Dr BR Ambedkar: बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा पाने के लिए जो संघर्ष किया, वह शायद उनसे पहले दलित या पिछड़े वर्गों के किसी भी व्यक्ति के लिए अभूतपूर्व था। बाबासाहेब ब्रिटिश शासन को असली गुलामी नहीं मानते थे, क्योंकि दलित पहले से ही जाति-व्यवस्था की गुलामी में जकड़े हुए थे। अगर कोई सच में गुलामी के अनुभव को समझ सकता था, तो वह बाबासाहेब ही थे—एक ऐसा व्यक्ति जो पहले आर्थिक तंगी की कैद में था और बाद में अपने सपनों को पूरा करने की धुन में बंधा हुआ था। इस गुलामी की बेड़ियाँ इतनी कसकर बंधी थीं कि PhD करने के बाद भी वे जाति-आधारित भेदभाव से बच नहीं पाए; उन्हें एक बड़े दफ़्तर में नौकरी तो मिल गई, लेकिन सिर छिपाने की जगह पाने के लिए उन्हें दर-दर भटकना पड़ा। सच तो यह है कि बड़ौदा रियासत में नौकरी करते हुए बाबासाहेब को ऐसी ही दयनीय स्थिति का सामना करना पड़ा था। आइए जानें कि तब क्या हुआ जब आजीविका कमाने का मौका होने के बावजूद, भेदभाव ने उनसे सब कुछ छीन लिया।
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बड़ौदा संघर्ष का घटनाक्रम
बाबा साहब के पिता रामजी मालोजी सकपाल ब्रिटिश सेना में सूबेदार के तौर नियुक्त थे..इसी के साथ वो इंग्लिश और मैथ में बेहद कुशाग्र थे, जिस कारण वो आर्मी के स्कूल में टीचर के तौर पर काम करते थे। भले ही वो एक अछूत जाति से थे, लेकिन ब्रिटिश सेना में उनका बेहद सम्मान किया जाता था.. उनकी ये ही कुशाग्रता बाबा साहब अंबेडकर को भी मिली। शिक्षा पाने के लिए जो उन्होंने संघर्ष किया उससे तो हम सभी वाकिफ है.. लेकिन बाबा साहब पहले वो दलित छात्र थे जिन्होंने अपने गांव से दसवी की परीक्षा पास की थी। उनकी इस उपलब्धि की कहानी तब के बड़ौदा रियासत के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय के कानों में भी पड़ी। बाबा साहब को पढ़ने के लिए आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा था, इसकी खबर जब सयाजीराव को लगी तो उन्होंने तुरंत बाबा साहब को स्कॉलरशिप देने की पेशकश रखी। फिर क्या था.. बाबा साहब को जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया था।
10 सालो तक बड़ौदा रियासत के लिए नौकरी
उन्होंने तुरंत हामी भर दी.. लेकिन सयाजी ने एक शर्त भी रखी थी। दोनो के बीच अनुबंध हुआ था कि पढ़ाई पूरी करने के बाद बाबा साहब को बड़ोदा रियासत में नौकरी करनी पड़ेगी.. सही मायने में तो ये बाबा साहब के लिए बड़ा अवसर था.. 1912 में जब बाबा साहब ने बॉम्बे यूनिवर्सिटी से बीए (B.A.) किया.. उसके बाद कॉन्ट्रेक्ट के अनुसार उन्हें जनवरी 1913 में बड़ौदा रियासत में नौकरी करने जाना पड़ा। जहां उन्हें बड़ौदा राज्य की अकाउंटेंट जनरल के कार्यलय में बतौर प्रोबेशनर नियुक्त किया गया था, लेकिन फरवरी 1913 में उनके पिता की मृत्यु हो गई और उन्हें वापिस बॉम्बें लौटना पड़ा.. लेकिन बाबा साहब को आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाना था, और उन्होंने छात्रवत्ति के लिए बड़ौदा रियासत के सयाजी गायकवाड़ से ही आवेदन किया। जिसे लेकर दोनो के बीच 4 जून 1913 को एक और अनुबंध हुआ.. जिसके अनुसार न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए बड़ौदा रियासत सलाना 230 पाउंड देने के लिए राजी हुआ.. लेकिन इसी के साथ एक और कॉन्ट्रेक्ट हुआ.. जिसमें बाबा साहब को विदेश से पढ़ाई पूरी करके लौटने के बाद 10 सालो तक बड़ौदा रियासत के लिए नौकरी करनी पड़ेगी।
बाबासाहेब समाज की नजरों में ‘अछूत’ ही बने रहे
बाबासाहेब सितंबर 1917 में अमेरिका से लौटे और वादे के मुताबिक, उन्हें बड़ौदा रियासत में मिलिट्री सेक्रेटरी नियुक्त किया गया। यह एक बहुत प्रतिष्ठित पद था—जिससे उनकी सभी आर्थिक परेशानियां दूर हो सकती थीं और उनके परिवार के लिए आरामदायक जीवन सुनिश्चित हो सकता था—फिर भी, विडंबना यह है कि इतने ऊंचे पद पर होने के बावजूद, वे उन सामाजिक कठिनाइयों से नहीं बच पाए जिनका उन्हें सामना करना पड़ा। हालांकि विदेश में शिक्षा प्राप्त करने से उन्हें पेशेवर सम्मान मिला, लेकिन समाज की नजरों में वे ‘अछूत’ ही बने रहे—एक ऐसा व्यक्ति जिसे तिरस्कार और बहिष्कार का सामना करना पड़ा। अपने प्रतिष्ठित पद के बावजूद, बाबासाहेब को रहने के लिए घर खोजने में संघर्ष करना पड़ा; वे जहां भी जाते, अपनी जाति का पता चलने पर उन्हें लौटा दिया जाता था। आखिरकार, घोर निराशा में, उन्होंने अपनी जाति छिपाकर एक छोटे से किराए के घर में रहना शुरू कर दिया। हालांकि, पड़ोसियों को किसी तरह उनकी पहचान का पता चल गया, और स्थानीय लोगों द्वारा घर जलाने की धमकी दिए जाने के बाद, उन्हें रातों-रात घर खाली करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
बाबा साहब ने किसी तरह रियायत के एक बगीचे में रोते रोते रात बिताई थी। लेकिन वो समझ गए थे कि जाति का अपमान पद पा लेने से भी कम नहीं होने वाला और मात्र दो महीने के बाद ही नवंबर 1917 में उन्हें नौकरी छोड़ कर वापिस बम्बई लौटना पड़ा। एक नौकरी जो उनके सारे दुखो को दूर कर सकती थी.. वो उनके हाथों से निकल गई। हैरानी तो इस बात की है कि खुद सयाजी गायकवाड़ भी बाबा साहब की कोई मदद नहीं कर सकें.. क्योंकि समाजिक संरचना से लड़ने की ताकत तो उन में भी नहीं थी.. औऱ दस सालों के लिए किया गया अनुबंध मात्र 2 महीने में ही टूट गया। जातिगत भेदभाव ने सही मायने में बाबा साहब से एक बेहतरीन जिंदगी छीन ली थी।



