ओडिशा की राजनीति का बड़ा चेहरा, जानिए पूर्व केंद्रीय मंत्री Srikant Jena का सियासी सफर

Srikant jena
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Srikant Jena: आपने शायद यह कहावत सुनी होगी कि मुश्किल समय में गधे को भी ‘पिता’ कहना पड़ सकता है। राजनीति में न तो परिवार मायने रखता है और न ही रिश्तेदारी—पैसा ही सबसे ऊपर होता है। जो कोई भी पार्टी को सत्ता दिलाने में मदद करता है, उसकी कई गलतियों को माफ कर दिया जाता है; राजनीति के कोई तय सिद्धांत नहीं होते—जीत की ओर ले जाने वाला रास्ता ही सिद्धांत बन जाता है, भले ही इसके लिए किसी ऐसे नेता को वापस लाना पड़े जिसे पहले बेइज्जत करके निकाला गया हो। असल में, 2024 में ठीक ऐसा ही हुआ जब कांग्रेस पार्टी ने ओडिशा के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीकांत जेना को वापस लाने के लिए हर संभव कोशिश की। वजह साफ थी: ओडिशा में कांग्रेस पार्टी की कमान जेना के हाथ में है, और पार्टी उनकी गैर-मौजूदगी से होने वाले नुकसान को बर्दाश्त नहीं करना चाहती थी। हालांकि इस कदम का काफी मजाक उड़ाया गया, लेकिन सवाल अब भी बने हुए हैं: कांग्रेस ने पांच साल बाद जेना को वापस क्यों बुलाया, और आखिर श्रीकांत जेना कौन हैं? हम इस लेख में इसी बारे में जानेंगे।

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कौन है Srikant Jena?

18 जून 1950 को ओडिशा के जाजपुर जिले के रत्नागिरी जिले में जन्मे जेना एक खंडायत समुदाय से आते है। खंडायत समुदाय को अप्रैल 2018 में समाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया है.. उनके पिता रघुनाथ जेना जो कि एक किसान थे तो वहीं उनकी मां सैलाबाला जेना एक हाउस वाइफ थी। उसकी 2 बहने औऱ 2 भाई थी। जेना का परिवार काफी बड़ा था। लेकिन तब भी वो अपनी सामाजिक और आर्थिक कमियो से जुझने के बाद भी शिक्षा हासिल करने के लिए गांव के बाहर जाते थे। स्कूली शिक्षा गांव से पूरी करने के बाद उन्होंने 1972 में उन्होंने भुवनेश्वर की उत्कल यूनिवर्सिटी के केंद्रपारा कॉलेज से बैचरल इन आर्ट्स में ग्रेजुएशन पूरा किया था। घरवालो को लगता था कि जेना बाकि परिवार वालो की तरह फार्मिंग ही करेंगे लेकिन कॉलेज के दौरान वो पॉलिटिकल एक्टीवीटिज में INTERST लेने लगे.. और छात्रों से जुड़े अलग अलग आंदोलनों और गतिविधियों में भाग लेने लगे। जिसने राजनीति में उनकी राह आसान कर दी।  वो अपने क्षेत्र में दलित और पिछड़ो के लिए आज उठाने लगे।

कांग्रेस में श्रीकांत जेना का कितना प्रभाव?

