Dr. Ambedkar: बाबा साहब आंबेडकर खुद एक बेहतरीन वकील थे, इसलिए उन्हें कानून की किताब को परखने और किसी कानून को किस तरह से इस्तेमाल करें तो वो न्याय की कसौटी पर सटीक बैठेगी, इसका अच्छा खासा एक्सपीरियंस था। खासकर उनके जीवन भर के संघर्षों ने उन्हें इतना मजबूत बना दिया था कि वो अपने जीवन के अनुभव के दम कठिन से कठिन मुकदमा लड़ने की हौसला रखते थे और अपनी दलीलों से प्रतिद्वादियों के हलक से जीत निकाल लेते थे। एक ऐसा ही मामला बाबा साहब ने तब लड़ा था जब एक बूढ़ी औरत को न्याय दिलाने के लिए बाबा साहब एक करोड़पति कंपनी के खिलाफ भीड़ गये थे, और कैस इस मुकदमे को जीत कर उन्होंने दुनिया के सामने ये मिसाल रखी थी कि कानून सबके लिए समान है। कैसे बाबा साहब ने अपना सबकुछ गवां चुकी विधवा के आगे एक करोड़पति कंपनी को झुकने पर मजबूत कर दिया था। बाबा साहब का सबसे बड़ा कानूनो मुकाबला, जो आज भी उनकी ऐतिहासिक जीत की याद दिलाता है।
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डॉ. अंबेडकर का सबसे बड़ा कानूनी संघर्ष
हम सभी जानते है कि बाबा साहब ने भारत के मजदूर वर्ग के लिए सबसे ज्यादा सुधारात्मक कदम उठाये है। वैसे जो आपक उन्हें संविधान निर्माता के रूप से ही जानते होंगे लेकिन बाबा साहब की मजदूरों के लिए लड़ाई जो संविधान निर्माण से कई दशक पहले ही शुरु हो गई थी। 1923 बाबा साहब ने वकालत की डिग्री हासिल कर बॉम्बे हाइकोर्ट में प्रेक्टिस शुरु कर दी थी.. बाबा साहब समाज के दलित, गरीब, पिछड़े और मजदूर वर्ग के लोगो के लिए बेहद कम पैसों या मुफ्त में ही केस लड़ा करते थे, इसलिए उनकी लोकप्रियता काफी थी। मगर मजदूर वर्ग पर पूंजीपति मिल मालिकों मनमानी रोकने के लिए एक गरीब विधवा का केस काफी अहम साबित हुआ.. 1927 की आसपास की बात है।
मिल मालिकों के लिए मजदूर केवल वो कोल्हू का बैल
बोम्बे, अहमदाबाद, नागपुर जैसे शहरो में मिल मालिकों ने फैक्ट्रिया शुरु कर ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ शुरु कर दी थी। उन दिनों मजदूरों को लिए घंटे तय नहीं थे, तो 12 से 15 घंटे मिलों में पसीना बहाते थे, लेकिन उस वक्त न तो उनकी सुरक्षा का कोई बंदोबस्त था और न ही अगर वो किसी हादसे का शिकार हो जाते है तो उनके लिए कंपनी क्या करेगी, उसकी कोई बात होती थी। मिल मालिकों के लिए मजदूर केवल वो कोल्हू का बैल थे जिनसे केवल काम लिया जाता था.. और अगर कोई मजदूर घायल हो जाये, या किसी हादसे का शिकार हो जाये तो उनसे पल्ला झाड़ लिया जाता था। जैसा कि अहमदाबाद कॉटन एंड कंपनी में काम करने वाले एक मजदूर राजाराम के साथ हुआ था। राजाराम एक गरीब मजदूर था, घर में पत्नी बाई बुधियान और दो छोटे बच्चे थे।
अहमदाबाद कॉटन मिल कंपनी में मुआवजो के लिए अर्जी दी
राजाराम ही अपने परिवार का एकमात्र सहारा था, जिंदगी किसी तरह से कट रही थी लेकिन एक दिन एक मशीन की चपेट में आकर राजाराम की दर्दनाक मौत हो गई.. इसकी खबर जब परिवार को लगी तो हाहाकार मच गया। मगर जब दुख के बादल हल्के हुए तो बाई बुधियान ने सोचा कि इंसान के जाने का दुख कभी कम नहीं होगी, लेकिन जो जीवित है उनके बारे मे सोचना जरूरी है, उसने अहमदाबाद कॉटन मिल कंपनी में मुआवजो के लिए अर्जी दी। दरअसल साल 1923 में ब्रिटिश हुकुनत ने मजदूरों के अधिकारों की रक्षा और काम के दौरान किसी तरह के हादसे के शिकार होने के बाद मजदूर को मुआवजा देने के लिए कामगार आश्रम अधिनियम लागू किया था, लेकिन विडंबना ये थी कि ये कानून लागू तो हो गया था लेकिन मिल मालिक उसका पालन करने के बजाये अपनी मनमानी करते थे.. बाई बुधियान के साथ भी यहीं हुआ।
