Chirag Paswan vs Jitan Ram Manjhi: हाल ही में बिहार की राजनीति में अनुसूचित जाति के लिए कोटे के अंदर कोटा दिए जाने को लेकर भरी उथल पुथल मची है। कोटे के अंदर कोटा होना चाहिए या नहीं उसे लेकर दो केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी और चिराग पासवान के बीच जुबानी जंग काफी तेज हो गई है। एक तरफ मांझी और उनके बेटे संतोष सुमन चाहते है कि आरक्षण की समीक्षा और उसका उप-वर्गीकरण होना चाहिए तो वहीं चिराग पासवान इसके खिलाफ है।
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चिराग पासवान ओऱ जीतन राम मांझी में जुबानी जंग
क्या आरक्षण का असली फायदा वाकई उन तक पहुँच रहा है जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है, या फिर SC/ST वर्ग के अंदर ही एक नई ‘एलीट क्लास’ तैयार हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने देश में आरक्षण की पूरी बहस को बदल कर रख दिया है। राजस्थान के कैबिनेट मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा का कहना है कि वे खुद डॉक्टर बने, उनके भाई IAS-IRS बने और वो मंत्री भी बन गए। लेकिन उनके गाँव का एक मजदूर 30 साल बाद भी पहाड़ ही खोद रहा है, रोहिणी आयोग के आंकड़े भी यही बताते हैं।
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दलितों में किसी भी तरह का बंटवारा नहीं
आरक्षण की 10 से 15% दबंग जातियां ही 80% से ज्यादा नौकरियों और दाखिलों पर कब्जा जमाए बैठी हैं। जबकि 60% से ज्यादा आबादी तक आरक्षण की पहली पीढ़ी भी नहीं पहुंची…जीतन राम मांझी और ओपी राजभर की मांग है कि SC/ST और OBC के भीतर सब-कैटेगरी (अति-पिछड़ों को अलग कोटा) बने, वहीं चिराग पासवान का कहना है कि दलितों में किसी भी तरह का बंटवारा नहीं होना चाहिए क्योंकि आरक्षण का आधार सामाजिक है, न कि आर्थिक, राजनीतिक नुकसान के डर से BJP और कांग्रेस दोनों ने ही इस संवेदनशील मुद्दे पर चुप्पी साध ली है। इतना ही नहीं चिराग पासवान ने आगे कहा कि अगर ऐसा होता है तो अनुसूचित जाति वर्ग के सभी लोगों के समता को ठेस पहुंचेगी।
आरक्षण में कोटे के अंदर कोटा
दो दलित नेताओं के बीच आरक्षण की समीक्षा और कोटे के अंदर कोटा दिए जाने को लेकर चल रही बहस देख कर साफ अंदाजा लगाया जा रहा है कि बिहार में दलित राजनीति में बड़ा बदलाव आने वाला है। ऐसे ने देखना ये होगा कि दलित असल में किसका नेतृत्व स्वीकार करते है। इसके अलवा आपको बता दें, 1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने 6-1 के बहुमत से फैसला दिया कि राज्य सरकारें SC/ST वर्ग के भीतर ‘सब-कोटा’ बना सकती हैं और ‘क्रीमी लेयर’ को आरक्षण के दायरे से बाहर कर सकती हैं ताकि सबसे वंचितों को हक मिले…कल तक जो दलील सवर्ण तबका अपनी सत्ता बचाने के लिए देता था कि यह समाज को बांटने की साजिश है। आज वही दलील आरक्षण का फायदा उठा चुका एक तबका अपने ही वंचित भाइयों का हक रोकने के लिए दे रहा है, सवाल यह है—क्या यह क्रीमी लेयर की अपनी सहूलियत है या असली सामाजिक न्याय?