उनके मुद्दों पर वो जनता के लिए सदैव खजड़े रहते, जिससे वो सबकी पसंद बनते गए.. और इस लोकप्रियता का फायदा उन्हें 1977 में पहली बार जाजपुर जिले के बारी विधानसभा क्षेत्र से एक इंडीपेंडेंट केंडीडेंट के तौर पर चुनाव लड़ने के बाद भी मिली पहली ही जीत के तौर पर हुआ। उनकी जीत ने उन्हें जनता पार्टी की नजरो में ला दिया.. और उन्होंने जनता पार्टी के कांग्रेस के खिलाफ गठबंधन कर नीलमणि राउत्रे के नेतृत्व वाली सरकार में उद्योग व शहरी विकास राज्य मंत्री के तौर पर पद संभाला। मात्र 27 साल की उम्र में मिली ये उपलब्धि किसी भी पिछड़ी जाति वाले के लिए बेहद मायने रखती थी। वो पिछड़ो का एक बड़ा चेहरा बन गए थे। श्रीकांत जेना ने अपनी जीत को कभी अपने ऊपर हावी नही होने दिया। उनकी सादगी और उड़ीसा के एक बड़े वर्ग, जो वंचित औऱ पिछड़ी थी.. उनके लिए लड़ने की उनकी चाह ने उन्हें फिर से 1980, 1985 में फिर से प्रचंड जीत दिलाई। श्रीकांत जेना उड़ीसा के कद्दावर नेताओं में शामिल हो गए थे। और उनकी उपलब्धियों को देखते हुए उड़ीसा के 1989 के आम चुनावो में जेना को कटक निर्वाचन क्षेत्र सेझनता दल ने टिकट दी और उन्होंने भी अपनी पार्टी को निराश नहीं किया।

जेना ने कांग्रेस के एक कद्दार नेता और उड़ीसा के एक्स सीएम जानकी बल्लभ पटनाक को 1 लाख से भी ज्यादा वोटो के अंतर से पटखनी दी। एक एक्स सीएम को इतनी करारी शिकस्त देना ही श्रीकांत जेना के करियर का टर्निंग पॉइंट बन गया। इस दौरान जेना को वीपी सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार में Small-Scale Industries, Agriculture, and Rural Industries मिनिस्टर बनाया गया। 1991 और 1996 में भी वो इसी क्षेत्र से निर्वाचित हुए.. इस दौरान उन्होंने कांग्रेस को कभी इस क्षेत्र में मजबूत नहीं होने दिया। लेकिन 1998 में स्थानीय पार्टी बीजू जनता दल के प्रभात कुमार सामंतराय से वो हार गए। जिसके बाद वो करीब 11 साल सत्ता से बाहर रहे। इस बीच उनके प्रभाव को देखते हुए कांग्रेस ने उन्हे साधा और 2004 में कांग्रेस में शामिल कर लिया। 2009 में उन्होंने फिर से बालासर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और फिर से जीत का बिगुल बजा दिया। ये संकेत था कि शेर केवल शांत हुआ था। लड़ना नहीं भूला था। वो यूपीए के गठबंधन में स्वतंत्र प्रभार के साथ राज्य मंत्री बने, उन्हें Chemicals and Fertilizers and Statistics and Programme Implementation मिनिस्ट्री दी गई। हालांकि 2014 के आम चुनाव में न केवल कांग्रेस के शासन का अंत हुआ था बल्कि जेना भी बीजेडी के रबिंद्र कुमार जेना से 1 लाख वोटो से हार गए।

समय बीतता गया जेना अपना काम करते रहे, लेकिन साल 2019 में जेना ने कांग्रेस पर ही सवाल उठाये.. औऱ ओड़िसा खनन घोटाले को लेकर कांग्रेस सरकार पर ही पक्षपाती और भ्रष्ट होने का आरोप लगाया। हालांकि इस मामले में जब जेना पर ही आरोप लगे तो उन्होंने इस घोटाले को लेकर निष्पक्ष जांच की मांग तक कर डाली.. जिससे नाराज कांग्रेस आला कमान ने जेना को पार्टी से निष्कासित कर दिया। वो करीब 5 सालो तक पार्टी से दूर रहे.. लेकिन 2024 के आम चुनावों में कांग्रेस ने अपनी जमीन बनाये रखने के लिए फिर से जेना को पार्टी में शामिल कर लिया। जेना पर अक्सर अपने पद का दुरुपयोग का आरोप लगाया गया है लेकिन बावजूद उसके जेना आज उड़ीसा में कांग्रेस के लिए गेम चेंजर का काम करते है। वहीं एक नेता को लेकर विवाद उठना आम है.. लेकिन जेना की भूमिका राज्य में दलितों पिछड़ो के लिए काफी अहम है। वहीं उनकी वापसी के बाद 2029 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस किस स्थिति में होगी। इसपर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। फिलहाल जेना कांग्रेस के लिए उड़ीसा में जमीन तैयार कर रहे है।

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