Top 5 Dalit news: दलितों के लिए अगर न्याय की आवाज भी उठाई जाती है तो वो उनका गुनाह कैसे बन जाता है। सरेआम उन्हें धमकी दी जाती है। उनकी बहू बेटियां को बेइज्जत किया जाता है। क्या वाकई में दलितों का अपना कोई सम्मान नहीं है। तो चलिए आपको इस लेख में पिछले 24 घंटे में दलितों के साथ होने वाले घटनाओं के बारे में बतायेंगे जिसे जानने के बाद आप भी ये सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि आखिर वाकई में हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते है।
भीम आर्मी चीफ पहुंचे केतललाल के घर
1, दलितों से जुड़ा पहला मामला टिहरी गढ़वाल में हॉनर किलिंग का शिकार हुए मृत युवक केतनलाल हत्याकांड के बाद पीड़ित परिवार से आखिरकार भीम आर्मी चीफ चंद्र शेखर आजाद को मिलने दे दिया गया है। 28 जून को आजाद ने पहली कोशिश की थी लेकिन हरिद्वार में ही पुलिस और पारा मिलिट्री के फोर्स ने इन्हें जबरन रोक दिया था, यहां तक कि हाथापाई के कारण आजाद की शर्ट फट गई थी, जिसके बाद आजाद धरने पर बैठ गए थे, लेकिन पुलिस के समझाने के बाद मामला शांत हो गया था। प्रशासन ने आजाद को आश्वासन दिया था कि वह 30जून को पीड़ित परिवार से मिल सकते है। जिसे इस बार प्रशासन ने पूरा किया। आजाद आखिरकार पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे।
आजाद को देखने के बाद केतन का पूरा परिवार भावुक हो गया। केतन की बहन ने उन्हें गले लगा रोना शुरू कर दिया।आजाद ने ऐलान किया है जब तक पीड़ित परिवार की पूर्ण सुरक्षा मुहैया नहीं कराई जाती तब तक वो उन्हें साथ ही रहेंगे। बता दें कि आजाद के लिए पीड़ित परिवार से मिलने आसान नहीं था। आजाद को ऋषिकेश-चंबा हाईवे पर भद्राकील तिराहे और नरेंद्रनगर चुंगी बाईपास पर फिर रोका गया था जहां से आजाद को तीन किलोमीटर पैदल बारिश में चलकर हिंडोलाखाल तक पहुँचे जहां से केवल कुछ सीमित लोगों के साथ ही उन्हें पीड़ित परिवार से मिलने की इजाजत दी गई।
आजाद जो कि एक जनता के चुने हुए प्रतिनिधि है उन्हें जनता से ही मिलने नहीं दिया जा रहा है। तमाम कायदे कानून लगा कर उन्हें परेशान किया जा रहा है। तो आखिर सरकार साबित क्या करना चाहती है। शायद यही की पद की कोई वैल्यू नहीं है पहचान तो शायद जाति से होगी।
मऊगंज में आदिवासियों के खिलाफ अवैध कार्रवाई
2, दलितों से जुड़ा अगला मामला है मध्य प्रदेश के मऊगंज का है, जहां जबरन अवैध कार्यवाही करके दलितों और आदिवादियों के घरों को उजड़ने के खिलाफ आदिवासी समाज के लोगों के साथ साथ राष्ट्रीय दलित आदिवासी महासभा ने कलेक्टर ऑफिस का घेराव किया। यहां तक कि ये प्रदर्शन इतना उग्र था कि कलेक्ट्रेट का कामकाज करीब एक घण्टे तक ठप गया गया। दरअसल मऊगंज के झौरा गांव में जब जबरन आदिवासियों के कच्चे मकान गिरा दिए गए जबकि उससे पहले उनके पुनर्वास के लिए भी कोई बंदोबस्त नहीं किया गया।
ऐसे में प्रदर्शनकारियों ने अपील की है उनके पुनर्वास की सुविधा की जाए, वहीं फूल बजरंग सिंह, काली पोखरी, पोखरी टोला और घोघरी जैसे इलाकों में आदिवासियों की स्थिति बेहद दयनीय है। वहाँ सड़के पानी जैसी बेसिक सुविधा भी नहीं है। उन्होंने मांग की है कि वो कई दशकों से यहां रह रहे है कम से कम उनके लिए एक घर तो मुहैया करा सकते है। भूमिहीनों को जमीन दी जाएं ताकि वहां रह रहे परिवारों का जीवन सुधार सकें। अब देखना ये होगा कि इस प्रदर्शन के बाद सरकार का क्या रवैया होगा।
अहमदाबाद में दो ओबीसी समुदाय के बीच तनातनी
3, दलितों से जुड़ा अगला मामला गुजरात के अहमदाबाद से है। बाबा साहब ने कहा था कि जब तक दलित पिछड़े संगठित नहीं होंगे तब तक ऊंची जाति वाले उनका फायदा उठाते रहेंगे। एक ही जाति में होकर अपने समुदाय को श्रेष्ठ बताने की कोशिश में ओबीसी समुदाय के एक दूल्हे को घोड़ी पर नहीं बैठने दिया गया, क्योंकि दूल्हे का परिवार पाटनी (देवीपूजक) समुदाय से था और हमलावर ठाकोर समुदाय के बताए से थे। जो खुद को दूल्हे के समुदाय से ऊंचा मानते है। ये मामला अहमदाबाद के पाटन से है। पीड़िता दूल्हे ने बताया कि पहले उनसे पाटन शहर में जाकर घोड़ी पर बैठ कर पूजा करने का रिवाज पूरा किया था।
