बुद्ध की सहनशीलता जब अपने विरोधियों के अपशब्दों को भी बुद्ध ने चुपचाप सहा और शिष्यों को दिया सहनशीलता का बड़ा ज्ञान

Buddha tolerance story
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शाक्य मुनि गौतम बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के बाद एक एक दिन सत्य और अहिंसा का रास्ता प्रशस्त करने में ही लगा रहा था.. ज्ञान प्राप्त करने के बाद जीवन का सबसे बड़ा सत्य जो उन्हें पता चला वो दूसरे को भी बांटने में लगे रहे थे.. बुद्ध ने कोशिश की कि वो लोगो को उसके आंतरिक दुखों से निकाल सकें। उनका रास्ता सबको बराबरी महसूस कराने वाला था.. जिनकी नजरो में सभी एक समान थे, सात्विक जीवन जीना और अभावो में व्यक्ति कैसे एक बेहतर जीवन जी सकता है.. इसका ज्ञान बांटने के कारण ही बुद्ध तेजी से प्रचलित हुए थे..लेकिन बुदेध की प्रसिद्धि के कारण कुछ लोगो को काफी परेशानी हुई… तो कुछ लोगो की धर्म की दुकान ही बंद हो गई।

नतीजा ये हुआ कि बुद्ध धर्म के सौदागरों की आँखो में चुभने लगे थे.. अक्सर ऐसा होता कि बुद्ध या उनके अनुयायी कहीं भी भिक्षा मांगते जाते तो उन्हें सरेआम बेज्जत कहां जाता.. उन्हें भगोड़ा, गैरजिम्मेदार जैसे नामों से बुलाया जाता.. उनकी छवि ऐसी बनाई जाती जैसे परिवार को छोड़कर वैराग्य अपनाना उनकी गुनाह था.. लेकिन बुद्ध ने सब कुछ शांति से बर्दाश्त किया। वहीं जब बुद्ध के अनुयायियों ने बुद्ध से पूछा तो उन्होनें ऐसा जवाब दिया जिसे जानने के बाद वो लोग भी समझ गए कि बुद्ध आखिर क्यों इतना अपमान सह कर भी इतना शांत रहते है।

बुद्ध ने दिया शिष्यों को ज्ञान

कहते है कि बुद्ध के विचार पहले तो उन लोगो को लिए स्वीकार करना बेहद ही मुश्किल थे जो ब्राह्मणवादी सोच और मनुस्मृति के आधार पर चलते थे, जो वर्ण व्यवस्था को मानते थे, जिसके कारण जातिवाद के कारण पिछड़े और शूद्रो को हमेशा दबाया जाता था.. समाज से बाहर रहते थे, दूसरे समाज के लोग उनकी सेवा तो लेते है, उनके धन पर राज करते थे लेकिन समाजिक रूप से हमेशा उन्हे नीच माना जाता था.. जिसके खिलाफ बुद्ध ने एक मुहीन सी शुरु कर दी थी। बुद्ध ने लोगों में ये जागरूकता फैलाई की जातिवाद वर्णव्यवस्था केवल लोगो का शोषण करने के लिए बनाये गए थे।

जिनको खत्म होना चाहिए..और बुद्ध का रास्ता ही उन्हें इस मुक्ति से निजात दिला सकता है। लेकिन इससे उस जाति वालो को तकलीफ होने लगी थी जो उनका फायदा उठाते थे, इसलिए जब बुद्ध ने अपने विचारो का प्रचार प्रसार शुरु किया तो वो पिछड़े शूद्रो में सबसे पहले प्रचलित हुए.. लोगो ने अपना धर्म बदलना शुरु कर दिया और शोषण को इंकार करते चले गए.. लेकिन इससे ब्राह्मणवादी लोग नाराज होने लगे।

बुद्ध को लोगो ने गालियां देकर भला बुरा कहा

कहते है कि एक बार बुद्ध अपने अनुयायियों के साथ एक गांव की यात्रा में गए थे, लेकिन उन्हें देखकर वहां ऊंची जाति के लोगो ने उन्हें गालियां देते हुए भला बुरा कहना शुरु कर दिया था। बुद्ध शांति से सुनते जा रहे है, उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी.. लेकिन गांव वालो की ये हरकतें बुद्ध के शिष्यों से बर्दाश्त नहीं हुई.. वो लोग बुद्ध से पूछ बैठे कि निरअपराध होते हुए भी वो क्यों उन लोगों का अपमान सह रहे थे..

बुद्ध ने अपने शिष्यो को भी शांत रहने का संदेश देते हुए कहा कि ये लोग तो केवल अपशब्द कह रहे है, अगर ये लोग मुझे पत्थर भी मारते तो भी मैं इंकार न करता। मैं जानता हूं कि वो लोग मुझसे बहुत कुछ कहना चाहते है लेकिन क्रोध और नाराजगी के कारण कुछ कह नहीं पा रहे है। 10 साल पहले मुझे भी कोई गाली देता तो मैं भी बदले में यहीं करता..लेकिन अब मैं इस लेन देन के बंधन से मुक्त हो गया हूं, मुझे किसी की बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता है। तप आपको शुद्ध करता है, मेरा क्रोध भवन कब का ढह चुका है।

भिक्षा में मिलनी वाली फल मिठाई लेने से इंकार

बुद्ध की बात सुनकर शिष्यों को वो बात याद आ गई जब बुद्ध ने भिक्षा में मिलनी वाली फल मिठाईयो को ये कह कर लेने से इंकार कर दिया कि ये स्वादिष्ट फल मिठाईया  लेने वाला विदा हो चुका है.. और सब कुछ गांव में बांट दिया.. लेकिन बुद्ध ने उन्हें अपशब्द कहने वाले गांववालों से केवल इतना आग्रह किया कि वो फल मिठाई भले ही बांट सकते है लेकिन अपशब्द गांव वालों को नहीं बांटे.. इन अपशब्दों का मुझपर कोई असर न होगा लेकिन जो अज्ञानी है वो आपको उतनी ही रफ्तार से लौटायेगा जितनी रफ्तार से आप उसे देंगे.. लेकिन अगर आप सहनशील है तो कोई भी कितना भी गाली दें एक वक्त के बाद खुद शांत हो जायेगा। बुद्ध की बात सुनकर शिष्यों को अपनी भूल का अहसास हुआ और वो सहनशीलता का सार समझ गए।

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