Agra news: हाल ही में उत्तर प्रदेश के आगरा से एक खबर सामने आई है, जहाँ घटना के वर्षों बाद एक अदालत ने एक दलित की हत्या के मामले में एक व्यक्ति को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है। हालाँकि, इस फैसले के बाद देश की कानूनी व्यवस्था को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं।
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आरोपी को 20 साल बाद मिली सजा
क्या इस देश में न्याय पाना सचमुच इतना मुश्किल हो गया है? क्या यही है—एक ऐसी मौत जो वर्षों पहले हुई थी, और जिसका फ़ैसला दो दशकों बाद आया क्या यही है देश का कानून कि पीड़ित परिवार तो दुख और पीड़ा में रोता-बिलखता रह जाए, और आरोपी आज़ाद घूमता रहे? दरअसल, उत्तर प्रदेश के आगरा से ऐसा ही मामला है, जहां मात्र 500 रूपय के लिए एक दलित युवक की निर्मम हत्या करने के एक आरोपी को 20 साल के बाद सजा का ऐलान किया गया है, और वो भी आजीवन कारावास.. कभी कभी तो ये बेहद हास्यस्पद लगता है कि भारत की कानून व्यवस्था इतनी सुस्त है कि न्याय मिलने में कई दशक गुजर जाते है,,तब तक तो न्याय की उम्मीद ही खत्म हो जाती है।
हत्या करके आरोपी फरार
मीडिया रिपोर्ट्स से मिली जानकारी के मुताबिकये घटना 7 जनवरी, 2007 को घटित हुई थी, जब दोषी बबलू प्रसाद ईसानपुर के रहने वाले पीड़ित तेज सिंह को अपने गांव हाजीपुर खेड़ा ले गया था, दोनों ने एक सरकारी ट्यूबवेल के पास साथ में शराब और फिर 500 रूपए की लेन देन के मामले में बहस शुरु हो गई, जिसमें गुस्से में आकर बबलू प्रसाद ने तेज सिंह की गला दबा कर हत्या कर दी और फरार हो गया।
न्यायालय ने बबलू प्रसाद को दोषी भी करार दिया
मृतक के बेटे ने अगली सुबह अपने पिता का शव देखा था और क्वारसी पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। जिसके बाद आरोपी को गिरफ्तार भी कर लिया गया औऱ सत्र न्यायालय ने प्रसाद को दोषी भी करार दिया था, लेकिन तब से ये मामला कोर्ट में लंबित था, और करीब 20 साल बीत गए.. लेकिन आखिरकार 20 साल बाद ही सही अलीगढ़ की एक विशेष अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अदालत (Scheduled Castes/Scheduled Tribes Court) ने आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, जबकि अब उसकी उम्र 65 वर्ष हो चुकी है.. वहीं 1 लाख 5 हजार रूपय का जुर्माना भी लगाया है। बीस साल बाद ही सही पीड़ित परिवार को न्याय तो मिला.. शायद इसे ही कहते है देर आये दुरुस्त आये। लेकिन सवाल अब भी यह है कि यही देश की न्याय व्यवस्था है जो सालो बाद न्याय देती है?



