीके से खुद में बदलाव लाया जाये.. जैसा कि बाबा साहब ने किया।

भारत का एक बड़ा तबका आज भी जातिगत भेदभाव की लाइलाज मानसिक बीमारी से ग्रसित है। तो भला वो आजाद कैसे हुआ.. क्या अबेंडकर ने अंग्रेजो से आजादी की लड़ाई लड़ी थी.. नहीं.. उन्होंने जातिगत भेदभाव की बेड़ियों में जकड़ी मानसिकता के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी.. जो बेड़िया आज भी जस के तस है तो आजादी किसे मिली.. अंबेडकर का बौद्ध धर्म अपनाना मानसिक पुनर्जन्म ही था.. जो उन्होंने हिंदू धर्म की गुलामी को मृत्यु समान मानकर त्यागा और बौद्ध धर्म अपनाया।

समाज बुद्ध के रास्ते पर चलना शुरु कर तो भेदभाव खत्म

अंबेडकर की तर्क करने की शक्ति, उनका भावनात्मक न होना, उनकी करूणा और बिना सोचे समझे कुछ भी न अपनाने की विचारधारा ने ही उन्हें वो क्रांति लाने की प्रेरणा दी थी। ओशो मानते थे कि अंबेडकर सदैव सही थे, क्योंकिं उन्होंने धर्म की कही सुनी बातों को आंख बंद करके मान लेने के बजाय उसे सत्य के आधार पर परखा था। ये बेहद ही चिंता का विषय है कि अंबेडकरवाद का नाम लेकर खुद को उनका अनुयायी कहने वाले तो लाखों मिलेंगे, लेकिन अंबेडकर बुद्ध के जिस मार्ग पर चले थे.. कितने उस मार्ग पर चल रहे है..हम अब भी बंटे हुए है।

जातपात करने में केवल सवर्ण ही आगे नहीं है हम भी उनसे कम नहीं है। हम उनके खिलाफ लड़ने के बजाये उसे ही किस्मत का लेखा मान कर फॉलो कर रहे है। सही मायने में अगर समाज बुद्ध के रास्ते पर चलना शुरु कर दे तो भेदभाव, जातपात, डर, घृणा कब की खत्म हो जाती..लेकिन इसे कौन खत्म नहीं होने देना चाहता.. ये सबसे बड़ा सवाल है। समाजिक बुनियाद को प्रश्न करने की ताकत बाबा साहब के पास थी। लेकिन अब हम प्रश्न करते है क्या.. जरा खुद सोच कर बताये… अंबेडकर को लेकर ओशो के विचार हमेशा एक ऐसे व्यक्ति की तरह थे जो सामाजिक क्रांति लाया था, जो आध्यात्मक शांति लाने का प्रयास कर रहा था। लेकिन मौजूदा स्थिति देखकर ऐसा लगता है कि उनकी लड़ाई उनके साथ ही खत्म हो गई।

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