Dr B R Ambedkar: ब्राह्मणों ने सबसे पहले दलितों और पिछड़ों से शिक्षा का ही अधिकार छीन लिया, ताकि वो कभी इस अज्ञानता से बाहर ही न आ पाए कि अपने सही अधिकारों के लिए शिक्षित होना जरूरी है। यूंही शिक्षा को शेरनी के दूध से कंपेयर नहीं किया गया, जो पियेगा वो दहाड़ेगा। ये बोल थे दलितों के मसीहा बाबा साहब डॉ भीम राव आंबेडकर के। जिन्होंने समाज के वंचित वर्गों के लिए न केवल आवाज उठाई बल्कि उनके हाथों में वो जादुई चाभी भी थमाई थी जिसके जरिये वो अपनी बंद पड़ी किस्मत का ताला खोल सकते थे, जो समाज में बराबरी और सम्मान का जीवन जीने का रास्ता इख़्तियार करने के लिए था। अपने इस वीडियो में हम बात करेंगे बाबा साहब के इस चमत्कारी हथियार के बारे में, जिसके दम पर न केवल समाज बल्कि पूरा का पूरे देश की सामाजिक व्यवस्था बदली जा सकती है। क्या था वो हथियार, जो बाबा साहब के जाने के बाद भी उनकी धरोहर बन कर अनंत काल तक पिछड़ों और दलितों का सबसे बड़ा हथियार रहेगा।
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ब्राह्मणों की घृणा और जलन ने अछूत बनाया
बाबा साहब की किताब शूद्र कौन थे में बाबा साहब ने सनातन धर्म के प्रमुख ऋगवेद में चतुर्थ वर्णव्यवस्था को सिरे से नकारा और शूद्रों को चौथे वर्ण में शामिल किए जाने का पूरी तरह से खंडन करते हुए कहा कि केवल तीन ही वर्ण थे, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य।। लेकिन किसी बात पर ब्राह्मणों का क्षत्रियों से विवाद हो गया और क्षत्रियों का ब्राह्मणों ने बहिष्कार कर दिया। उन्हें सामाजिक व्यवस्था से अलग थलग कर दिया, उनसे शिक्षा, संस्कृति, नियम धर्म के पालन का हक छीन लिया, और धीरे धीरे वो गरीब और सभी व्यवस्था से विहीन हो कर अलग थलग हो गए। यानि की शूद्र कभी भी अछूत थे ही नहीं.. उन्हें ब्राह्मणों की घृणा और जलन ने अछूत बनाया था। खास कर जिस समाज में ब्राह्मणों की बोली ईश्वर का संदेश होता था, वहां तथाकथित अंधविश्वास से भरी जनता को बरगलाना कितना ही मुश्किल होता।
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बाबासाहेब अंबेडकर और मास्टर की
ब्रहामणों के खिलाफ जाने की दुष्साहस कौन करता.. और जो अलग थलग हो गए, वो अछूत हो गए.. कई सदियां बीत गई.. और शूद्र इसी व्यवस्था के साथ जीना भी सीख गए, लेकिन जब अंग्रेज भारत आये तो उन्होंने समानता को लाने के लिए एक साथ पढ़े जाने वाले स्कूल खोले.. जातिगत भेदभाव के होने के बाद भी शूद्रो को बच्चो को दाखिला देने से नहीं रोका जा सकता था। और इस तरह से वो शिक्षित होना शुरु हुए.. उन्हें न केवल शिक्षा का महत्व पता चला बल्कि शिक्षा जातिगत भेदभाव औऱ उत्पीड़न को खत्म करने में एक मजबूत स्तंभ का रोल निभाने वाला है, ये भी समझ आया। हालांकि सवर्णो और ब्राह्मणों के प्रभाव के कारण 19सदी तक वो खुल कर आवाज उठाने से कतराते थे.. लेकिन 20 सदी में जब बाबा साहब की एंट्री हुई तो बहुत कुछ बदल गया।
दलित और पिछड़े समाज के लिए वो लड़ाई लड़ेंगे
बाबा साहब बचपन से बेहद कुशाग्र बुद्धि के थे, इसलिए उनके पिता ने उन्हें शिक्षित करने का फैसला किया। ये खुद बाबा साहब की भी इच्छा थी कि वो शिक्षा हासिल करें.. वो कहते थे कि किस ग्रंथ में लिखा है कि शुद्रो को नहीं पढ़ना चाहिए। तमाम संघर्ष किया केवल स्कूल में दाखिला लेने के लिए.. चुंकि अंग्रेजी सरकार का ऑर्डर था तो दाखिला तो मिल गया लेकिन वहां फैली भेदभाव की जड़ो को वो दूर नही कर सकें.. लेकिन वहां उनके साथ हो भी हुआ.,उसने उनकी उस जिद को और मजबूत कर दिया.. कि वो बड़े होकर दलित और पिछड़े समाज के लिए वो लड़ाई लड़ेंगे, जिससे पूरी समाजिक व्यवस्था ही बदल जायेगी।
बाबा साहब के पास 32 डिग्रियां
बाबा साहब ने तमाम अभावो के बीच भी शिक्षा हासिल करना नही छोड़ा.. वो दूसरे क्रांतिकारियों की तरह कानून को हाथ में लेकर नही बल्कि कानून के दायरे में रह कर युद्ध जीतने पर विश्वास करते थे। उन्होंने अमेरिका और लंदन जैसे नामी जगहो से डिग्रियां हासिल की.. बाबा साहब के पास 32 डिग्रियां थी.. इसी शिक्षा के दम पर उन्होंने देश के मजदूरो के लिए एक पूरा यूनियन तैयार कर दिया.. जो बिना किसी खूनखराबे के एकजुट होकर मजदूरों के हक की आवाज उठाते थे। उनकी शिक्षा और दूरदर्शिता की ही देन थी कि भारी छुआछूत के बीच भी भारत का संविधान लिखने की जिम्मेदारी बाबा साहब को ही दी गई थी।
बाबा साहब ने अपना उदाहरण पेश करते हुए कहा था कि आपको अपनी लड़ाई जीतनी है, समाज में बदलाव चाहिए तो सबसे पहले आपको खुद को बदलना होगा। खुद को नीच मानने के बजाय उनकी बराबरी कैसे कर सकते है वो सोचिये। उनकी तरह शिक्षित होईये। शिक्षा से आपको अपने अधिकारो का पता चलेगा, लेकिन वो आप अकेले हासिल नहीं कर सकते है इसके लिए खुद को एकजुट करें..और सबसे बड़ी बात कभी भी कानून के दायरे से बाहर जाकर कोई कदम नहीं उठाईये.. कानून के संरक्षण में रह कार्य करने से आप सुरक्षित रह सकते है। बाबा साहब ने संविधान में शिक्षा नाम की चाभी सभी पिछड़े वंचितों के हाथों में थमाई थी, लेकिन उस चाभी से अपनी किस्मत का ताला खोलने की जिम्मेदारी तो आपकी खुद की है। बाबा साहब ने आपको मजबूत करने के लिए आरक्षण दिया.. लेकिन वो आरक्षण जरूरतमंद तक पहुंचे, उसकी जिम्मेदारी तो बहुजन समाज के अपने कंधे पर है। जब तक बहुजन, पिछड़े वंचित खुद में एकजुट नहीं होंगे, शिक्षा का ये हथियार भी आपको भेदभाव के खिलाफ चल रहे इस युद्ध को नहीं जिता सकता है। अपनी तकदीर बदलने की ताकत अपने ही हाथो में है,.. बस रास्ता सही होना चाहिए।


