Caste System and Manusmriti: हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था के लिए अक्सर मनुस्मृति को ही जिम्मेदार माना जाता है। जाति व्यवस्था के कारण जो भेदभाव, छुआछूत उंच नींच की कुरीति से भारतीय समाज आज भी त्रस्त है,… उसके लिए उन वेदों पुराणों को जिम्मेदार ठहराया जाता है.. मनुस्मृति को गालियां दी जाती है कि उसके कारण ही जाति व्यवस्था ने भारत में ऐसी पकड़ बनाई.. लेकिन क्या सच में ऐसा है.. जाति व्यवस्था वाकई में किताबों में है या लोगो की मानसिकता में.. न जाने कई सदियां बीत गई.. जाति और र्ण व्यवस्था चली आ रही है.. और धीरे धीरे जो शूद्र थे.. उनकी पतन शुरु हुआ औऱ उन्हें नीच समझा जाने लगा.. हमने पहले भी कई बार चर्चा की है कि वेदों में कहीं भी जाति व्यवस्था नहीं थी.. वहां वर्ण व्यवस्था है.. जिसके मुताबित व्यक्ति अपने कार्यों से वर्ण में बांटे जायेंगे.. लेकिन वो उनकी जाति नहीं होगी.. कहा तो ये भी जाता है कि आर्यो के भारत में आने के बाद वर्ण व्यवस्था को तोड़ मरोड़ कर जाति का नाम दिया गया.. और जो उनके अनुसार नहीं चले उन्हें अलग थलग कर दिया गया.. लेकिन सच तो यही है कि जाति इस वक्त एक ऐसा शिकंजा बन चुका जिसे खत्म किये बिना तरक्की नहीं हो सकती.. ऐसा क्यों.. जानेंगें इस लेख में..
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बाबा साहब की किताब The Annihilation of caste
जब बाबा साहब की किताब “The Annihilation of caste” पढ़ेंगे तो उसमें बाबा साहब ने साफ लिखा है कि जब तक जातिवाद है तब तक न तो सामाजिक रूप से औऱ न ही राजनैतिक रूप से तरक्की संभव है। जाति का विनाश होने के बाद भी हम एक ऐसे समाज की कल्पना कर सकते है जिसमें समता, समानता, न्यायपूर्ण और भाईचारे के साथ शासन व्यवस्था कायम की जा सकती है। बाबा साहब सोचते थे कि जो उनकी विचारधारा को समर्थित करता है, उनके दर्शन पर विश्वास करता है उसकी भी सोच ऐसी ही होनी चाहिए थी.. लेकिन विडंबना ये है कि मौजूदा समय में जाति का नाम लेकर सबसे ज्यादा रोना तो दलित और वंचित समाज के लोग ही रो रहे है। ये बेहद दुख की बात है कि बाबा साहब चाहते थे कि सभी सम्मान से रहे, संगठित रहे.. लेकिन शिक्षित होने के बाद भी उनके खुद के अंदर से जब जाति की भावना दूर नहीं हो रही है तो वो बाहरी समाज से भला कैसे लड़ेंगे।
राजनीति के लिए जाति में बंटवारे का मुद्दा
नतीजा लोग अपनी विचारधारा को बदलने का दिखावा तो बहुत कर रहे है, बाबा साहब के नाम का राग अलाप कर खुद को अंबेडकरवादी कहते है.. लेकिन बाबा साहब की एक भी विचार को अगर जीवन में आत्मसात करते हो तो कहें। राजनीति के लिए जाति में बंटवारे से बेहतर कोई मुद्दा मिल ही नही सकता है। जातियों के नाम पर उन्हें बांट कर एक दूसरे के खिलाफ ही इस्तेमाल कर अपनी रोटियां सेंकते है। और फिर रोना रोते है कि उनकी तरक्की नही हो रही है.. मगर हम आपसे पूछना चाहते है कि छोटे से बड़े नेता तक.. कितने है जिन्होंने जाति व्यवस्था को खत्म करने की मांग की हो.. सबको बराबरी चाहिए, हक चाहिए.. लेकिन किसी ने ये मांग क्यों नही रखी की जाति को ही खत्म कर दीजिए.. नही कर सकते ., क्योंकि वोट बैंक खत्म हो जायेगा।
हिंदू समाज में के धमनियों में समाई व्यवस्था
बाबा साहब मानते थे कि अगर जाति प्रथा को खत्न करना है तो अंतरजातीय विवाह होना चाहिए.. लेकिन जरा आप ऐसी विचारधारा को बोल कर ही देखियें.. अभी खून खराबा और आंदोलन न होने लगे तो कहिए.. सच तो ये ही है कि बाबा साहब की बातें केवल किताबों तक ही सिमित रह गई है.. अन्य उंची जातियों के लोगो को तो छोड़िये. जिसने के लिए उन्होंने आजीवन संघर्ष किया, वो पिछड़े और शूद्र भी उनके दर्शन को फॉलो नही करते है। जब तक जातिवाद का अंत नहीं होता तब तक सही मायने में स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा उत्पन्न हो ही नही सकता है। जाति केवल एक शब्द नही है। ये आज हिंदू समाज में के धमनियों में समाई व्यवस्था है, जो इतनी आसानी से नहीं निकलने वाली.. बाबा साहब के सही दर्शन को पढ़ने से, उसे समझने से ही आप इस शिकंजे से बाहर निकल सकते है। समाज की तरक्की चाहिए तो जातिगत भेदभाव को नहीं जातिवाद को ही समाप्त करना होगा.. तभी समाज में सही तरक्की संभव है। जिस तरह से आप केवल एक व्यक्ति को जाति व्यवस्था को इतना मजबूत बनाने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते है वैसे ही ये एक आदमी की कोशिश से खत्म नहीं होने वाला है.. सबसे पहले पहल खुद के घर से ही करनी होगी.. दलित पहले आपस में एकजुट हो जायें.. जब वो एकजुट होंगे तो शायद आगे की लड़ाई थोड़ी आसान हो जायेगी। आपको क्या लगता है क्या ये संभंव है।



