Dr B R Ambedkar: जब मैं संविधान की रचना कर रहा था तब मैंने सपना देखा था कि इस संविधान के बल पर 2000 हजार सालों से जातपात के भेदभाव के बेड़ियों में जकड़े अपने अछूत, वंचित और पिछड़े समाज के भाई बहनों को सामाजिक बराबरी दिलाऊंगा। उन्हें सच्ची आजादी क्या होती है, उनका अहसास करूंगा। लेकिन ये मेरा केवल एक भ्रम मात्र ही था। संविधान लागू करने वाले बड़े खुश होते है कि उन्होंने भारत को सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाया है, लेकिन मेरे समाज के लोगों की स्थिति उतनी बदतर है जो आजादी से पहले होती थी। अत्यधिक पीड़ा और रोष से भरे ये शब्द थे बाबा साहब डॉ भीम राव आंबेडकर के। बंटवारे के कारण बाबा साहब जब संविधान सभा का हिस्सा नहीं बन सकें तो उन्होंने ऐड़ी से चोटी का जोर लगा दिया कि वो संविधान निर्माण का हिस्सा बने।
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आंबेडकर का वह अंतिम संदेश जो आज भी प्रासंगिक है
उन्होंने अपने दम पर संविधान भी तैयार किया लेकिन फिर भी संविधान लागू होने के 5 सालों बाद उन्हें बहुत ठगा हुआ महसूस हो रहा था। गांव हो या शहर, भेदभाव की कुप्रथा अब भी मजबूत थी, और ताकत अब भी पूंजीपतियों के हाथ में थी। लेकिन बाबा साहब इस बार इस पुरानी सड़ चुकी व्यवस्था से ज्यादा नाराज़ थे अपने लोगों से, जिनके लिए बाबा साहब ने कहा था कि व्यवस्था बदल भी जाती लेकिन उन्हें उनके अपने लोगों ने ही धोखा दिया। क्यों नाराज़ थे बाबा साहब अपने ही लोगों से। और क्यों इस व्यवस्था के न बदलने का जिम्मेदार अपने ही समुदाय के लोगों को मानते है। अपन इस वीडियो में हम बाबा साहब की उस वेदना के बारे में जानेंगे जो आपको भी सोचने पर मजबूर कर देगा कि जातिगत व्यवस्था के अब भी इतन मजबूत होने के पीछे का मुख्य कारण क्या है।
26 जनवरी 1956 की तारीख, भारत का संविधान लागू हुए 6 साल हो गए थे, पूरा देश जहां भारत के एक गणतंत्र देश बनने की खुशी मन रहा था वहीं बाबा साहब की आंखों में खुशी के बजट अफसोस और वेदना था। वो मंच पर खड़े थे, कई बीमारियों के कारण वो अपनी उम्र से ज्यादा बूढ़े और कमजोर नजर आ रहे थे, लेकिन उनकी आंखों का तेज अब भी चमक रहा था। उन्हें सुनने के लिए अब भी सैकड़ों को भीड़ जमा होती थी। बाबा साहब मंच पर पहुंचे। बाबा साहब का भाषण उस दिन समाज के करोड़ों पिछड़ों और वंचितों को आईना दिखाने वाला था।
बाबा साहब ने बोलना शुरू किया.. मेरे प्यारे भाईयों और बहनो.. आज भारत का संविधान लागू हुए 6 साल हो गए है.. संसद में बैठे नेता बड़े खुशी से डींगे हांकते है कि उन्होंने भारत का दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाया है.. लेकिन जिस सपने को देखकर मैनें संविधान बनाने में अपने दिन रात एक कर दिये.. वो सपना पूरी तरह से टूट गया.. क्योंकि मुझे मेरे ही लोगो ने धोखा दिया है। बाबा साहब ने आगे कहा कि उन्हें लगा था कि संविधान में आरक्षण की ताकत दलितों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित करेगी.. संविधान तुम्हारी गुलामी की सोच को तोड़ कर तुम्हें शिक्षित करके, संगठित होकर और सुरक्षित रहने की प्रेरणा देगी.. लेकिन वो कितने गलत थे.. कुछ नहीं बदला.. आज भी अछूत….. अछूत है.. उसका शोषण होता है लेकिन लोग तमाशबीन बन कर देखते रहते है.. क्योंकि वो संगठित ही नहीं है। संविधान में कानून तो बन गए लेकिन कानून आज भी जमींदार की लाठी का ही चलता है।
