Jantar Mantar: क्या अपने हक के लिए बोलना गलत है? क्या एजुकेशन के खिलाफ बोलना भी गलत है? अगर यह गलत नहीं है, तो दिल्ली के जंतर-मंतर पर एजुकेशन में सुधार की मांग को लेकर हो रहे प्रोटेस्ट पर सरकार चुप क्यों है? हां, इसका एक उदाहरण राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले तीन हफ्तों से चल रहा धरना है। पुलिस के जबरदस्ती प्रोटेस्ट करने वालों को हटाने की कोशिश के बाद भी स्टूडेंट्स की हिम्मत नहीं हारी।
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जंतर मंतर पर होने वाले मार्च पर लगाई रोक
दरअसल, 20 जुलाई को शुरू हुए संसद के मानसूत्र सत्र के पहले ही दिन खुद भीम आर्मी चीफ और नगीना सांसद चंद्र शेखर आजाद ने वहां पहुंच कर जंतर मंतर से लेकर संसद तक के मार्च में छात्रों का हौसला बढ़ाया। इसके लिए आजाद 19 जुलाई को ही जंतर मंतर पहुंच गए थे। बता दें कि 15 जुलाई को खुद आजाद दिल्ली आए थे और शिक्षा मंत्री के खिलाफ इस्तीफे की मांग को लेकर होने वाले धरना प्रदर्शन में अपना समर्थन दिया था।
जंतर मंतर पर करीब 5000 सुरक्षा कर्मियों को नियुक्त किया
इस दौरान उन्होंने वादा किया था कि 20 तारीख को विशाल मार्च होगा, जिसमें केवल महापुरुषों की तस्वीर होंगी, किसी पार्टी का कोई झंडा नहीं। आजाद का साथ मिलने के बाद ये प्रदर्शन बेहद व्यापी हो गया और कई बड़े नेताओं के साथ साथ फिल्मी हस्तियों का भी साथ मिला था। साथ ही मार्च के लिए देश भर से सैकड़ों छात्र दिल्ली पहुंचे थे। लेकिन मार्च से पहले ही जंतर मंतर पर करीब 5000 सुरक्षा कर्मियों को नियुक्त कर दिया गया। ताकि प्रदर्शनकारी संसद तक न पहुंच सकें। वहीं ‘चलो संसद’ मार्च को रोकने के लिए जंतर मंतर के आसपास धारा 163 लागू कर दी गई है।
पुलिस और RAF का सामना करते हुए मार्च शुरु
वहीं इसकी जानकारी आसानी से किसी के पास न पहुंचे उसके लिए सैकड़ो जैमर लगा दिये गए। हालांकि छात्रों के हौसले फिर भी बुलंद है। उन्होंने हाथों में तिरंगा लिये पुलिस और RAF का सामना करते हुए मार्च शुरु कर दिया और संसद मार्ग थाने तक पहुंच गए है.. अब आज हुए इस मार्च से साफ हो गया है कि छात्र अब झुकने वाले नहीं हैं, शिक्षा मंत्री को अपनी कमियों को स्वीकार करना पड़ेगा और इस्तीफा देना ही पड़ेगा। अब देखना ये होगा कि एक छोटा सा आंदोलन इतना व्यापक बन गया है ऐसे में क्या सरकार की तरफ से अब कोई प्रतिक्रिया आएगी।



