Diwali and Buddhism: हिंदू धर्म के पवित्र धार्मिक त्यौहारों में से एक दीपावली को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के 14 साल का वनवास करके लौटने की खुशी मनाने के लिए दीपोत्सव के रूप मे मनाया था। उस दिन पूरे अयोध्य में दीप चलाकर कार्तिक अमावस्या की रात को रोशनी से जगमगा कर पूर्णिमा की रात बना दी गई थी। दीपावली को लेकर ये कथा कई सदियों से सुनी और पढ़ी जाती रही है, चुंकि भारत के हिंदू प्रधान देश है तो इस कथा का भार और प्रभाव भी ज्यादा है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दीपावली का बौद्ध धर्म से भी कोई संबंध होगा.. क्या आप ये जानते है कि बौद्ध धर्म और बुद्ध को मानने वालों के लिए भी दीपावली का विशेष महत्व होता है.. ऐसे में सवाल ये है कि आखिर दीपावली वाकई में हिंदू धर्म का पर्व है या फिर बौद्ध पर्व.. और बौद्ध धर्म में दीपावली का क्या महत्व है।
दीपावली का वास्तविक इतिहास
दरअसल हिंदू धर्म में दीपावली क्यों मनाई जाती है उसकी कहानियां सदियों से प्रचलित है, लेकिन बौद्ध धर्म में भी दीपावली मनाई जाती है.. जिसका इतिहास गौतम बुद्ध के एक बार नहीं बल्कि दो दो बार अपनी राजधानी कपिलवस्तु लौटने से जुड़ा है। हम सभी जानते है कि गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व लुंबिनी नाम की जगह पर हुआ था, जो कि उनके पिता राजा शुद्धोधन की राजधानी कपिलवस्तु से आज के समय के अनुसार 25 से 27 किलोमीटर दूर थी।
उनकी मां जब गर्भवति थी तब वो अपने मायके, कोलिये वंश की राजधानी देवदेह जाने के लिए निकली थी, लेकिन लुंबिनी में ही उन्हें प्रसव पीड़ा हुई और उन्होंने बुद्ध को जन्म दिया। जिसके बाद वो नवजात शिशु को लेकर अपने मायके चली गई , लेकिन 7 दिनों के बाद ही उनका निधन हो गया.. जिसके बाद उनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने ही उनकी परवरिश की थी।
राजपाठ छोड़ बने वैरागी
एक राजकुमार के तौर पर बुद्ध को सारी सुविधायें, भोग विलास औऱ खुशी दी गई थी। कोई दुख उनके पास न आये इसका सारा बंदोबस्त किया गया था। लेकिन फिर भी उन्हे वैराग्य और घर त्यागने से नहीं रोक सकें.. पिता को उम्मीद दी बेटा उनका राजपाठ संभालेगा, लेकिन बुद्ध को तो लोगों को ज्ञान का वो पाठ देना था, जिनके लिए उनका जन्म हुआ था। रात के अँधेरे में पत्नी और बेटे को सोता छोड़ कर उन्होंने घर त्याग कर दिया। वो वैरागी हो गए थे।
और जैसा कि हम सभी जानते है कि एक बार घर त्याग कर जो वैरागी बनता है वो संसारिक मोह माया से दूर हो जाता है, उसका की परिवार नहीं होता,.. बुद्ध ने तो यहीं ज्ञान प्राप्त किया था कि संसारिक मोह ही उनके सारे दुखो का कारण है, इसलिए उन्होंने कभी परिवार के बारे में चर्चा तक नहीं की थी, लेकिन बुद्धत्व प्राप्त करने के करीब 18 सालो के बाद उनकी पिता की अंतिम इच्छा को पूरी करने के वो वापिस कपिलवस्तु गए थे।
बुद्ध का स्वागत दीप जला कर किया
उनके पिता चाहते थे कि बुद्ध अपने परिवार को औऱ कपिलवस्तु के वासियों को धम्म का मार्ग दिखायें, साथ ही वो परिवार के सदस्यों को बौद्ध संघ में दीक्षित करें। जब बुद्ध के कपिलवस्तु लौचे तो कपिलवस्तु की जनता ने उनके आगमन की खुशी में दीप जला कर उनका स्वागत किया था। यहां ही बुद्ध ने लोगो को अप्पो दीपो भवः यानि की अपने दीपक स्वयं बनो का संदेश दिया था। तब से बुद्ध के सम्मान में हर साल बौद्ध धर्म को मानने वाले दीप जला कर ये कल्पना करते है कि बुद्ध का आगमन उनके घर में होगा। इसे धम्म दीपावली कही जाती है।
भारत के बाहर भी धम्म का प्रचार प्रसार
वहीं दूसरी कथा के अनुसार जब सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया था और बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करने की प्रतिज्ञा ली थी, उनके बौद्ध धर्म को अपनाने की खुशी में पूरी नगरी में दीप जला कर उनके फैसले का स्वागत किया गया था। अशोक का धम्म अपनाना, ऐतिहासिक रूप से बौद्ध धर्म के लिए एक अहम परिवर्तन माना जाता है, जिसने बौद्ध धर्म को न केवल भारत के कोने कोने में पहुंचाया था बल्कि उसने भारत के बाहर भी धम्म का प्रचार प्रसार किया था.. जिसके कारण आज भी भारत के पड़ोसी देशो में बौद्ध धर्म का बोलबाला है। अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने को भी दीप जलाया कर सम्मानित किया जाता है।
बौद्ध अनुयायी इसे धम्म दीपावली कहते है और दीपदान उत्सव के तौर पर मनाते है। इस दिन अनुयायी अपने घरों, बौद्ध मठो को सैकड़ों दीप जला कर जगमन करते है, बुद्ध को याद करके धम्म के उपदेशों का आदाम प्रदान करते है। बौद्ध अनुयायी भिक्षुओं को अपनी श्रद्धा अनुसार दान देते है, साथ ही त्रिशरण और पंचलील का पाठ करके बुद्ध की वंदना की जाती है। ये कहानी बताती है कि केवल हिंदू धर्म में ही नहीं बल्कि बौद्ध धर्म में भी दीपोत्सव की काफी अहमियत है, और दीप का जलाना शुभता औऱ सकारात्मकता के आने का संकेत है, जिसे हर धर्म में काफी अहमियत दी जाती है।



