358 BNS in Hindi: हम अक्सर खबरों में पढ़ते हैं कि IPC के तहत दर्ज कोई मामला किसी व्यक्ति के खिलाफ लंबे समय से लंबित है; और यद्यपि अब उस पर BNS के प्रावधान लागू हो चुके हैं, फिर भी वह मामला अभी तक बंद नहीं हुआ है और अब भी जारी है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन मामलो में BNS का कौन सा सेक्शन लागू होता है? तो चलिए हम आपको बताते हैं, अगर ऐसा किया जाता है तो भारतीय न्याय सहिंता (BNS) का सेक्शन 358 लागू होता है। तो चलिए इस आर्टिकल में जानते हैं कि ऐसा करने पर कितने साल की सज़ा का प्रावधान है और BNS में इसके बारे में क्या कहा गया है।
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धारा 358 क्या कहती है? BNS Section 358 in Hindi
जैसा कि आप जानते हैं, कानून की अलग-अलग धाराएँ अलग-अलग कृत्यों और दंडों का प्रावधान करती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि BNS (भारतीय न्याय संहिता) की धारा 358 क्या कहती है? यदि नहीं, तो आइए जानते हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 358 (जो CrPC की पुरनी धारा 319 के समतुल्य है), न्यायालय को यह अधिकार देती है कि वह अभियुक्त के अलावा किसी भी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही करे—जो विचारण या जाँच के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों से यह प्रतीत होता हो कि उसने भी अपराध करने में भाग लिया है—और ऐसे व्यक्ति को सह-अभियुक्त के रूप में जोड़ ले।
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BNS section 358 Important points
- आपको बता दें, यह धारा 1860 के पुराने कानून (IPC) को निरस्त करती है, लेकिन यह सुनिश्चित करती है कि पुराने कानून के तहत मौजूदा मामले और अधिकार नए संहिता के अंतर्गत भी मान्य बने रहें।
- वही BNS की धारा यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भी वास्तविक अपराधी केवल इसलिए न बच निकले, क्योंकि उसका नाम दर्ज नहीं किया गया है।
BNS section 358 example
मान लीजिए कि 2022 में मोहित नाम के किसी व्यक्ति के खिलाफ मारपीट का एक मामला दर्ज किया गया था, और इस पर मुकदमा अभी भी अदालत में चल रहा है। चूंकि यह अपराध उस समय किया गया था जब IPC लागू थी, इसलिए मोहित के मामले की जांच—और साथ ही उसे मिलने वाली सज़ा—पूरी तरह से IPC के प्रावधानों के आधार पर ही तय की जाएगी, न कि BNS के तहत। यह धारा एक ‘संक्रमणकालीन व्यवस्था’ (transitional arrangement) के रूप में कार्य करती है, जिसे न्यायिक प्रणाली के भीतर किसी भी प्रकार के कानूनी शून्य को रोकने के लिए डिज़ाइन किया गया है; इस प्रकार, यह सुनिश्चित किया जाता है कि लंबित मामलों में न्याय की प्रक्रिया बिना किसी रुकावट के जारी रहे।



