Poykayil Appachan: क्या आप सोच सकते है जब भारत में ब्रिटिश हुकुमत थी, तब ईसाई मिशनरियों ने धर्म परिवर्तन कराने के लिए भारत का रूख किया था.. वो लोगो को धर्म के नाम पर बहकाते, उन्हें ईसाई बनने के लिए कहते और बदले में पैसा, नौकरी और अच्छी जिंदगी देने का लालच देते थे। लेकिन जहां ईसाई धर्म को मानने वाले अंग्रेजो का राज चलता था वैसे में एक ऐसा शख्स हुआ जिसने कभी ईसाई परंपराओ को अपनाया था लेकिन उसी शख्स ने एक बार ऐसा हुआ था जब चर्च की शिक्षाओं की नींव की तर्कसंगत आलोचना की थी और बाइबिल को ही जलाकर दलित ईसाई पहचान की रूढ़िवादि सोच को चुनौती दे दी थी।
जो खुद एक दलित जाति से थे, लेकिन बहिष्कृत लोगों के बीच समानता और न्याय का संदेश फैला कर एक महान नेता और समाज सुधारक बन गए थे। जी हां, हम बात कर रहे है महान कवि, अध्यात्मिक नेता पोयकायिल अप्पाचन के बारे में.. जिन्हें केरल में दलित मुक्तिदाता भी कहा जाता है। जानेंगे कैसे पोयकायिल अप्पाचन ने समाज की उस सोच पर गहरा प्रहार किया था जो जातिवाद की आड़ में धर्म का खेल खेल रहे थे।
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पोयकायल अप्पाचन ने कैसे दलितों के लिए काम किया
पोयकायिल अप्पाचन जिनके बचपन का नाम पोयकायिल श्री कुमारा गुरुदेवन था, उनका जन्म 17 फरवरी 1879 को मध्य त्रावणकोर में तिरुवल्ला के पास एराविपेरूर, जिसे वर्तमान में पथानामथिट्टा के नाम से जाना जाता है, वहां एक दलित परिवार में जन्मे थे, ये क्षेत्र अब केरल में पड़ता है.. जिस वक्त उनका जन्म हुआ था तब केरल में उंची जाति के हिंदू और सीरियाई ईसाईयों का काफी वर्चस्व था, दलितों और वंचितों की हालत नौकर से कम नहीं थी। पोयकायिल के माता पिता शंकरमंगलम और वलियाथन्निकल खुद एक अमीर ईसाई के घर में नौकर का काम करते थे। वहीं उनकी भी ईसाई परिवेश के बीच ही परवरिश हुई थी, तो उन पर ईसाई धर्म का अच्छा खासा प्रभाव था. यहां तक कि अपना प्रभाव बढ़ान के लिए उनका नाम बदल कर योहनन रख दिया था। इस कारण उन्हें दुनिया पोयकायिल योहनन के नाम से भी जानती है।
दलितो को ईसाई बनने के बाद संघर्ष करना पड़ा
हालांकि ईसाई धर्म का प्रभाव होने के कारण उन्हें स्कूल जाने और पढ़ने लिखने के लिए ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा था, लेकिन इस दौरान उन्हें समाज के बहिष्कृत लोगो के बारे में पता चला. वो उनके जीवन को काफी करीब से देखने और समझने लगे, जिसने उनके जीवन में बड़ा बदलाव लाने की भूमिका निभाई। योहनन समय के साथ ईसाई मिशनरियो से प्रभावित होकर खुद केरल के सीरियाई ईसाइयों के एक संप्रदाय, मार थोमा सीरियाई चर्च में शामिल हो गए थे, लेकिन इस दौरान उन्होंने महसूस किया कि जो दलित ईसाई बन गए है, उनके साथ चर्च भी भेदभाव करता है, उन्हें नीच मानता है यानि की दलितो के ईसाई बनने के बाद भी उन्हें सम्मान और बराबरी का संघर्ष करना ही था, बस पोयकायिल ने मिशनरी से दूर होने का फैसला लिया।
ईसाई धर्म भी जातिगत भेदभाव से अछूता नहीं
उसके बाद उन्होंने ब्रेथ्रेन मिशन नाम की मिशनरी को जॉइन किया था लेकिन यहां भी वहीं कुछ सहना पड़ा, पोयकायिल को अहसास हुआ कि ईसाई धर्म भी जातिगत भेदभाव से अछूता नहीं है, जो कि असल में ईसाई धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ था, योहनन ने ईसाई धर्म में फैली कुरीतियों और जातिवाद के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और उन्होंने अपने हाथों से बाइबिल जला दी थी, क्योंकि ईसाई मिशनरी बाइबिल की बातों का अनुसरण करने के बजाय अपनी ही चला रही थी। इस बात पर ईसाई मिशनरियां उनके काफी नाराज भी हो गई थी। लेकिन पोयकायिल ने किसी बात की परवाह किये बिना ही 1909 में ईसाई धर्म छोड़ कर दलित समाज के लिए खुद का ही एक धार्मिक विरोध आंदोलन गॉड्स सोसाइटी ऑफ ओब्वियस साल्वेशन” यानि की प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा की शुरुआत की थी।
दलितों को जातिगत व्यवस्था से मुक्ति संघर्ष
जहां उन्होंने ईसाई धर्म के सिद्धांतों को फॉलो करने के बजाय लोगो को आध्यात्मिक मुक्ति का पाठ पढ़ाया। इस सभा के जरिये उन्होंने दलितों को जातिगत व्यवस्था से मुक्ति दिलाने के लिए उन्हें एकजुट करने औऱ शसक्त करने का प्रयास किया था। उनका एक ही मकसद था कि दलित जातियां भेदभाव से मुक्त हो जायें। उनवकी लोकप्रियता के कारण उन्हें राजनिती मे आने का मौका मिला और 1921 और 1931 में वो श्रीमूलम प्रजा सभा त्रावणकोर रियासत की विधान परिषद के लिए चुने गए। एक दलित जाति से होने के कारण उन्होंने अपने क्षेत्र में दलितों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
पोयाकायिल ने दलितों को धर्म परिवर्तन न करने के लिए भी जागरूक किया क्योंकि, वो मानते थे कि जब सामाजिक व्यवस्था अन्याय करने पर उतारू हो तो कमान अपने हाथों में ले लिजिये औऱ खुद बड़े बदलाव लाने की तैयारी कीजिये। उन्होंने दलितो को जागरूक किया कि वो किसी पाप या शर्म के कारण दलित नहीं है, बल्कि उनका इतिहास बेहद भव्य और गौरांवित करने वाला है। जिसे हमसे छिपाया गया। दलितों की आवाज को जब तक एकजुटता के साथ नहीं उठाया जायेगा तब तक समाजिक न्याय और बराबरी उन्हें नही मिलेगी।
उन्होंने दलितों के बच्चों के लिए स्कूल खोले, जहां सबी को समान शिक्षा लेने का हक था, उन्होंने दलितों को केवल बेगारी करने की सोच से निकाल कर हुनर सिखाया, ताकि दलित समाज में सम्मान पा सकें। 29 जून 1939 को 60 साल की उम्र में पोयाकायिल का निधन हो गया था लेकिन उन्होंने उन दलितों को सम्मान का रास्ता दिखा दिया था, जिसके लिए धर्म बदलने की जरूरत नहीं थी।



