अंबेडकर का वो संघर्ष जिसे इतिहास भूल गया, जब एक रात ने बदल दी संविधान निर्माता की पूरी जिंदगी।

Sayajirao Gaekwad and Ambedkar,
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साल 1917, लंदन की कंपाकपा देने वाली सर्दियों के बीच एक लाइब्रेरी में बाबा साहब अंबेडकर ने पहली बार एक अंग्रेजी चौकीदार के सामने ये कहा था कि वो भले ही अकेले है, लेकिन दलितो के लिए सम्मान और समानता की इस लड़ाई को चिंगारी देने के लिए काफी है, ठीक वैसे ही जैसे सूरज अकेला होकर भी पूरी दुनिया में रोशनी फैलाता है.. वैसे ही बाबा साहब वो दिया बनना चाहते है जो जातिवादी और छुआछूत की आंधी में भी बिना बुझे उन आंधियों से लड़े और विजय प्राप्त करें। बाबा साहब अंबेडकर बचपन से ही  मेधावी छात्र थे, लेकिन किसी ने ये नहीं सोचा था कि बाबा साहब का जूनून ऐसा होगा कि वो 8 साल में पूरा होने वाला कोर्स मात्र 2 साल 3 महीने में पूरा कर लेंगे।

जातिवाद छुआछूत की गुलामी से आजाद

इतना ही नहीं इस कोर्स के साथ उन्होंनें बैरिस्टर की डिग्री भी हासिल की थी.. लेकिन ये शिक्षा उतनी आसान नहीं थी, समय कम था और काम ज्यादा.. देश का एक तबका इंतजार कर रहा था अपने मसीहा का, जो सालों पुरानी बेड़ियों को तोड़ कर उन्हें केवल अंग्रेजी हुकमत की ही नहीं बल्कि जातिवाद छुआछूत की गुलामी से भी आजाद करायेगा। लेकिन उनके उस सपने को तब धक्का लगा जब अचानक उनकी स्कॉलरशिप बंद कर दी गई.. फिर कैसे बाबा साहब ने अपने थिसीज पूरे किये.. कैसे बाबा साहब ने मात्र 24 घंटे में उस सपने को पूरा किया था।

क्या हुआ था 1916 में?

1915 में बाबा साहब ने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में Ancient Indian Commerce पर शोध कार्य पूरा किया था, जिसके बाद अक्टूबर 1916 में वो लंदन चले गए थे, जहां उन्होंने ग्रेज़ इन में बैरिस्टर कोर्स में दाखिला लिया, साथ ही लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में भी भारत का राष्ट्रीय लाभांश – एक ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक अध्ययन यानि की National Dividend of India – A Historical and Analytical Study की थिसिज पर काम शुरु किया था, लेकिन तब तक बाबा साहब की बड़ौदा सियासत से स्कॉलरशिप रोक दी गई, जिसके बाद मजबूरन 1917 में बाबा साहब को वापिस आना पड़ा था। लेकिन उससे पहले लंदन में बाबा साहब ने वो किया जिसे भारत के बेहतर भविष्य के लिए बेहद जरूरी माना गया।

बड़ौदा रियासत ने छात्रवृति बंद

दरअसल बाबा साहब अपनी थिसीज को हर हाल में जल्द से पूरा करना चाहते थे, लेकिन उन्हें पता था कि उनके पास समय ज्यादा नहीं था, वहीं उनका National Dividend of India थीसिज पूरा करने में 8 सालों का समय लगता, लेकिन उन्हें ये भी डर था कि कहीं उनकी स्कॉलरशिप बंद न हो जाये, और आखिर हुआ भी ये ही.. 1917 में बड़ौदा रियासत ने छात्रवृति बंद करने की चिट्ठी बाबा साहब के पास पहुंचाई थी… जिसके बाद बाबा साहब के पास अपनी थिसीज लिखने के लिए मात्र 24 घंटे ही थे, औऱ तब बाबा साहब ने रात भर जाग कर उस कड़कड़ाती ठंड में कंपकपाती हाथों से अपनी थिसिज का अंतिम अध्याय लिखा था।

क्या हुआ था उस रात को?

