Ambedkar: अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों की कई ऐसी कहानियां है जो शायद हर भारतीय के दिल में नासूर बन कर समय समय पर कुरेदता ही रहेगा, लेकिन उनके से ज्यादातर घटनाएं इंग्लैंड में बैठे आकाओं को खुश करने के लिए घटित हुई। इस तुष्टिकरण को संतुष्ट करने के लिए ही 24 साल के नौजवान युवक भगत सिंह और उनके दो साथियों को तयसमय से पहले चोरी छिपे फांसी पर चढ़ा दिया गया। न्याय अन्याय अब बाद में, पहले आकाओं को संतुष्ट करना जरूरी है तो सही गलत की कसौटी से हट कर भगत सिंह को फांसी देना ज्यादा जरूरी था। तभी तो अनैतिक तरीके से उन्हें चोरी छिपे फांसी दी गई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर आरोप लगता है कि अगर वो चहते तो ये फांसी नहीं होती, लेकिन वहीं बहुत लोग इस बात पर भी बहस करते है कि भगत सिंह की फांसी और उनकी मौत को लेकर बाबा साहब आंबेडकर ने कुछ क्यों नहीं किया। वकील तो वो भी थे, फिर उन्होंने कैसे क्यों नहीं लड़ा। तो आपको बताते है कि आखिर क्या सच में भगत सिंह की फांसी पर बाबा साहब खामोश थे। क्यों नहीं उन्होंने भगत सिंह का मुकदमा लड़ा था। जानेंगे बाबा साहब के उस लेख के बारे में, जिसने एक कड़वी सच्चाई को दुनिया के सामने ला दिया था।
क्या भगत सिंह की फांसी पर चुप थे आंबेडकर?
23 मार्च 1931 को शाम को 7 बजकर 33 मिनट पर एक ब्रिटिश अधिकारी की हत्या के मामले में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी की सजा दे दी गई.. बहुत से लोगो को शायद से पता नहीं है लेकिन ये फांसी 24 मार्च की सुबह 6 बजे दी जानी थी.. लेकिन लाहौर जेल के बाहर बढ़ते जन आक्रोश और आंदोलन को देखते हुए ब्रिटिश हुकुमत ने रिस्क लेना सही नहीं समझा और उन्होंने एक दिन पहले ही तीनो को फांसी पर लटका दिया.. ये घटना पूरे भारत में बेहद रोष का कारण बनी.. इस विश्वासघात को भारतीयो के लिए सहना आसान नहीं था.. जहां पूरे देश में गुस्सा और वेदना थी, तो वहीं दूसरी तऱफ देश के करोड़ो अछूतों और वंचितो की आवाज को बुलंद करने वाले बाबा साहब भीम राव अंबेडकर ने पहली बार इस फांसी के मुद्दे पर मराठी अखबार जनता में एक लेख लिखा.. जिसका टाइटल था तीन बलि-महान प्रणाली के तीन भेंट।
ये तीन बलि तीनो क्रांतिकारियों के बलिदान को लेखर कहा गया था। जिसमें बाबा साहब ने बेहद तीखे शब्दों में ब्रिटिश हुकुमत की अवहेलना की थी। बाबा साहब कभी भगत सिंह से नहीं मिले थे लेकिन वो दोनो की विचारधारा के कारण एक दूसरे का बेहद सम्मान करते थे। भगत सिंह को आप केवल क्रांतिकारी के रूप में जानते है लेकिन असल में उनकी दूरदर्शी विचारो के बाबा साहब भी कायल थे। जी हां साल 1928 में क्रीती नाम की पत्रिका में भगत सिंह ने एक लेख लिखा था.. शीर्षक था अछूत समस्या.. भगत सिंह ने उतनी छोटी सी उम्र में एक बड़ी बात कही थी… बाबा साहब की ही तरह दूरदर्शी सोच के धनी भगत सिंह ने अपने लेख में कहा अंग्रेजो से आजादी सही मायने में असली आजादी नहीं है, असली आजादी तो हमें तभी मिलेगी जब हम छुआचूत और जातिवाद से आजाद होंगे। दलित जब तक संगठित नहीं होंगे , तब तक उन्हें उनके अधिकार नहीं मिलेंगे।
