Parliament of India: कैसे काम करती है भारतीय संसद? जानें लोकसभा, राज्यसभा और इसकी पूरी कार्यप्रणाली

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Parliament of India: 26 जनवरी 1950 को भारत एक गणराज्य देश बना और इस गणराज्य को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी दी गई देश के संसद पर, जो कि भारत गणराज्य की सबसे बड़ी सर्वोच्चय विधायी संस्था है, जो न केवल केंद्र को बल्कि राज्यों को संवैधानिक तरीके से चलाने के लिए एक साथ कार्य करती है। संसद, जिसमें दो सदन है, लोकसभा और राज्यसभा.. इनके चुनाव से लेकर उनके कार्य सभी में बंटवारा संसद ही तय करती है..,लोकतंत्र की, वोट की शक्ति क्या है भारतीय संसद उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। एक ऐसी विधायी संस्था, जहां देश का कानून तय होता है।  ये संसद ही है जो केंद्र की मनमानी को रोक सकता है। जिनके पास ये ताकत है कि वो सरकार को जबरन अपने फैसले थोपने से रोक सकती है। अपने इस लेख में हम भारतीय संसद और उसके अंगो के बारे में जानेंगे।

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भारत की संसद कैसे चलती है?

भारतीय संसद का गठन 26 जनवरी 1950 को हुआ था, जिन दिन भारत का संविधान लागू हुआ और भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित हुआ. जिसके बाद 17 अप्रैल 1952 में जब पहले आम चुनाव के बाद आधिकारिक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई संसद अस्तित्व में आई.. लेकिन तब तक संविधान सभा ही अंतरिम संसद के रूप में काम कर रही थी। संविधान में संसद का भी दुरुपयोग न हो, इसका भी ध्यान रखा गया और संसद की शक्तियो को राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा के बीच बेहद संतुलित तरीके से बांटी गई.. ताकि कोई भी उसका गलत फायदा न उठाये। किसी को भी असिमित ताकतें ही नहीं दी गई कि वो उसका गलत इस्तेमाल करें.. संसद में तीन मुख्य सत्र होते है.. बजट सत्र, मानसून सत्र औऱ शीतकालीन सत्र औऱ आर्टिकल 85 के अनुसार राष्ट्रपति को ये शक्ति मिली है कि वो सत्र बुलाए, लेकिन वो खुद किसी भी सभा में बहस का हिस्सा नहीं बन सकते। वहीं कोई भी सत्र 6 महीने से ज्यादा अंतराल का अंतर नहीं होना चाहिए। हालांकि केंद्र सरकार की विशेष मांग पर विशेष सत्र भी बुलाया जा सकता है।

लोकसभा जिन्हें निचला सदन कहा जाता है..यहां वो प्रतिनिधि चुन कर आते है जो सीधा आम चुनाव के जरिये जनता द्वारा चुने होते है। लोकसभा के अंदर सदस्य की संख्या 543 है, लेकिन अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार ने लोकसभा सीटो को बढ़ा कर 850 करने के लिए 131वीं संविधान संशोधन विधेयक पेश किया है, जो कि परिसीमन के बाद ही प्रभावी हो सकता है, वहीं केंद्र में सरकार बनाने  के लिए लोकसभा की सीटों में से 50 प्रतिशत से ज्यादा सीटो पर जीत होनी आवश्यक है,.. यानि की लोकसभा कि 543 सीटो में से 272 पर जीत तो होनी ही चाहिय़े। इसका कार्यकाल वैसे तो 5 साल का होता है लेकिन अगर ऐसी परिस्थिति बनती है कि लोकसभा आगे कार्य नही कर पा रही है तो राष्ट्रपति के पास ये अधिकार होगा कि वो उसे भंग कर दें। वहीं राज्यसभा असल में राज्यों का प्रतिनीधि करती है .. एक ऐसी स्थाई सभा जिसे कभी भंग नहीं किया जा सकता.. इसमें कुल 245 सदस्य होते है,, जिसमें से 233 सदस्य राज्यों के विधायकों द्वारा चुने जाते है तो वहीं 12 सदस्यों को राष्ट्रपति चुनते है जो कला साहित्य, समाज सेवा और विज्ञान के क्षेत्र के बड़े नाम होते है। किसी भी बिल के पास होने के लिए राज्यसभा के सद्सयों में से कम से कम 123 सदस्यों की अनुमति जरूरी है। कोई भी विधेयक जो संसद में पेश किया जाता है, उसे अंत में राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है आखिरी मंजूरी के लिए.. उनकी अनुमति के बिना कोई नया कानून लागू नहीं होगा।

वहीं जब साधारण बिल लाना हो तो दोनो सदनो के पास बराबर की शक्ति होती है.. दोनो सदनो से पास होना जरूरी है.. लेकिन राष्ट्रपति वीटो पावर इस्तेमाल करके पुनर्विचार के लिए भेज सकते है। धन विधेयक में लोकसभा के पास पूर्ण शक्ति होती है.. राज्यसभा केवल 14 दिनो तक रोक सकती है तो वहीं राष्ट्रपति  को मंजूरी देनी ही होगी। संविधान में संशोधन करना हो तो दोनो सदनो के पास बराबर की शक्ति होती है.. दोनो से मंजूरी मिलना अनिवार्य है। महाभियोग के दौरान लोकसभा के पास राष्ट्रपति को हटाने की ताकत होती है, राज्य के पास भी बराबर शक्ति होती है तो वहीं राष्ट्रपति को ही इमपीचमेंट का शिकार होना पड़ता है। अगर देश में आपातकाल लगा हो तो ऐसी स्थिति में लोकसभा भंग हो जाती है और सारी अहम फैसले राज्यसभा ले सकती है.. किसी भी हाल में किसी को भी एकछत्र ताकतें नहीं दी गई है.. ताकि कोई अपनी मनमानी न कर सकें। संसद के कार्यो से ही देश में कानू व्यव्स्था से लेकर राजनैतिक, और उसका संघीय व्यवस्था सुचारू काम कर पा रहा है। आपको ये जानकारी कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

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