Article 356: जून 2018 में BJP ने जम्मू कश्मीर की सत्तारूढ़ पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) के साथ अपना गठबंधन तोड़ने का फैसला किया, नतीजा पीडीपी की मुखिया और तत्कालीन सीएम महबूबा मुफ्ती के पास किसी और पार्टी का समर्थन न होने के कारण पद से इस्तीफा देना पड़ा, और केंद्र को मौका मिला जम्मू कश्मीर की विधासभा भंग करने। संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत सरकार ने जम्मू कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू कर दिया, जिनके 6 महीने बाद वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। जम्मू कश्मीर के कई दिग्गज नेताओं को लंबे समय तक हाउस अरेस्ट करके रखा गया। और ये शासन 2024 के विधानसभा चुनावों से पहले तक लागू रहा। इस दौरान केंद्र ने जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा धारा 370 खारिज कर दिया। वहां सेना का अधिकार चलने लगा। अब सवाल ये है क्या केंद्र सरकार यूँही कहीं इतने लंबे समय तक राष्ट्रपति शासन लगा सकती हैं, वहीं इस दौरान ताकत किसके पास होती है और उन ताकत के बल पर क्या क्या किया जा सकता है। राष्ट्रपति शासन किसी भी राज्य के लिए वरदान है या अभिशाप। इस लेख में हम राष्ट्रपति शासन के बारे में विस्तार से जानेंगे। ये कैसे क्यों लगाया जाता है और कैसे काम करता है।
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जानें क्या है राष्ट्रपति शासन आर्टिकल 356
भारतीय संविधान के आर्टिकल 356 में राष्ट्रपति शासन को लागू करने का प्रावधान बताया गया है। वहीं आर्टिकल 355 और आर्टिकल 365 में राष्ट्रपति शासन का आधार बताया गया है। आर्टिकल 355 के मुताबिक भारत का कोई भी राज्य जो संवैधानिक विफलता से गुजर रहा है। राज्य सरकार टूट गई है, और किसी के पास भी सरकार बनाने की शक्ति नहीं है तो ऐसी सूरत में उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है। वहीं आर्टिकल 365 के मुताबिक अगर कोई केंद्र के आदेश और निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है तो वहां केंद्र के पास ताकत होगी कि वो उस राज्य में विधासभा को भंग करके राष्ट्रपति शासन लगा सकती है। ये किसी भी राज्य एक राज्य में लगाया जाता है। वहीं राष्ट्रपति शासन लगाने के बाद दो महीने के अंदर राज्यसभा और लोकसभा का अनुमोदन मिलना आवश्यक है।
जिसमें राज्यसभा 2 महीने और लोकसभा से एक महीने में अनुमोदन मिलना अनिवार्य है। वहीं राष्ट्रपति शहन को लागू करने के लिए किसी विशेष बहुमत की भी जरूरत नहीं होती है। लोकसभा और राज्यसभा का आम बहुमत मिलने से ही ये लागू हो जाते है। वहीं राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद भी आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं होता। इसका असर केवल राज्य की विधानसभा और कार्यकारी शक्तियों पर पड़ता है। ऐसे में विधानसभा भंग कर दी जाती है या निलंबन कर दिया जाता है। ऐसे में केंद्र के पास उस राज्य की सारी वित्तीय शक्ति होती है। और उस राज्य के लिए अध्यादेश लाया जाएगा कि उसपर शासन कैसे किया जाएगा, और संसद उस राज्य के लिए कानून बनाएगी।
राष्ट्रपति शासन लागू करने के बाद 6 महीने तक राष्ट्रपति शासन चलता है। जिसके बाद भी अगर वहां फिर से विधानसभा नहीं बनती तो राष्ट्रपति शासन की अवधि छह महीने और बढ़ाई जा सकती है। ऐसे केंद्र तीन साल तक कर सकती है। लेकिन उसके लिए दो शर्ते लागू होती है। जिसमें पहली की चुनाव आयोग को ये विश्वास हो कि अभी राज्य की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह चुनाव कराया जाएं वहीं दूसरी शर्त ये है कि किसी भी क्षेत्र में नेशनल इमरजेंसी चल रही हो।
इसका दुरुपयोग कैसे रोके
राष्ट्रपति शासन के लागू होने को लेकर उसके दुरुपयोग की बातें उठी तो सांसद ने कुछ सख्त प्रावधान बनाए। जिसमें एस.आर. बोम्मई मामला (1994), सकरीया आयोग की सिफारिशें 1983, और संसदीय अनुमोदन जैसे कुछ फैसले शामिल है। इसके लिए उन्हीं राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू होगा जहाँ राज्य सरकार ने बहुमत खो दिया हो, राज्यपाल द्वारा वहां की स्थिति को देखते हुए राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की जाए। वहीं कोर्ट खुद ये जांच करेगी कि राष्ट्रपति शासन किसी निजी फायदे के लिए तो नहीं लगाया गया है। वहीं राष्ट्रपति शासन तभी लगे जब राज्य में संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह से खत्म हो गई हो।
इन फैसलों से ये तय किया गया कि केंद्र राष्ट्रपति शासन के नाम भी उस राज्य को प्रताड़ित न करे। जिनकी सोच भले ही केंद्र से न मिलती हो लेकिन उनकी कार्यशैली पूरी तरह से संवैधानिक हो। ये उसी स्थिति में हटाया जाता है जब सरकार दुबारा बन जाए। जिसके बाद सेना का शासन हटा कर फिर से विधानसभा चुनाव होते है और एक नई राज्य सरकार की गठन किया जाता है, और राज्य सरकार फिर से संवैधानिक तरीके से शासन शुरु कर देती है।



