Sunny M. Kapikad: दलितों के अधिकार, उनके खिलाफ होने वाले भेदभाव और अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने वाले कई महापुरुष हुए.. लेकिन ऐसा बहुत कम हुआ जब किसी दलित समाज सुधारक की मूल विचारधारा को आगे ले कर जाये.. क्योंकि समय के साथ मुख्य मकसद भी बदल जाते है लेकिन आज के समय में एक ऐसे दलित विचारक और लेखर है, जिन्हें अगर आप दलित विचारकों का उत्तराधिकारी कहे तो गलत न होगा। केरल के एक दलित परिवार में जन्मे सनी एम कपिकाडु.. जो वर्तमान में दलित उत्थान के समर्थक और सामाजिक तौर पर दलितो को हाशिये पर धकेले जाने के खिलाफ कार्य करने वाले एक सक्रिय कार्यकर्ता है। अपने इस लेख में हम सनी एम. कपिकाडु के बारे में जानेंगे… जिन्होंने न केवल दलितो को सम्मान औऱ समानता दिलाने में अहम लड़ाई लड़ी बल्कि प्रसिद्ध सबरीमला मंदिर में महिलाओ के प्रवेश की लड़ाई को भी पूरा समर्थन दिया था। जानते है कौन है सनी एम कपिकाडु।
जानिए कौन हैं प्रमुख विचारक सनी एम. कपिकाडु
जनवरी 2026 में केरल विधानसभा चुनावों पहले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) वैकोम निर्वाचन क्षेत्र से दलित विचारक सनी एम. कपिकाड को प्रतिभागी बनाने की बात सामने आई थी.. तब पहली बार राजनीति के गलियारे में सनी एम. कपिकाड का नाम काफी उछला था.. दलितों और पिछड़ो के बीच फेमस कपिकाड का जन्म केरल राज्य के कोट्टायम में एक दलित परिवार में हुआ था। पेशे से एक एलआईसी कर्मचारी कपिकाडु ने एसएमवी, एनएसएस, एचएसएस, कल्लरा और महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के अपनी पढ़ाई पूरी की है।
दलितो के साथ होने वाले भेदभाव को करीब से देखा
उन्होने बचपन से ही दलितो के साथ होने वाले भेदभाव को करीब से देखा था, लेकिन कॉलेज के दौरान उन्हें मौका मिला कि वो समाज में फैली इस कुरीति के खिलाफ कुछ करें। उन्होंने ऐसे मुद्दों पर चर्चा की जिनपर अक्सर लोग चर्चा करने के कतराते है जिसमें जन्म के माध्यम से सदस्यता दी जा रही है, .यानि की उनका ओहदा तय किया जाता है, जबरदस्ती अंतर्विवाह करवाना, महिलाओं के कामुकता पर पाबंदी लगाने के खिलाफ.. महिलाओ दलितो के साथ हिंसा, उनका बहिष्कार करने और पूंजीपतियों के अपने मनमाने ढंग से स्वामित्म का अधिकार करना.. जैसे संगीन मुद्दो पर खुल कर आवाज उठाई।
सनी एम. कपिकाडु सरकार से भी लड़ने में कसर नहीं छोड़ी
उन्होंने दलित और पिछडो के अधिकार के लिए केरल की सरकार से भी लड़ने में कसर नहीं छोड़ी.. 2019 में जब वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर उंची जाति वालो को आरक्षण देने का वकालत की थी तब भी कपिकाडु ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला था। उन्होंने सरकार के इस कदम को पूरी तरह से अंसंवैधानिक बताया था, क्योंकि ऐसा करने से उंची जाति के लोग दलितों और पिछड़ो का ही अधिकार खायेंगे। वो सदियों से केरल के हवाओ में चली आ रही जातिगत और लैंगिग असमानता और भेदभाव को खत्म करने के लिए लड़ रहे है।
सामाजिक न्याय और समानता की आवाज़ बने
उन्होने लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा सबरीमला मंदिर में महिलों के प्रवेश को लेकर जो फैसला सुनाया गया था, उसका खुल कर स्वागत किया था। उनका मानना था कि जब तक सामाजित औऱ लैंगिक समानता नही होगा तब तक सहीं मायने में विकास संभव ही नहीं है। हालांकि सबरीमला मंदिर में तब भी महिलाओ को प्रवेश नहीं करने दिया जाता है। जिसे यहां के लोग उनकी सदियो पुरानी आस्था से जोड़ते है। लेकिन पंडितो औऱ यहां के स्थानीय लोगो ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ व्यापक विद्रोह किया था।
जिसे कपिकाडु मे “मलयाली शूद्रों का विद्रोह कहा था, क्योंकि उंचि जाति के लोग शूद्रो को अमानव कहते है लेकिन काम तो वो शूद्रो के कर रहे थे.. कपिकाडु ने और मुद्दे को काफी उठाया था, और वो था दलितो के कब्रिस्तान.. हम सभी जानते है कि दलितो को अंतिम संस्कार करने के लिए आज भी बहुत सी जगह पर सार्वजनिक शमशान घाट या कब्रिस्चान में जाने की अनुमति नहीं है, या तो वो नीजि जमीनों पर अंतिम संस्कार करते है या दूर दराज जाना पड़ता है। उनकी इस समस्या को बेहद गंभीरता से उठाया है कपिकाडु ने.. कपिकाडु ने सामाजिक ताने बाने पर किताबें लिखी थी।
जिसमें 2017 में आई उनकी किताब जनथयुम जनादिपथ्यवुम: दलित विज्ञानंथिंते राष्ट्रीय पदंगल काफी प्रचलित हुई थी। कपिकाडु का अपना यूट्यूब चैनल है, वो अक्सर ऐसे कार्यक्रमों में जाते रहते है जहां वो केरल के ऐसे मुद्दो को उठाते है, जिससे सामाजिक रूप से नजरअंदाज किया जाता है। उनके भाषणों, उनके लेखनों को बहुत पसंद किया जाता है। उनका मुखर स्वाभाव और वाचन उन्हें दलितों और पिछड़ो के साथ साथ अन्य जातियों में भी काफी पसंदीदा बनाता है।



