चंद्रशेखर आजाद ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दी चुनौती, दायर करेंगे पुनर्विचार याचिका – Chandrashekhar Azad

SC-ST Abuse, Chandrashekhar Azad
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Chandrashekhar Azad: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया है कि किसी बंद कमरे या निजी जगह पर बोले गए जातिसूचक अपशब्दों को न तो अपमान माना जाएगा और न ही वे SC/ST एक्ट के तहत कोई अपराध माने जाएंगे। अगर कोई ऐसा करता है तो FIR रद्द कर दी जाएगी । इसे देखते हुए, आज़ाद ने सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधा है और कहा है कि उनका इरादा एक याचिका दायर करने का है।

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बंद कमरे में जातिसूचक गाली अपराध नहीं?

पिछले कुछ दिनों से, भीम सेना प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ अपने व्यवहार में काफ़ी सक्रिय हो गए हैं; कभी वे दलितों की मदद करने सहारनपुर पहुचं जाते हैं, तो कभी बुलडोज़रों को रोकने के लिए हस्तक्षेप करते हैं, और कभी-कभी तो उन्हें संसद के भीतर ही सर्वोच्च न्यायालय को चुनौती देते हुए भी देखा जाता है। जी हाल ही में आजाद ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए दलितों के लिए आवाज उठाई है।

बता दे, 11 मई को कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि बंद कमरे में जातिसूचक गालियां देना अपमान नहीं कहलायेगा और न ही वो SC/ST अधिनियम के तहत अपराध माना जाएगा, जिसे लेकर आखिर आजाद ने भी अपने विचार प्रकट कर दिए है। आजाद ने कहा कि एससी ने सार्वजनिक दृष्टि” की शर्त लगाकर जातिसूचक गाली को अपराध की परिभाषा से बाहर ही कर दिया है। ये फैसला न्याय की मूल भावना के खिलाफ है। इस तरह के फैसले केवल एसीसी एसटी कानून को कमजोर करने के लिए किये जा रहे है जो कि चिंताजनक और दुर्भावनापूर्ण है।

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चंद्रशेखर आज़ाद ने कोर्ट से किया सवाल

उन्होंने कोर्ट से सवाल किया कि क्या अब दलितों का अपमान “लोकेशन” और किस “माध्यम” से किया गया है, उसे देखकर तय किया जायेगा कि अपमान हुआ है या नहीं… क्या फोन पर या बंद कमरे में किया गया जातिय अपमान अपराध नहीं है, क्या उससे भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचती या उससे मानसिक आघात नहीं होता। आजाद ने ये भी कहा कि वो कोर्ट का पूरा सम्मान करते है लेकिन इस तरह के फैसले दलितो के प्रति न्याय को कमजोर करेंगे, इसलिए वो जल्द ही इस पर पुर्नविचार याचिका दायर करने वाले है। ऐसे में देखना ये होगा कि पहले कोलकाता हाईकोर्ट और फिर अब सुप्रीम कोर्ट.. दोनो ने ही इस तरह का फैसला सुनाया है, ऐसे में क्या आजाद की याचिका से बदलाव होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा

दरअसल, अक्सर ऐसी रिपोर्टें सामने आती हैं जिनमें किसी व्यक्ति का अपमान जाति-आधारित गालियों का इस्तेमाल करके किया जाता है; इसके बाद, पीड़ित आरोपी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराता है, जिससे मामला दर्ज होता है और अपराधी को गिरफ्तार कर लिया जाता है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि यदि ऐसी जाति-आधारित गालियाँ किसी बंद कमरे के भीतर, किसी बाहरी व्यक्ति की गैर-मौजूदगी में बोली जाती हैं, तो उन्हें दंडनीय अपराध नहीं माना जाएगा।

जस्टिस एन.वी. अंजारिया और जस्टिस पी.के. मिश्रा की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत मामला दर्ज करने के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि कथित अपमान या दुर्व्यवहार ‘सार्वजनिक रूप से’—यानी, लोगों की नज़र के सामने—हुआ हो।

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