Buddhist story: इस लेख को शुरू करने से पहले, मेरा आप सभी से एक सवाल है: आपका सबसे बड़ा डर क्या है? वह कौन सी एक चीज़ है—जिसके बारे में सोचकर ही आप अंदर तक कांप उठते हैं? हममें से ज़्यादातर लोग शायद एक ही जवाब देंगे: अपने प्रियजनों को खोना, उनसे दूर हो जाना, या बिल्कुल अकेला रह जाना। हम अक्सर उनसे इतनी मज़बूती से जुड़े रहते हैं कि हमें लगता है कि उनके बिना हमारी ज़िंदगी का मकसद ही खत्म हो जाएगा। हालाँकि, जब आप गौतम बुद्ध की समझ को अपना लेंगे, तो आपको एहसास होगा कि जब तक आप हर चीज़ और हर व्यक्ति से खुद को अलग नहीं कर लेते, तब तक आप ज़िंदगी का असली मकसद हासिल नहीं कर सकते। अकेलेपन में ही आप उस शक्ति को पहचान सकते हैं जो आपको मुक्ति की ओर ले जाती है। बुद्ध ने दुनिया को अकेलेपन की शक्ति से परिचित कराया; जो कोई भी इस शिक्षा—इस ज्ञान—को सच में समझता है, उसे कभी भी अकेले रहने से डर नहीं लगेगा। आइए, “अकेले रहने की शक्ति” के बारे में बुद्ध द्वारा दी गई बातों को जानें।
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बुद्ध ने दिया अकेले रहने का सिद्धांत
धम्मपद के गाथा 305 में बुद्ध ने कहा था- जो अकेला बैठता है,सोता है, अकेले चलता है,,वहीं ही एकांत में खुद को वश में कर पाता है, वो किसी भी परिस्थिति में सुख को पा लेता है। सैकड़ो मूर्खो की टोली में रह कर खुद को मूर्ख बनाने से बेहतर है कि अकेले रहिये औ ज्ञान को बढ़ाइये.. बुद्ध ने अपने महापरिनिर्वाण से पहले अंतिम बार दिये गए ज्ञान में अप्पो दीपो भवः का ज्ञान दिया था.. जिसका सार यहीं था कि हमें कोई नहीं बचा सकता, हमे अपने मार्ग का दीपक खुद बनना होता है, कोई हमारी रोशनी नहीं बनेगा.. अपना अंधेरा हमें खुद खत्म करना होगा.. कोई दूसरा उस अंधेरा को खत्म नहीं करेगा.. क्योंकि कर ही नही सकता है। बुद्ध ने अकेले रहने का सिद्धांत दिया था.. ये अकेला रहना कोई अकेलापन अपनाना नहीं बल्कि एकांत को चुनना है।
अकेलापन loneliness एक मानसिक बिमारी
दरअसल हम दोनो को एक ही संमझने की गलती कर बैठते है, लेकिन अकेलापन loneliness एक मानसिक बिमारी है,, वहीं एकांत SOLITUDE एक ऐसी शक्ति को प्रदर्शित करती है, जो आपको खुद के साथ प्रसंन रहने के लिए प्ररित करती है। आप एकांत से मानसिक शांति और सुख महसूस करने लगते है.. बुद्ध ने व्यक्ति को इसी एकांत को अपनाने का ज्ञान दिया है न कि अकेलेपन का। बुद्ध ने सदैव खुद को एक मार्गदर्शक बताया जो लोगो को ज्ञान देने के लिए आये थे। उन्होंने अपने जाने से पहले अंतिम प्रवचन में ये ज्ञान दिया था कि ज्ञान के लिए आपको खुद का मार्गदर्शक बनना चाहिए.. किसी दूसरे सहारे की तलाश करना व्यर्थ है। जब तक आप अने मन को नहीं तैयार करेंगे तब कर कोई भी मार्गदर्शन आपकी सहायता नहीं कर सकता है।
लगाव ही दुःख का कारण बनता है
भीड़-भाड़ आपको अनासक्ति से दूर ले जाती है। आप दूसरों से अपने लिए कुछ करने की उम्मीद करते हैं, और जब वे आपकी कोशिशों का वैसा ही जवाब नहीं देते, तो आपको दुख होता है; असल में, यह आपका अपना लगाव ही है जो इस दुख का कारण बनता है। ज़रा सोचिए: जब आप किसी अजनबी की मदद करते हैं, तो क्या आप बदले में कुछ उम्मीद करते हैं? नहीं। और अगर वे बदले में कुछ नहीं करते, तो आपको कोई परेशानी नहीं होती, क्योंकि शुरू से ही आपकी कोई उम्मीद नहीं थी। हालाँकि, अपनों के मामले में स्थिति अलग होती है। फिर भी, अगर आप सच में इन सांसारिक दुखों से ऊपर उठना चाहते हैं, तो लगाव छोड़ दें और एकांत को अपनाएँ। खुद पर गौर करें; धीरे-धीरे आपको एहसास होगा कि सभी भौतिक चीज़ें अस्थायी हैं, जबकि केवल आपकी मानसिक शांति ही स्थायी है।
एक बार आपने अकेले रह कर उस मानसिक शांति को पा लिया तो किसी के आने से, किसी से जाने से.. कुछ पाने से कुछ खो जाने के बाद भी आपको कोई असर नहीं होगा। ये ही वो बिंदू है जब आप बुद्धत्व को प्राप्त करने के पहली सीढ़ी पर होते है। अकेले रहना कोई श्राप नहीं बल्कि वरदान है,.. बस जरूरी ये है कि आप उसे किस नजरो से देखते है। आप अकेलेपन और एकांत के अंतर के समझ जाते है तो आपको कभी एकांत से डर नहीं लगेगा।