बाबा साहब ने देश की आजादी की लड़ाई नहीं लड़ी थी बल्कि उन्होंने जातिगत भेदभाव की गुलामी को दूर करने की लड़ाई लड़ी थी.. भगत सिंह के लेख ये साबित करने के लिए काफी थे कि वो एक ऐसे समाज की परिकल्पना करते है जो हर तरीके से आजाद हो। भगत सिंह ने जब हत्या की तो वो भागने के बजाये वहीं खड़े रहे.. क्योंकि वो जानते थे कि आजादी बलिदान मांगती थी.. लेकिन उन्हें फांसी की सजा देना सरासर अन्याय था.. ये फैसला ट्रिव्यूनल कमेटी ने लिया था.. जो सही मायने में कुछ ब्रिटिश अधिकारियों को खुश करने के लिए लिए बनाया गया था। लेकिन जब अन्यायपूर्ण तरीके से जल्दबाजी में फांसी दे दी गई तब बाबा साहब का गुस्सा भी फूट पड़ा। उन्होंने एक तीखा लेख लिया.. जिसमें ब्रिटिश सरकार की कायरता को उन्होंने दुनिया के सामने ला दिया।
बाबा साहब ने लिखा ये तीन मौते कोई न्याय नहीं बल्कि राजनैतिक तुष्टिकरण के लिए की गई हत्यायें है। सरकार कितनी न्याय प्रिय है ये इससे ही साफ हो जाता है कि भगत सिंह और उनके साथियों के फांसी का फैसला कोर्ट ने नहीं ट्रिव्यूनल कमेटी ने लिया.. अगर सरकार सच में न्याय करना चाहती थी एक 23 साल के युवा को फांसी देने के बजाय उम्रकैद की सजा भी दे सकती थी, लेकिन कुछ उंची हस्तियों को खुश करने के लिए ब्रिटिश सरकार को ये अन्याय करना भी गंवारा था। बाबा साहब का ये लेख बताता है कि वो भगत सिंह की फांसी से कितने नाराज और दुखी थे। मगर बाबा साहब तो खुद एक बेहतरीन वकील थे..खुद लंदन से डिग्री हासिल की थी फिर उन्होंने भगत सिंह का मुरदमा क्यों नहीं लड़ा। बाबा साहब उस महाराष्ट्र में थे और भगत सिंह पंजाब के लाहौर में.. दोनो एकदूसरे से काफी दूर थे।
बाबा साहब अंबेडकर का राजनैतिक दायरा उस वक्त बढ़ना ही शुरु हुआ था.. वो दलितो के साथ साथ मजदूरो की आवाज बनने लगे थे। भगत सिंह ने जहां कानून तोड़ा था, हत्या की थी, तो वहीं बाबा साहब एक ऐसे व्यक्ति थे जो कानून के दायरे में रह कर कार्य करते थे, ऐसे में भगत सिंह का समर्थन उन्हें अंग्रेजी हुकुमत का दुश्मन बना सकता था.. जो उनके मकसद को पीछे कर सकता था। वहीं अगर बाबा साहब कोई अपील भी करते, कोई दलील भी करते तो बागी हो चुके भगत सिंह से पहले से ही ब्रिटिष हुकुमत खौफ खाती थी.. वो उन्हें किसी कीमत पर जिंदा नहीं रखना चाहती थी.. तो अंग्रेजो के कानों तक पहुंचती ही नहीं। वहीं भगत सिंह की तरफ से मशहूर वकील आसिफ अली और उनकी टीम भगत सिंह का केस लड़ रही थी… तो वहीं महाराष्ट्र में जातिगत भेदभाव के कारण बाबा साहब को एक एक मुकदमें के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता था।
उनका सारा फोकस दलितों और वंचितों के मामलो पर था। 1931 में गोलमेज सम्मेलन के दौरान जब बाबा साहब ने अपनी मांगो को रखा तो वहां वो स्वीकार कर लिया गया लेकिन भारत में इसका उल्टा हुआ.. अलग निर्वाचन क्षेत्र का मींग धरी की धरी रह गई.. तब बाबा साहब का समझ आया कि राजनैतिक ताकत के बिना वो किसी को रोक नहीं पायेंगे। जिसके बाद उन्होंने राजनैतिक ताकत की लड़ाई शुरु की.. भगत सिंह को फांसी हो गई.. लेकिन बाबा साहब की लड़ाई अब भी जारी थी। दोनो ने अपनी अपनी लड़ाई लड़ी थी.. भगत सिंह ने जहां क्रांति और इंकलाब का रास्ता अपनाया था तो वहीं बाबा साहब ने शिक्षा के माध्यम से और कानून के दायरे में रह कर संवैधानिक तरीके से लड़ाई लड़ी थी।