मुआवजा देने से इंकार कर दिया
कंपनी के धूर्त मालिक ने बड़े बड़े वकीलो को बाई बुझियान के सामने बिठा दिया औऱ वकीलो ने सारा आरोप राजाराम पर डाल कर मुआवजा देने से इंकार कर दिया..बाई बुधियान की दुनिया उजड गई थी.. वो न्याय लेकिन दर दर भटक रही थी कि उसके मामले की खबर बाबा साहब को भी लगी.. बाबा साहब खुद बाई बुधियान के पास पहुंचे.. उन्होंने कहा कि वो बाई बुधियान को न्याय भी दिलायेंगे और मुआवजा भी। मामला कोर्ट तक पहुंचा.. और मिल मालिक के मंहगे वकीलो की टीम के सामने अकेले बाबा साहब खड़े थे। मजदूर वर्ग इस ऐतिहासिक मुकदमों को देखने के लिए खचाखच जमा थे।
मिल मालिक ने मजदूरो को सुरक्षा नहीं दी
मिल मालिक के वकील ने दलील देनी शुरु की.. माई लोर्ड राजाराम की मौत का असली जिम्मेदार खुद राजाराम है, उसकी लापरवाही के कारण उसकी जान गई है, इसलिए कंपनी की जिम्मेदारी नहीं है कि वो कोई मुआवजा दें.. अब बारी थी बाबा साहब के बोलने की.. बाबा साहब उठे और उन्होंने कहा.. माई लोर्ड राजाराम की मौत क्या वाकई में उसकी लापरवाही से हुई थी। सबसे बड़ी बात तो ये है कि वो कंपनी के दायरे में ही था,, और जिस मशीन पर काम कर रहा था उसने खुद सुरक्षा को सही मापदंड तय़ नही थे, मिल मालिक ने मजदूरो के सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाये, और जिस मशीन पर वो काम कर रहा था वो मालिक का है और वो काम भी मालिक के लिए ही कर रहा था।
कोर्ट में दिलाई थी गरीब महिला को इंसाफ
गरीब मजदूरों से 12 से 14 घंटे तक बिना रूके काम लिया जाता है, इस दौरान कंपनी ने मजदूरो की सुरक्षा के लिए क्या ठोस कदम उठाये थे। बाबा साहब ने कामगार आश्रम अधिनियम 1923 का हवाला देते हुए कहा कि जब ये घटना हुई तब राजाराम कोई अपना नीजि कार्य नहीं कर रहा था बल्कि कंपनी के लिए कर रहा था, कंपनी का उत्पदन बढ़ाने के लिए कर रहा था, फिर ये कहना भी मजदूर जानबूझ कर अपनी जान को जोखिम में डाल कर काम करेगा, बेहद हास्यस्पद, अतार्किक और अमानवीय तर्क है। जब मजदूर द्वारा किये गए काम का जो भी मुनाफा मालिकों को मिलता है तो मजदूर के साथ हो भी होता है उसकी जिम्मेदारी भी मालिक की होनी चाहिए.. किसी भी हादसे की जिम्मेदारी मालिक को उठानी पड़ेगी।
बाबा साहब की दलीलों से कोर्ट में सन्नाटा छा गया.. जज साहब को भी ये मानना पड़ा कि बाबा साहब का तर्क न्यायसंगत है. और उन्होंने फैसला सुनाया कि राजाराम की मौत लापरवाही से नहीं हुई बल्कि कंपनी की अनदेखी के कारण हुई थी.. मिल मालिक को बाई बुधियान को कामगार आश्रम अधिनियम 2023 के अनुसार कानूनी रूप से उचित मुआवजा देना पड़ेगा। इस फैसले ने पूंजीपतियों के उस इरादे पर पानी फेर दिया था जब मजदूरों को कीड़े मकोड़े समझ कर उनका इस्तेमाल करके फेंका जा सकता है। बाबा साहब का ये केस मजदूरों के अधिकारों के लिए पत्थर की मील साबित हुआ था।



