क्या हर बुरा काम पाप होता है? बुद्ध ने बताया कर्म और पाप का असली अंतर – Sin vs Karma In Buddhism

Sin vs Karma In Buddhism, Buddhist Philosophy Explained
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Sin vs Karma In Buddhism: किसी नगर में एक बहुत बड़ा सेठ रहता था। काफी अमीर होते हुए भी बहुत लालची था, एक रात एक चोर जो राजमहल से चोरी करके लौट रहा था, वो सेठ के पास रुका.. सेठ को पता चला कि उसके पास काफी धन है तो उसने चोर की पहचान जाने बिना ही उसे रुकने की इजाजत दे दी। लेकिन सेठ ने उसके खाने में नींद की दवा मिला दी और उसका सारा धन लूट लिया.. अगली सुबह जब चोर उठा तो उसने सेठ पर इल्जाम लगाया लेकिन सेठ साफ मुकर गया। बेचारा चोर गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन सेठ टस से मस नहीं हुआ। वो पैसे उसके बच्चे के इलाज के लिए थे.. पैसे न होने के कारण उसके बच्चे की मौत हो गई। वहीं दूसरी तरफ वो पैसे लेकर नगर के बाजार में गया तो राजा के सिपाहियों ने उसे ही चोर समझ कर पकड़ लिया, और उसे सजा मिली। अब सवाल ये है कि सेठ के साथ जो हुआ वो उसके पाप का फल था या कर्मो का। हिंदू धर्म में शायद इसे पाप का फल कहा जा सकता है लेकिन बुद्ध इसे पाप नहीं मानते। वो इसे कर्म मानते हैं मगर क्यों। क्या सेठ का कृत्य पाप नहीं माना जाएगा तो वहीं सेठ के साथ जो हुआ वो क्यों हुआ। क्या है पाप और कर्म में अंतर। और बौद्ध धर्म में पापा और कर्म को कैसे परिभाषित किया गया है।

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बौद्ध धर्म में पाप की जगह कर्म क्यों?

जैसा कि बुद्ध ने कहा कि सृष्टि में ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है और संसार कर्मों के आधार पर चलती है, आपका एक कर्म दूसरे कर्म से जुड़ा है। बौद्ध धर्म में पाप की कोई अवधारणा है ही नहीं.. बुद्ध के मुताबिक पाप को आप धार्मिक ग्रंथो के अनुसार ईश्वरीय नियमों का उल्लघंन कह सकते है। यानि की जो ईश्वर के बताये अनुसार नहीं किया गया है वो पाप है। जब बौद्ध धर्म मं जूब ईश्वर का ही कोई अस्तित्व नहीं है तो पाप जैसी अवधारणा को मानना ही बेकार है। पाप को ईश्वर के दिव्य का आदेश का उल्लंघन माना जाता है, जिसके लिए आपको किसी उच्च शक्ति द्वारा किये गए पाप को प्रायश्चित करने के बाद क्षमा करने की अवधारणा होती है..ऐसे लोग जो इश्वरियों नियमो को खिलाफ जाते है वो पापी कहलाते है.. मगर बौद्ध धर्म पूर्णतः आपके कर्मों और कर्मों के कारण होने वाले परिणामों पर आधारित है।

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इंसान को सजा पाप से मिलती है या कर्मों से?

बुद्ध कहते है कि जो कर्म आप कर रहे है, अच्छे या बुरे, भविष्य की गतिविधियां उनपर ही आधारित होगी.. जैसा कि सेठ ने बिना जाने चोरी का सामान चुरा लिया.. लेकिन उनकी नियत पूरी तरह से खराब थी.. जिसका परिणाम उसने जेल जाकर चुकाया। वहीं अगर वो चोरी नहीं करता तो शायद चोर को जेल जाना पड़ता.. ये गुरुत्वार्षण के नियम के हिसाब से ही चलता है। जैसे आप हवा में कोई गेंद उछालते है तो वो लौट कर नीचे आती ही है वैसे ही कर्म कोई भूलवश नहीं होता.. आप अपनी पूरी सूझ बूझ और इच्छा के साथ कोई कर्म करते है। यहां गौर करने वाली बात ये है कि जो कर्म आपने किया उसके पीछे आपका इरादा क्या था। आपने जो कर्म किया क्या वो किसी लालच वश, किसी से घृणा के कारण, काम वश किया है तो आपके इन कर्मों के कर्मफल में  नकारात्मक प्रभाव आता ही आता है।

कर्मों का कर्मफल आपका भविष्य तय़ करता

उसके दुष्परिणामों की पूरी जिम्मेदारी भी कर्म करने वाले व्यक्ति पर होती है। उसके पूर्वजो के किये गए कर्मो का असर उसके आने वाली पीढ़ी पर सीधा नहीं पड़ता.. बौद्ध धर्म मूल पाप या फिर पिछली पीढ़ी के किये गए पापों से अपराधबोध महसूस करने की बात को पूरी तरह से नकारता है। किसी के किये गए कर्मो का फल किसी दूसरे को कभी नहीं भुगतना पड़ता.. व्यक्ति अपने कर्मो का मालिक खुद है.. आप ऐसा मान सकते है कि जो आप बोयेंगे वहीं आप काटेंगे.. कुल मिलाकर हम कह सकते है कि बौद्ध धर्म में पाप जैसे किसी कॉसेप्ट को मान्यता ही नहीं है.. यहां केवल कर्म की वैल्यू है.. कर्म जो आपकी रियल इंटेशन पर डिपेंट होते है.. और उसका रिजल्ट भी आपके इंटेशन से ही आता है। बौद्ध धर्म में केवल कर्मों का कर्मफल आपका भविष्य तय़ करता है, आपके कर्मो की कोई माफी नहीं होती।

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