जब चितौड़ के रानी बन गई छोटी जाति के संत रविदास की अनुयायी, 700 ब्राह्मणों के सामने सीना चीर कर दिखाया था दिव्य जनेऊ

Saint Ravidas
Source: Google

सिखों के पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब में गुरुओं की वाणियों के अलावा 15 संतो की भी वाणि है… जिसमें से एक है संत रामदास। भक्ति परंपरा के एक ऐसे संत, जिन्होंने सिख धर्म के आने से पहले खुद दलित परिवार में जन्में होने के बाद भी उन्होंने ये माना था कि बाहरी आंडबरों और अंधविश्वास के दम पर आपकी भक्ति नहीं आंकी जा सकती है बल्कि भक्ति को आपके सच्चे मन से होनी चाहिए.. उनकी इस वाणियों ने सिख गुरुओ को भी प्रभावित किया था वहीं साथ में संत रामदास ने ये भी बताया कि आप किस जाति से है, वो आपकी भक्ति का दायरा तय नहीं करते है।

बल्कि आपका मन कितना पवित्र है, आपकी भक्ति कितनी सच्ची है, ईश्वर केवल आपकी श्रद्धा देखता है, वो आपका बाहरी आंडबर नहीं देखता है.. संत रविदास के इस संदेश ने चितौड़ की महारानी तक को प्रभावित किया था, और वो खुद संत रविदास जी की अनुयायी बन गई थी.. लेकिन जब उन्होंने संत रविदास को अपने महल में भोज के लिए बुलाया तो ब्राह्मणों को एक छोटी जाति जो जनेऊधारी नहीं है, उनके साथ खाना गवारां नहीं था..और तब संत रविदास ने वो किया..जिसे देखने के बाद 700 ब्राह्मणों ने उनके आगे नतमस्तक हो कर क्षमा याचना की थी। आईये जानते है क्या किया था संत रविदास ने, जिसने ब्राह्मणों को झुका दिया।

स्वामी रामानंद को अपना अध्यात्मिक गुरु चुना

संत रविदास जी, जिन्हें रैदास भी कहा जाता है..उनका जन्म 1337 में माघ पूर्णिमा के दिन काशी में  संतोख दास और कलसां देवी के यहां हुआ था। वो मोची जाति से थे और उनका परिवार चमड़े के जूते बनाने का काम करता था, जिसे संत रविदास ने भी आगे बढ़ाया था। रविदास जी एक पिछड़ी जाति से थे, इसलिए आध्यत्मिक ज्ञान के लिए उन्होंने गुरु स्वामी रामानंद को अपना अध्यात्मिक गुरु चुन लिया था. ‘भक्तमाल’ और ‘रत्नावली’ ग्रंथ जिसमें संत रविदास के बारे में जानकारी है, उनके अनुसार संत स्वामी रामानंद उनके गुरु थे। संत रविदास मानते थे कि आपका मन पवित्र हो तो गंगा एक छोटे से पात्र में भी खुद प्रकट हो जाती है।

रविदास को अपने महल में आमंत्रित किया

संत रविदास जी ने भक्ति को सर्वोपरि माना और जातिपात के बंधनो को तोड़ कर समानता की भावना को बढ़ावा दिया था। उनकी प्रसिद्धि धीरे धीरे काशी से बाहर निकली और चितौड़ की महारानी स्वयं संत रविदास जी के दर्शन करने पहुंची और संत सविदास की आभा देखकर उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी.. उन्होंने संत रविदास को अपने महल में आमंत्रित किया ताकि वो महाराज से उन्हें मिलवा सकें.. और संत रविदास को महाभोज करा सकें.. इसी के साथ महारानी ने 700 ब्राह्मणों को भी आमंत्रित किया था, लेकिन ब्राह्मणों को एक चर्मकार के साथ बैठकर भोजन करना अपना अपमान लगा।

उन लोगो ने कहा कि जनेऊधारी ब्राह्मणों के बीच एक जूते बनाने वाला कैसे बैठ सकता है, बिना गुरु के शिक्षा लेने वाला व्यक्ति भला कैसे किसी को दीक्षा दे सकता है..  लेकिन जब ये बात शंकराचार्य को पता चली तो उन्होंने कहा कि रविदास का जीवन संतो की सेवा करते करते संतमय हो गया है, वो संत बन चुके है और संतो की कोई जाति नहीं होती है, वो भगवान के समान सामान है। इसलिए वो दीक्षा देने के अधिकारी है।

ब्राह्मण समाज में बैठ कर खाना खाना गंवारा नहीं

लेकिन ब्राह्मणों को संत रविदास जी के तब भी जनेऊधारी न होने से उनके ब्राह्मण समाज में बैठ कर खाना खाना गंवारा नहीं थी। बढ़ता विवाद देख कर एक उपाय निकाला गया। ब्रहामणों ने एक भगवान की मूर्ति रख कर शर्त रखा कि जिसकी श्रद्धा से भगवान की मूर्ति चल कर जिसके पास पहले जायेगी, तो वो ही सच्चा ब्राह्मण होगा। जहां एक तरफ ब्राह्मण संस्कृत भाषा में वेदों को पढ़ रहे थे तो वहीं संत रविदास रो रहे थे और भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि वो किसी का गुरु नहीं बनना चाहते है, भगवान ने उनका भाव देखा, और मूर्ति खसकती हुई संत रैदास के पास पहुंच गई.. और संत रैदास की जय जयकार होने लगी।

गुरु ग्रन्थ साहिब में संत रविदास के 41 पद

लेकिन फिर भी ब्राह्मणों ने कहा कि गुरु होने के लिए यज्ञोपवित संस्कार के बंधन में बंधना आवश्यक है, और संत रविदास इस बंधन में नहीं बंधे है..जिसके बाद संत रविदास ने गंगा मैया को याद किया और सीना चीर कर जनेऊ को निकाला.. जो उनके पवित्र पावन होने का साक्ष्य था।  सभी ब्राह्मणों ने अपनी सोच के लिए और संत रविदास को नीच देखने के लिए क्षमा याचना की..संत रविदास ने केवल पवित्र मन से भक्ति को बढ़ावा दिया था, जिनके विचारों को सिख गुरु भी मानते थे। गुरु ग्रन्थ साहिब में संत रविदास के 41 पद हैं जो इनके ही 16 रागों मे संकलित हैं।

संत रविदास ने बताया कि वो बाहरी आंडबरों और पाखंडो पर नहीं बल्कि सच्ची श्रद्धा पर भरोसा करते है। उस ईश्वर की साधना करते है जो सबको एख समान समझता है। आज भी सिख धर्म में रविदासिया समाज है, जो अलग धर्म को मानता है और संत रविदास के बताये रास्ते पर ही चलते है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *