भारतीय लोकतंत्र की नींव पर आंबेडकर ने क्यों उठाए थे सवाल? जानिए पूरा सच – Dr. B.R. Ambedkar

Baba Shahab Ambedkar
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Dr. B.R. Ambedkar: आज की राजनीति का सबसे बड़ा नाम है. उनका नाम का जाप ऐसे किया जा रहा है जैसे राम नाम का जाप हो.. हम दोनो को एक दूसरे से कंप्येर नहीं कर रहे है.. क्योंकि दोनो एकदूसरे से अलग थे.. और दोनो को मानने वालों की अपनी अपनी मान्यतायें है.. लेकिन जैसा कि आपने सुना ही होगा.. राजनीति में न तो किसी का धर्म होता है और न ही किसी की जाति.. मुसिबत पड़े तो गधे को भी बाप बना लो.. ये कटाक्ष शायद थोड़ा तीखा हो सकता है.. लेकिन आज की राजनीतिक स्थिति की यहीं कड़वी सच्चाई है.. दलित पिछड़ी पार्टियो से लेकर कांग्रेस और बीजेपी जैसी बड़ी पार्टिया वैसे तो अपनी कट्टर हिंदूवादी, जातिवादी विचारदारा के लिए प्रचलित है लेकिन आज जब बाबा साहब एक बड़ा नाम है वोटबैंक को लुभाने के लिए… तो उनके नाम का जाप करने से भी वो बाज नहीं आ रहे है.. शायद ये लोकतंत्र की शक्ति है.. लेकिन शायद इसी शक्ति के कारण ही बाबा साहब ने भारत के लोकतंत्र की बुनियाद को ही अलोकतांत्रिक कहा था। अपने इस लेख में हम जानेंगे कि बाबा साहब ऐसा क्यों मानते थे..

जब हम बाबा साहब अंबेडकर के राजनैतिक करियर की बात करते है तो इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वो कांग्रेस के गांधी और नेहरू के आगे बेहद कच्चे खिलाड़ी थे। कांग्रेस के पास राजनीति के कई धुरंधर थे.. जिसके कारण अंबेडकर को हमेशा अलग थलग महसूस हुआ… उनके 1951 में इस्तीफे का कारण भी उन्हें अलग थलग करना ही था। बाबा साहब कहते थे कि किसी भी देश की नींव को संपूर्ण लोकतांत्रिक बनाने के लिए दो स्तंभो की आवश्यकता होती है.. पहली सामाजिक लोकतंत्र और दूसरा राजनीति लोकतंत्र.. संविधान ने हमें राजनीतिक लोकतंत्र तो दे दिया,, जहां जनता के वोट से सरकार तय होती है.. और वोट की ताकत ही सबसे बड़ी ताकत है लेकिन विडंबना ये है कि जब तक समाजिक लोकतंत्र के बिना राजनैतिक लोकतंत्र के कोई मायने नहीं है.. राजनैतिक लोकतांत्रिक अधूरा ही रहेगा.. लेकिन समस्या ये है कि भारतीय समाज जन्म आधारिक जातिगत और धार्मिक उंचनीच भेदभाव की नींव पर टिका है.. समाजिक बराबरी जातिगत भेदभाव के कारण कभी हो ही नहीं सकती है.. और सब तक ये भेदभाव रहेगा.. तब तक सामाजिक व्यवस्था के गुलाम बने रहेंगे..समानता की कमी रहेगी.. आपसी सौहार्द की बात तो छोड़ ही दिजिये.. ये तो कभी संभंव ही नहीं सकेगा।

बाबा साहब ने 4 नवंबर 1948 में संविदान सभा में खुद इस बात पर जोर देकर कहा था कि भारत में जब तक सामाजिक और राजनैतिक लोकतांत्रिक एक दूसरे पर परंपस्पर संबंधित नहीं होते तो जिस लोकतंत्र को हम देख रहे है वो केवल एक दिखावा मात्र ही है। सच तो ये है कि इस दिखावे की लोकतंत्र की बुनियाद ही अलोकतांत्रिक है.. बाबा साहब ने आजीवन समाज मे जातिगत भेदभाव, वर्ग और असमानता के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी लेकिन वो जानते थे कि वो जिस लड़ाई को लड़ते आ रहे है.. उसकी जड़े लोगो के रक्त में समाई हुई है. और उनसे उन्हें अलग नहीं किया जा सकता थ.. बाबा साहब खुद एक राजनेता नही थे.. वो तो केवल एक ज्ञानी थे, जो केवल अपने विवेक पर भरोसा करते थे।

उन्हें बातें बनानी नहीं आती थी.. उनका ये टेलेंट कहीं न कहीं उन्हें संविधान सभा ले गया। बंगाल के जोगेंद्र नाथ मंडल के सहयोग से बाबा साहब ने संविधान सभा मे जाने की राह तो बना ली थी और जैसोर खुलना सीट से जीत हासिल की थी, लेकिन ये बाबा साहब की किस्मत कहिए कि वो हिस्सा पाकिस्तान में चला गया औऱ बाबा साहब खड़े रह गए..लेकिन जैसा कि उंची जाति के लोगो की मानसिकता रही पिछड़ो और दलितो को इस्तेमाल करने की.. यहां भी यहीं किया गया। नेहरू और अंबेडकर की कभी भी नहीं.. नेहरू कभी नहीं चाहते थे कि बाबा साहब संविधानसभा में शामिल हो, लेकिन सरदार पटेल के हस्तक्षेप और बाबा साहब की मदद के बाद जब 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने ड्राफ्टिंग कमेटी का गठन किया तो उसी दिन बाबा साहब को चेयरमैन चुना गया था।

हालांकि भले ही कांग्रेस ने बाबा साहब को कानून मंत्री के तौर पर एक मुख्य पद तो दे दिया था लेकिन उनके हाथों में ताकते नही दी थी। वो 4 सालो से भी ज्यादा समय तक कानून मंत्री रहे, लेकिन संसद में भी बाबा साहब को जातिगत विरोध का सामना करना पड़ता था। उनके दिये गए प्रस्तावों को नकार दिया जाता था.. या टाल दिया जाता था। बाबा साहब जानते थे कि जब तक सामाजिक भेदभाव रहेगा राजनीति लोकतांत्रिक का बने रहना नामुमकिन है। ये दोनो एक दूसरे के आधार है, अगर एक कमजोर है तो दूसरे खुद ही कमजोर हो जाता है। हमने भारत को लोकतांत्रिक देश तो घोषित कर दिया लेकिन सही मायने में इसकी अंदरूनी व्यवस्था ही पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है.. इसलिए भारत के लिए लोकतांत्रिक के सही मायने कभी समझे ही नहीं जायेंगे। बाबा साहब की बातों से आप कितने सहमत है।

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