Deoria: हाल ही में यूपी के देवरिया से चौकाने वाला मामला सामने आया है, जहां जातिगत उत्पीड़न से एक 65 साल के दलित बुजुर्ग इतने ज्यादा परेशान हो गए थे कि मरने के बाद उन्होंने इस्लामिक रीति रिवाज से खुद को दफनाने की इच्छा रखी थी। जिसके बाद से अन्य हिन्दू समाज के लोग इस बात का विरोध कर रहे है।
धर्म न बदलने पर भी दलित हिंदू के शव को दफनाया
दरअसल, उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के देवरिया जिले (Deoria district) के सोनूघाट गांव (Sonughat Village) का यह मामला 65 वर्षीय दलित व्यक्ति मोहन प्रसाद की मौत के बाद सुर्खियों में आया. मोहन प्रसाद और उनकी पत्नी लंबे समय से मुस्लिम धार्मिक मान्यताओं और रीति-रिवाजों का पालन करते रहे हैं, जबकि उनके बच्चे हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। वही जब उसके अंतिम संस्कार की बात आई और शव को श्मशान ले जाया जा रहा था, तो उसके परिवार ने उसकी इच्छा का सम्मान किया लेकिन वहीं गांव के दूसरे हिंदू लोगो ने इनका विरोध शुरु कर दिया।
परिजनो ने पुलिस को बुलाया
इतना ही नहीं विरोध करने वालों का तर्क था कि सरकारी रिकॉर्ड और पारिवारिक पहचान के अनुसार, मृतक हिंदू (दलित) था; इसलिए, उसका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार किया जाना चाहिए। जिसके कारण मामले की गंभीरता को देखते हुए परिजनो ने पुलिस को बुलाया.. और विरोध कर रहे लोगो को वहां से शांत करके भेजा गया औऱ फिर इस्लामिक रिती रिवाज से दफना दिया गया। हैरानी की बात है कि पूरे परिवार में केवल मृतक औऱ उसकी पत्नी ही इस्लामिक रीति रिवाज को फॉलो करते है, जबकि बाकि परिवाह हिंदू धर्म को मानता है।
वहीं दस्तावेजों में वो अब भी हिंदू ही है.. वैसे ये कोई पहला मामला नहीं है.. जातिगत भेदभाव के कारण बहुत से दलित समाज के लोग धर्म बदले बिना ही दूसरे धर्म को फॉलो करने लगते है। हालांकि धर्म बदलने पर आरक्षण का लाभ न मिलने के बाद भी उत्पीड़न होता ही रहता है.. जिस कारण बहुत से दलित है जो चाह कर भी धर्म नही बदल सकते है.. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या धर्म बदलने के बाद जातिगत आरक्षण मिलना चाहिए या नहीं.. आपको क्या लगता है।