उसके बाद वो अपने पत्रक गांव हाजीपुर आया, जहां फिर से बारात निकाली गई लेकिन ठाकोर समुदाय के प्रभाव के कारण पाटनी समुदाय की बारात उनके गांव से होकर निकलती भी है तो पैदल निकलती है, ऐसा ही पीड़ित दूल्हे ने किया था लेकिन बावजूद इसके जब उसने अपने इलाके में घोड़ी पर बैठ कर बारात निकाली तो रामूजी ठाकोर नाम के व्यक्ति ने आकर पीड़ित पर हमला कर दिया। उसे घोड़ी ने नीचे गिरा कर इसके कपड़े फाड़ दिए। जब दूल्हे के परिवार वालों ने बीच बचाव करने की कोशिश की तो ठाकोर समुदाय के कई लोगों ने हमला कर दिया। आरोपियों ने जातिसूचक गालियां देते हुए धमकी दी है कि भविष्य में अगर उनके समुदाय का कोई घोड़ी पर बैठेगा तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे। इस घटना ने ये साबित कर दिया है कि दलितों को बुरी स्थिति के लिए केवल स्वर्ण ही नहीं बल्कि खुद उनके बीच का बंटवारा भी जिम्मेदार है।
जालंधर में जातिगत भेदभाव के कारण काम से निकाला
4, दलितों से जुड़ा अगला मामला पंजाब के जालंधर से है जहां दलित जाति से आने का कारण पहले तो एक युवक से भेदभाव करके उसे काम से निकाल दिया गया और जब एक दलित महिला ने इसका विरोध किया तो उसके साथ धक्का मुक्की की गई। दरअसल इस मामले को लेकर पेंडू मजदूर यूनियन पंजाब के लोगों ने फैक्ट्री मालिक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने पुलिस को जानकारी दी कि मुख्यमंत्री की मेरी रसोई योजना के तहत राशन किट भरने का काम गांव के दलितों को मिला था लेकिन फैक्ट्री के मालिक समेत कुछ जातिवादी आतंकियों ने जानबूझ कर अवैध रूप से दलित मजदूरों को काम से निकाल दिया।
वहीं कम करने वाली एक दलित महिला ने बीच बचाव किया तो उसके साथ हाथापाई की गई, उसे अपमानित किया गया। भेदभाव के कारण काम से बाहर निकालने को लेकर अब यूनियन में काफी रोष है। उन्हें एसएसपी जालंधर देहाती से शिकायत की है कि आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज करने बजाय पुलिस वालों ने भी उन्हें बेइज्जत किया है। उन्हें चेतावनी दी है कि जल्द से जल्द आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही हो, वरना वो जिले के कई जगह पर धरना प्रदर्शन करेंगे। हैरानी की बात है कि प्राइवेट सेक्टर छोड़िये सरकारी कामों में भी जातिगत भेदभाव व्याप्त है तो भला दलितों और पिछड़ों को आर्थिक स्वतंत्रता कैसे मिलेगी।
भीम आर्मी कार्यकर्ता नीशु आजाद को रेप की धमकी
5, दलितों से जुड़ा अगला मामला राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर से है, जहां अपने हक की लड़ाई लड़ रहे दलित समाज की बहु बेटियों के बाहर निकल कर अपना हक मांगने की कोशिश से चिढ़े जातिवादी आतंकी सोशल मीडिया के जरिए उन्हें रेप की धमकी दी रही है। ताजा मामला 14 साल की बच्ची निशु आजाद को लेकर है जिसके पिता पर क्राकरोच जनता पार्टी के धरना प्रदर्शन के दौरान जानलेवा हमला किया गया था। निशु आजाद भीम आर्मी की एक सदस्य है जो दलितों और पिछड़ों के हक में आवाव उठाती है।
वहीं हमलावरों ने निशु को ही निशाना बनाया था लेकिन उसके पिता बीच के आ जाएं हैरानी की बात है कि केवल न्याय और सामाजिक बराबरी की बात करने वाली निशु से इतने बौखला गए है जातिवादी की उसे रेप करने और मरने की धमकी दे रहे है। लेकिन इतना कुछ हो जाने के बाद भी प्रशासन आखिर गंगा बहरा क्यों बना हुआ है। क्या वो वाकई में इंतजार कर रहा है कि निशु के साथ कोई अनहोनी हो, या ये केवल दलित बहू बेटियां की न्याय के लिए उठी आवाज को दबाने की साजिश है।