दरअसल अक्टूबर 1917 की उस कड़कड़ाती ठंड मे बाबा साहब को केवल एक दिन मिला था अपनी थिसिज को पूरा करने के लिए। बाबा साहब लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स की लाइब्रेरी में छोटी सी रोशनी के नीचे बैठ कर ठंड से कपाते हाथों को बार बार रगड़ रहे थे, औऱ फिर तेजी से कुछ शब्द पन्नो पर उतार रहे थे, उनके आसपास किताबों का अंबार लगा था, शरीर दो दिनो से ठीक से न खाने के कारण कमजोर हो गया था लेकिन इरादे हिमालय की तरह अडिग और मजबूत थे,

वो जानते थे कि  अगर आज ये पूरा नहीं किया तो लाखों दलितों का सपना भी आज रात को टूट जायेगा, बाबा साहब केवल अपने लिए नहीं लड़ रहे थे बल्कि भारत के उस समाज के लिए नई सुबह की नींव डाल रहे थे जो बदलते भारत को परिभाषित करता। बाबा साहब जानते थे कि वो सो नहीं सकते, नहीं तो लाखों लोगो के सपने भी खत्म हो जायेंगे।

भारत की तरक्की औऱ ब्रिटिश हुकुमत

बाबा साहब की एक ही जिद थी, कि वो भारत की उस ब्राह्मणवादी समाज को करारा जवाब दे सकें कि बुद्धि और ज्ञान किसी एक जाति विशेष की जागीर नहीं है, उस पर सभी का अधिकार है। बाबा साहब की कलम एक तलवार की तरह शब्दों को पन्नों पर काट रहे थे। बाबा साहब की थिसिज भारत की तरक्की औऱ ब्रिटिश हुकुमत के मुंह पर करारा तमाचा जड़ने वाला है। ठंड के शांति में तभी लाइब्रेरी में एंट्री हुई बूढ़े चपरासी की.. जिन्होंने बाबा साहब को अजीब लहजे में कहा कि वो इतना पढ़ कर क्या करेंगे जब जाना उन्हें गुलाम देश में ही है.. लेकिन बाबा साहब जानते थे कि उन्हें अंग्रेजी हुकुमत की गुलामी से ज्यादा आजादी चाहिए सदियों से चली आ रही जातपात और छूआछूत की कुरीति से.. जिसके कारण वो शारीरिक रूप के साथ साथ मानसिक रूप से भी गुलाम हो गए थे।

बाबा साहब की भूख और थकान

बाबा साहब काम करते गए.. लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया बाबा साहब की भूख और थकान दोनो बढ़ने लगी और आखिरी अध्याय अब भी बाकी था.. फिर भी बाबा साहब की आँख लग ही गई.. लेकिन तभी वो अचानक उठ गए.. जिसका कारण था एक सपना.. जिसमें उन्होंने भारत के लाचार लोगो को देखा जो बड़ी उम्मीद से उनकी तरफ देख रहे थे। बाबा साहब ने अपने मुंह को ठंडे पानी से धोया और अंतिम अध्याय लिखना शुरु किया। सुबह साढे 5 बजे तक उन्होंने उसे पूरा किया.. और तब वो थिसिज को इक्ट्ठा करके नए सूरज की तऱफ देखने लगे.. जो नई उमंग और नए सपनो का सूरज था। लाइब्रेरी सूरज की रोशनी से जगमगा रही थी जैसे बाबा साहब के सपने जगमगाने वाले थे।

बाबा साहब की थीसिज ने भारत को एक नई दिशा

बाबा साहब वहां से सीधे वापिस भारत आने वाले जहाज पर बैठ गए.. इस वादे के साथ कि वो फिर से लौटेंगे अपने इस सपने को पूरा करने के लिए जो उन्होंने करोड़ो भारतीयों के लिए देखा था। 1920 में बाबा साहब को फिर से मौका मिला लंदन जाने का जहां उन्होंने अपनी थिसीज को पूरा किया था.. और 1923 में बैरिस्टर बन कर लौटे थे। बाबा साहब की थीसिज ने भारत को एक नई दिशा दी थी।

उन्होंने ब्रिटिश हुकुमत की भी नीतियों को चुनौती दी थी..उनके ज्ञान ने ही उन्हें संविधान निर्माता बनाया है। उन्होंने न केवल अपने हिस्से का अंधेरा हटाया बल्कि लाखों करोड़ो लोगो का अँधेरा भी खत्म किया था। आपको ये वीडियो कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

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