Creamy layer: पंजाब सरकार ने 1975 में एक अधिसूचना जारी की थी, इस अधिसूचना में राज्य की 50 प्रतिशत वाल्मिकी और मजहबी सिखों को अनूसूचित जाति की आरक्षित सीटें आवंटित की गई थी.. लेकिन साल 2000 में आंध्र प्रदेश अनूसूचित जाति अधिनियम 2000 लागू हुआ.. और पहली बार एससी वर्ग में भी उप समूहों में संगठित किया गया.. लेकिन इस अधिनियम को स्वीकार नहीं किया गया और पहले हाई कोर्ट में अपील की गई, जहां ये फैसला तब भी बरकरार रखा गया था, जिसके बाद ये मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट। यहां 2004 में पांच जजो की बैंच ने ईवी चिनैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में संविधान के अनुच्छेद 341 का जिक्र करते हुए ये माना कि अनूसूचित जाति की सूचि एक एकल, समरूप समूह है.. और राज्य के फैसले को असंवैधानिक करार दे दिया गया।
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क्रीमी लेयर लागू करने सुप्रीम कोर्ट में अपील की
यानि की सुप्रीम कोर्ट का रूख यहां पूरी तरह से साफ था कि अनूसूचित जाति और जनजाति को उपसमूहों के दायरे से अलग रखा जायेगा..जिससे 1975 का पंजाब सरकार का फैसला भी खारिज हो गया। लेकिन 2006 में फिर से पंजाब सरकार ने Scheduled Castes and Backward Classes Act, 2006 पास कर दिया.. जिसमें सेक्शन 4(5) का हवाला देते हुए 1975 से “first preference” reservation policy को Codified किया.. लेकिन सरकार के इस फैसले को चमार महासभा से जुड़े दविंदर सिंह ने चुनौती दी। ये सिलसिला काफी लंबा चला.. हरियाणा पंजाब हाईकोर्ट ने दविंदर सिंह की याचिका को माना और सेक्शन 4(5) को निरस्त कर दिया। उन्होंने माना कि पंजाब सरकार का ये काननून सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले के खिलाफ था।
लेकिन पंजाब सरकार सीधा सुप्रीम कोर्ट पहुंची, जहां 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजो की बेंच ने 2004 के फैसले को पलटते हुए एससी एसटी वर्ग में भी क्रीमी लेयर की अवधारना को लाने की बात कही.. हालांकि ये तब केवल पदोन्नति में आरक्षण पर लागू होता था, लेकिन दिसंबर 2019 में, केंद्र सरकार ने क्रीमी लेयर लागू करने के 2018 के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की.. मामला कई सालो तक चला और 1 अगस्त 2024 को पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की 7 जजो की बेंच ने ये फैसला सुनाया कि एससी एसटी वर्ग में भी reservation कोटे के अंदर कोटा का Sub-classification करना चाहिए। जिसके बाद ऐसी कई याचिकायें दाखिल की गई, जिसमें एससी एसटी वर्ग पर भी क्रिमी लेयर लागू किया जाये।
याचिकाओं में दलील दी गई कि अगर क्रिमी लेयर लागू होता है तो आर्थिक रूप से जो मजबूत है उनके बजाय उन्हें लाभ होगा जो उसके सही हकदार है। क्योंकि क्रिमी लेयर लागू न होने के कारण जो आर्थिक रूप ये मजबूत है वो ही गरीब और जरूरतमंदों का अधिकार खा लेते है। अगर किसी के परिवार में माता पिता पहले से किसी सरकारी पद पर है और उनकी आय 8 लाख से ज्यादा है तो उनके बच्चों को आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए। इस याचिकाओं के कारण सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त 2025 को एक नोटिस केंद्र और राज्य सरकार को भेजा था.. जिसमें इस मामले में अपनी राय देने की बात की गई थी। लेकिन वहीं सरकार ने एससी एसटी वर्ग को क्रिमी लेयर के दायरे में लाने के फैसले को खारिज करने की मांग की थी .. जिसे लेकर कोर्ट ने केंद्र सरकार को 4 हफ्तों का समय दिया था वो एससी एसटी कैटेगरी पर क्रिमी लेयर क्यों लागू न करें।
SC/ST और OBC तराजू में नहीं तोले जायेंगे
11 अगस्त को केंद्र सरकार ने अपनी दलील कोर्ट में पेश की.. इस दलील में केंद्र ने तर्क दिया है कि हम एससी एसटी और ओबीसी को एक ही तराजू में नहीं तोल सकते है। एससी एसटी वर्ग के साथ केवल आर्थिक समस्याये ही नही है बल्कि उन्हें उंचा पद पाने के बाद भी ऐतिहासिक रूप से छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का सामना अब भी करना पड़ता है। उनकी पहचान सांस्कृति, भौगोलिक भेदभाव, अलगाव और पिछड़ेपन से जुड़ी है.. क्या किसी समुदाय के साथ भेदभाव केवल आर्थिक आधार पर होता है.. नहीं.. एससी एसटी वर्ग के साथ भेदभाव तो कभी भी आर्थिक आधार पर ही नहीं होता। आर्थिक कमजोर केवल एक मुद्दा है.. उन्हें क्रिमी लेयर में लाने से सामाजिक समानता और न्याय हासिल नहीं होगा.. केवल आर्थिक रूप से संपन्न हो जाने से वो समाजिक रूप से समान नहीं होंगे.. और न ही वो न्याय पा सकेंगे।
वहीं केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी चुनौती देते हुए कहा कि आरक्षण नीति बनाना संसद का काम है न कि कोर्ट का..कोर्ट केंद्र सरकार को की भी तरह की नीति बनाने की सलाह दे सकता है लेकिन आदेश नहीं दे सकता है। ये काम Executive and Legislature का है.. और कोर्ट को उनके काम में दखल नहीं देना चाहिये.. क्योंकि कोर्ट को दूसरा विकल्प ज्यादा सही लगता है। केंद्र ने दलील दी कि ये याचिकायें कहीं भी किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन की बात नहीं करती.. इसलिए ये आर्टिकल 32 के तहत खारिज कर दी जानी चाहिए। वहीं क केंद्र ने संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 का हवाला दिया कि केवल संसद के पास ही ये हक है कि वो किसे एससी एसटी वर्ग में शामिल करेंगी और किसे उपजातियों में.. कोर्ट ने ऐसी किसी भी याचिका को खारिज करने की मांग की है जिसमें एससी एसटी कैटेगरी में क्रिमी लेयर लाने की बात की गई है।
अब सवाल ये है कि क्रिमी लेय़र आया कहां से.. तो इसके लिए साल 1992 में इंदिरा साहनी बना संघ मामला जानना चाहिये। कोर्ट ने ओबीसी समुदाय को भी 27 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान लागू कर दिया.. जिसके मुताबिक अगर ओबीसी समुदाय के व्यक्ति आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न है तो उसे या उसके बाद ही पीढ़ी को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जायेगा। तब पहली बार कोर्ट ने ओबीसी में क्रिमी लेयर की अवधारणा दी थी। लेकिन समय के साथ एससी एसटी वर्ग के लिए भी क्रिमी लेयर की मांग शुरु कर दी गई.. हालांकि केंद्र सरकार की दलीलों के बाद कोर्ट का क्या रूख होता है ये भी देखने वाली बात होगी।