आरक्षण ने तुम्हें आर्थिक मजबूती के लिए रास्ता दिखाया.. तुम शिक्षित बने और आरक्षण के दम पर उंचे पदो पर पहुंचे.. लेकिन खुद को संगठित करना भूल गए। मुझे लगा था कि जो आंगे बड़ गए है वो एक ऐसा कारवां बनायेंगे जिससे पीछे छूटे लोगो के हाथों को पकड़ कर कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए प्रेरित करेंगे, लेकिन लोग तो पूंजीपति सवर्णों और ब्राह्मणों से बी गए गुजरे निकले.. कम से कम वो संगठित विचारधारा में तो रहते है.. लेकिन यहां तो जो पिछड़ा व्यक्ति उंचे पद पर पहुंचा, वो खुद को उन लोगो से काटना शुरु कर देता है जहां से वो खुद कभी आया होता है। ये लोग उन्हें सहारा देने के बजाये घृणा की नजरो से देखने लगे.. और अपनी ही जमीनी हकीकत को भूल गए। संविधान कितना भी अच्छा क्यों न बना दिया जाये, लेकिन उसे लागू करने वाले ही जब बुरे है तो संविधान किसी के लिए अच्छा कैसे साबित होगा।
संविधान केवल एक लिखित किताब है, लेकिन उसका अनुपालन तो हम आप कर रहे है.. संविधान को समझने और उसकी पेचिदगी को गरीब और वंचितों को समझाने की जिम्मेदारी समाज के शिक्षित लोगो के कंधो पर थे, लेकिन अब वो ही उसका गलत इस्तेमाल कर रहे है। अपने लोगो की मदद करने के बजाय उनका ही खून चूसना शुरु कर दिया है। जो शिक्षित नही है उन्हें कैसे संविधान में दिये उनके अधिकारों का पता चलेगा.. और जब तक आपको आपके अधिकार ही नहीं पता होंगे आप न्याय के लिए कैसे लड़ेगे। बाबा साहब ने कहा कि उन्होंने सदैव न केवल दलितों औऱ वंचितो के लिए बल्कि भारत की हर महिला के लिए आवाज उठाई.. कानून लाने की भी कोशिश की लेकिन उसका नतीजा ये हुआ कि उन्हें पूरी तरह से अलग थलग कर दिया गया। उन्हें कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा.. ये सब हुआ क्योंकि वो अछूत जाति से थे।
संसद से लेकर सड़क तक, सभी जगह पर जातिगत भेदभाव के कारण समाज के एक बड़े धड़े को दबाया जाता है.. लेकिन मुझे उम्मीद थी कि हमारा समाज शिक्षित होकर इस भेदभाव को खत्म करने का प्रयास करेगा.. लेकिन वो कितने गलत थे। इस खाई को तो हमारे समाज के शिक्षित लोगो ने और बढ़ा दिया है। मैंने तुम्हें वोट का अधिकार दिया है लेकिन ये ताकत क्या क्या कर सकती है उसके बारे में तुम्हें कौन जागरूक करेगा.. क्योंकि इस जागरूकता के अभाव में और लालच में कीमती वोट को आसानी से खरीदा और बेचा जाता है.. आखिर इसका जिम्मेदार कौन है। तुम तो खुद ही सामाजिक रूप से एकजुट नहीं हो, तो तुम कैसे उनसे लड़ोगे जो सदियों से भेदभाव कर रहे है। पढ़े लिखे दलितों ही बराबरी की इस लड़ाई में उनकी सबसे बड़ी हार के कारण बने। बाबा साहब की ये बात आज भी सही साबित हो रहा है। आरक्षण के दम पर कुछ लोग मजबूत हो गए है तो कुछ लोग आज भी हाशिये पर है.. और उनकी फिक्र खुद उनके ही लोग नहीं करते है।



