UGC and Babasaheb Ambedkar: 20वी सदी की शुरुआत में साल 1910 में अंग्रेजी हुकुमत ने केरल में एक कानून लागू किया..जातिगत भेदभाव से हटकर सोच रखने वाले अंग्रेजों को भारत की सामाजिक स्थिति को समझना थोड़ा मुश्किल था.. उन्होंने कुछ हद तक भेदभाव मिटाने की कोशिश भी की.. इसी कड़ी में साल 1910 में केरल में कानून लाये कि दलितों और पिछड़ो को सवर्णो के साथ पढ़ने की इजाजत होगी। लेकिन जैसा कि हम सभी जानते है कि जातिगत भेदभाव जहां चरम पर हो वहां ऐसा कानून लागू करना कहां ही आसान होता। हालांकि 19वी सदी के मध्य में ही दलितो को शिक्षित करने की जो लड़ाई ज्योतिबा राव फूले ने शुरु की थी। आज उस लड़ाई को किसी भी कीमत पर हारने नहीं देने की जिम्मेदारी युवाओ पर है.. संविधान के अनुच्छेद 15 और 29 में धर्म, नस्ल जाति या जन्म के आधार पर बिना भेदभाव किये सबको समान शिक्षा का अधिकार दिया गया तो वहीं 2002 में हुए संशोधन अनुच्छेद 21ए में भारत के हर 6 से 14 साल के बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का मौलिक अधिकार तय किया गया.. लेकिन अब ये अधिकार खतरे में है।
जी हां, दलितों और पिछड़े छात्रो को बिना किसी भेदभाव के शैक्षणिक संस्थानों में समान शिक्षा मिल सकें.. उसके लिए साल 1956 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानि की UNIVETSITY GRANTS COMMISION बनाई गई। केंद्रिय शिक्षा मंत्रालय के अधीन भारत के सभी यूनिर्वर्सिटिज और कॉलेज को मान्यता देने और उसके सभी नियमों को तय करने की जिम्मेदारी यूजीसी की है। यूजीसी का गठन वैसे तो शैक्षणिक संस्थानों को जरूरी फंड देकर उनकी मदद करने के लिए किया गया है। लेकिन आज जो हर संस्थान में दलित और पिछड़ी जाति के बच्चे उंची शिक्षा हासिल कर रहे है। वो अधिकार यूजीसी के कारण ही उन्हें मिला है..उनकी पढ़ाई के लिए खर्च यूजीसी मुहैया करा रही है.. लेकिन अब यहीं खतरे में है। अगर दलित फिर से शिक्षा का अधिकार नहीं खोना चाहते है तो जरूरी है कि यूजीसी को बचाया जायें।
बाबा साहब अंबेडकर एक तरफ यूजीसी जैसी संस्था के बनाये जाने के पक्ष में थे तो वहीं एजुकेशन का प्राइवेटाइजेशन करने के वो सख्त खिलाफ थे.. दलित गरीब और वंचित है.. आर्थिक रूप से वो नीजि स्कूलों में अपने बच्चों को भेजने में सक्षम नहीं हो पायेंगे, वहीं जो जाते भी है तो उंची जाति वाले बच्चे उन्हें वहां रहने नहीं देंगे। लेकिन यूजीसी के नियम चाबुक का काम करते है उन बच्चो के लिए, जो नियमों की अनदेखी करते है..यूजीसी ने कुछ ऐसी ताकतें दी.. जिन्हें अब कुछ कट्टरपंथी छीनना चाहते है। पहले उन अधिकारों को जानते है।
