Karnataka Land Fraud: हाल ही में कर्नाटक (Karnataka) के बैंगलुरु से सनसनी खेज मामला सामने आया है जहाँ एक नए रिसर्च के दौरान पाया गया है कि एक सरकारी योजना के तहत कृषि भूमि का मालिकाना हक होने के बावजूद, हर दस में से लगभग छह दलित महिलाएं अपनी आय का सहारा देने के लिए अभी भी दूसरों के खेतों पर कृषि मजदूर के रूप में काम करती हैं।
दलितों को सिर्फ नाम के लिए दी जमीन
अभी कुछ ही दिन पहले झारखंड से एक रिपोर्ट सामने आई, जिसमें यह खुलासा हुआ कि भू-माफियाओं द्वारा मचाया गया आतंक अब इस हद तक बढ़ गया है कि वे दलितों की ज़मीन पर ज़बरदस्ती कब्ज़ा कर रहे हैं, या फिर धोखाधड़ी के ज़रिए उस पर अपना दावा ठोक रहे हैं। इसके जवाब में, दलित समुदाय के लोगों ने अपने स्थानीय विधायक से न्याय की गुहार लगाते हुए अपील की है। ये मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि ऐसा ही एक मामला कर्नाटक (Karnataka) के बैंगलुरु (Bengaluru) से है, जहां दलित महिलाओं के रोजगार को लेकर बेहद चौंकाने वाला आकड़ा सामने आया है। जी हां, ‘भू ओडेताना’ योजना का अवलोकर करने के दौरान ।
बिहार की संस्था ‘ट्रांस-रूरल कंसल्टिंग’ (Bihar-based organization ‘Trans-Rural Consulting’) ने पाया कि कर्नाटक मॉनिटरिंग एंड इवैल्यूएशन अथॉरिटी (Karnataka Monitoring and Evaluation Authority) द्वारा लागू की गई ये योजना भले ही दलित महिलाओं को खेती के लिए जमीन दे रही है लेकिन केवल नाम के लिए.. क्योंकि आकड़े बताते है कि अभी भी 10 में से 6 दलित महिलाये दूसरों की ज़मीन पर खेतिहर मज़दूर की तरह काम करती है।
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50 प्रतिशत महिलाओ को भी जमीन नहीं मिली
आकड़ो के अनुसार जमीन के लिए आये 11,039 आवेदन में से केवल 2,270 महिलाओं को ज़मीन मिली है.. यानि की 50 प्रतिशत भी नहीं है। ये वो महिलाये है जिनकी मासिक आय 5000 रुपये भी नहीं है। यानि की बात साफ है राज्य में दलित महिलाओं (Dalit Womens) के उत्थान, उनके विकास की चर्चा तो काफी जोरो शोरो से होती है लेकिन उन्हें लाभ निल बटे जीरो ही मिल रहा है.. दलितो के भले की कहानी केवल वोटबैंक बढ़ाने तक ही है, वहीं आकड़ो के अनुसार जमीनों पर भू माफियाओं की भी नजर रहती है, जिसके कारण जिन्हें उनका हक मिलना चाहिए.. उनके ही वंचित रह जाता है तो भला कैसे दलित आर्थिक रूप से शसक्त होंगे.. और कौन करेगा उनकी मदद।
इसके अलवा आपको बता दें, इस रिसर्च में सशक्तिकरण के संबंध में विरोधाभासी परिणाम भी सामने आए: जहाँ 93.8% लाभार्थियों ने बताया कि ज़मीन के मालिकाना हक से घरेलू वित्तीय निर्णय लेने में उनकी भूमिका बेहतर हुई है, वहीं केवल 64.4% ने ही खुद को आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र महसूस किया।