यूजीसी के नियम के अनुसार सभी कॉलेज में एससी वर्ग को 15%, एसटी के लिए 7.5% और ओबीसी वर्ग के लिए 27 प्रतिशत सीटे रिसर्व करना कम्पलसरी है। यानि की इन सीटो पर इसी कैटेगरी के बच्चों को दाखिला दिया जायेगा। यूनिवर्सीटी किसी भी कीमत पर ये सीटे दूसरे कैटेगरी को अलोट नहीं कर सकता है.. जिसपर यूजीटी कड़ी नजर रखता है। वहीं वो बच्चो की उच्च शिक्षा पीएचडी जैसे कोर्स पूरे करने के लिए यूजीसी जूनियव रिसर्च फेलोशिप, एनएफएससी, एसएसएस, नेशनल फैलोशिप जैसी तमाम योजनायें शुरु की गई, ताकि बच्चों को आर्थिक रूप से कमजोरी के कारण पढ़ाई बीच में न छोड़नी पड़े। वहीं बच्चो तो जातिगत उत्पीड़न से बचाने के लिए और सुरक्षा के लिए एससीएसटी शिकायत निवारण सेल बनाने की घोषणा की, जो विनियम 2012 के तहत बनाया गया था। ये सेल छात्र हो या टीचर, भेदभाव करने वाले हर किसी पर लागू होता है। दलितों और निम्न जाति के बच्चों को पढ़ाई के लिए विशेष ध्यान दिया जाये उसके लिए यूजीसी कॉलेज प्रशासन को एक्ट्रा पैसे देती है। ताकि वो मुख्यधारा के छात्रो की बराबरी कर सकें।
इसे कई बार बदलने की कोशिश की.. जैसा कि साल 2007 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 13 प्लाइंट रोस्टर लागू किया था, जिसके मुताबिक 13 नियुक्तियों को अलग अलग पदों में विभाजित किया गया और विभागो को एक इकाई माना गया न ही विश्वविद्यालय को, जिससे आरक्षित सीटें लगभग खत्म हो गई थी, लेकिन इस नियम का बहुत विरोध हुआ जिसके बाद कोर्ट को फैसला बदलना पड़ा और 200 प्वाइंट रोस्टर लागू किया गया, जिसमें पूरी यूनिवर्सीटी को एक यूनिट माना गया। वहीं अभी बीते वर्ष यूजीसी के कुछ नियमों को लेकर बड़ी बहस हुई। यूजीसी एक नियम लाने की कोशिश की थी कि जिस वर्ग के बच्चे पूरे नहीं है, उन्हें डीरिजर्व करके जनरल बच्चो को दे दिया जायें। इस नियन को लेकर भी बच्चे और विपक्ष दोनो ही सड़को पर उतर आये विरोध में। जिससे नए नियम को कैंसिल करना पड़ा..वहीं यूजीसी को खत्म करने की मांग पर भी तीखे बहस होते रहते है, लेकिन ये तो तय है कि यूजीसी के हटने से नेपोटिज्म बढ़ेगा।
योग्य कैंडिटेट के बजाये जाति के आधार पर सिलेक्शन शुरु हो जायेगा। यूजीसी सहीं मायने में समाजिक धारा को बराबरी में लाने में अहम रोल निभा रही है। जो बिना किसी भेदभाव और बाहरी ताकतो के इशारे के बिना अपना काम पूरू इंमांदारी से निभा रही है। यूजीसी ने बाबा साहब के उस सपने को भी साकार करने में अहम भूमिका निभाई.. दलितों और सवर्णो को एक साथ लाने में शैक्षनिक संस्थानो सबसे आगे है.. जहां बिना किसी जातिगत भेदभाव के बच्चे शिक्षाहासिल करने की कोशिश कर रहे है। यूजीसी सही मायने में केवल छात्रों के लिए ही नहीं बल्कि दलित छात्रो के लिए एक वो पुल हो जो आपको इस भेदभाव वाले समाज की दूसरी तरफ ले जाता है, जहां सम्मान और समावता है। इसलिए जरूरी है कि यूजीसी को बचाया जा सकें। जो अधिकार आपको मांग कर नहीं मिलते, उसे छीन लिजिये। यूजीसी आपको ये हक देता है। इसलिए यूजीसी के नियम औऱ यूजीसी हमेशा बने रहना चाहिए।



