भारत के 7 प्रसिद्ध बौद्ध मंदिर, बुद्ध की ज्ञान भूमि से नवयान के पुनरुत्थान तक की पावन यात्रा

Buddha
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Famous Buddhist Temples India: भारत की ही पावन धरती पर न केवल बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध का जन्म हुआ बल्कि बौद्ध का प्रचार प्रसार करने वाले महान सम्राटो को भी बौद्ध धर्म की महानता का ज्ञान हुआ और उन्होंने उसे केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में विस्तार करने के लिए कार्य किया।भले ही 10 सदी के बाद इस्लामिक ताकतों के आक्रमण के बाद भारत में बौद्ध धर्म का पतन हुआ और उससे जुड़े पहचानो को या तो ध्वस्त कर दिया गया या फिर उसे पूरी तरह से बदल दिया गया हो लेकिन वर्तमान में बौद्ध धर्म की महत्ता फिर से बढ़ रही है।

खासकर बाबा साहब अंबेडकर के बौद्ध धर्म अपनाने और नवयान परंपरा को शुरु करने के बाद भारत में बौद्ध धर्म को फिर से नई पहचान मिली.. आज न केवल बौद्ध धर्म को मानने वालों की सख्या बढ़ी है बल्कि कई बौद्ध मंदिर भी है जो काफी फेमस है। अपने इस लेख में हम भारत के 7 फेमस बौद्ध मंदिरो के बारे में जानेंगे.. जो हर एक बौद्ध के लिए काफी खास है।

महाबोधि मंदिर, बिहार– Mahabodhi Temple, Bihar

बिहार के गया में स्थित है महाबोधि मंदिर, ये वहीं स्थान है जहां सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और वो शक्य मुनि गौतम बुद्ध बने थे। यहीं स्थित है बोधि वृक्ष, जिसके नीचे बैठ कर भगवान बुद्ध ने 6 सालों तक तप किया था.और यहीं से शुरु हुई थी बौद्ध धर्म जैसे महान धर्म की। आज ये स्थान यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया जा चुका है। वज्रासन (डायमंड थ्रोन) जैसे बौद्ध चिन्ह है। महाबोधि मंदिर का निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था। इस मंदिर में  पीले बलुआ पत्थर से बनी बुद्ध की विशाल और भव्य प्रतीमा स्थापित है। बौद्ध धर्म को मानने वाले दुनियाभर के लोगो के लिए ये स्थान सबसे पवित्र माना जाता है।

सारनाथ मंदिर, वाराणसी – Sarnath Temple, Varanasi

बौद्ध धर्म के 8 प्रमुख तीर्थ स्थलों में से सारनाथ मंदिर काफी प्रचलित है। ये वहीं स्थान है जहां बुद्ध ने बुद्धत्व को प्राप्त करने के बाद पहला प्रवचन दिया था। यहीं बुद्ध को अपने पांचो पहले शिष्य भी मिले थे। जहां से सही मायने में बुद्ध के विचारों को दुनिया ने पहली बार जाना था। यहीं से “धर्मचक्र प्रवर्तन” की शुरुआत हुई थी और  चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग बताया था।

सारनाथ मंदिर वाराणसी में मौजूद है, जिसे सम्राट अशोक ने ही बौद्ध धर्म अपनाने के बाद करवाया था। इसी स्थान पर धमेख स्तूप, प्राचीन मठों के खंडहर और अशोक स्तंभ भी पाया गया था, जो इसके ऐतिहासिक मूल्यों को और बढ़ा देती है।

वाट थाई मंदिर,कुशीनगर – Wat Thai Temple, Kushinagar

एक ऐसा मंदिर जहां बुद्ध के साथ त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु व महेश) भी पूजे जाते है वो मंदिर है कुशीनगर का वाट थाई मंदिर। कुशीनगर में ही बुद्ध को 80 साल की अवस्था में महानिर्वाण की प्राप्ति हुई थी। आपको जानकर हैरानी की होगी कि पूरी दुनिया में केवल वाट थाई मंदिर में ही हिंदू और बौद्ध धर्म का अनूठा संगम देखा जा सकता है। इस मंदिर का नाम वाट थाई कुशीनारा छरर्मराज है,जो कि थाई राज घराने द्वारा संचालित किया जाता है, जिसे थाई राजघराने ने साल 1994 में निर्माण कराना शुरु किया था।

ये इस वक्त भारत के थाई एंबेसी की ओर से संचालित होता है। 2001 में मंदिर में 1898 में पिपरहवा कपिलवस्तु-सिद्धार्थनगर खुदाई में मिले बुद्ध के अवशेष रखे गए थे और थाई राजकुमारी महाचक्री सिरीन धोर्न ने इसका उद्घाटन किया था। वहीं मंदिर के परिसर मे पिछले 2 दशकों से गरीबों का मुफ्त में न केवल इलाज किया जाता है बल्कि हर रविवार के दिन बच्चो को मुफ्त में शिक्षा दी जाती है।

लाल मैत्रेय मंदिर, लेह – Red Maitreya Temple, Leh

 लेह के ऊंचे पहाड़ों और मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों के बीच तिब्बती बौद्ध परंपरा को दर्शाने वाला लाल मैत्रेय मंदिर  थिकसे मठ का हिस्सा है। इस मंदिर की प्रसिद्धि भगवान बुद्ध की 49 फीट ऊंची प्रतिमा के कारण ज्यादा बढ़ी। लाल मैत्रेय मंदिर को 15वीं शताब्दी के मध्य में राजा त्रगस्पा बुमडे के शासनकाल के दौरान बनवाया गया था। दीवार पर बने अद्भुत भित्तिचित्र, जिसमें  अवलोकितेश्वर, महाकाल और बुद्ध की छवियाँ को इस तरह बनाया गया है जो किसी को भी अपनी ओर आकर्शित कर लेते है।

लेकिन 1950  में डोगरा आक्रमण में मंदिर को काफी नुकसान हुआ था मगर  एंका निकोलाएस्कु ने इसका पुनर्निमाण करवाया था। तिब्बती हेरिटेज फंड बौद्ध धर्म से जुड़े अवशेषों की देखभाल करते है। ये मंदिर केवल भारतीयों के लिए ही नहीं बल्कि तिब्बती बौद्ध अनुयायियों के लिए भी अहम है।

महापरिनिर्वाण मंदिर,कुशीनगर – Mahaparinirvana Temple, Kushinagar

बौद्ध धर्म के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक महापरिनिर्वाण मंदिर कुशीनगर में स्थित है, जिसे बुद्ध के महानतम अनुयायी स्वामी हरिबाला ने  5 वीं सदी में  बनवाया था। कुशीनगर वहीं स्थान है जहां बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ है.. इस मंदिर में भगवान बुद्ध की 6.1 मीटर ऊंची मूर्ति लेटी हुई मुद्रा में रखी है, जो बुद्ध के उस समय के बारे में बताती है जब बुद्ध ने अपने पार्थिव शरीर को त्याग दिया था उनका महापरिनिर्वाण हो गया था। ये मूर्ति  लाल बलुआ पत्‍थर के एक ही टुकडें से बनाई गई है।

स्वर्ण पैगोडा मंदिर, अरुणाचल प्रदेश – Golden Pagoda Temple

बर्मा में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार को दिखाते हुए बर्मी वास्तुकला का एक अनूठा उदाहरण है अरुणाचल प्रदेश के नामसाई जिले में स्थित भव्य स्वर्ण पैगोडा मंदिर। जिसका नाम कोंगमु खाम  है। ये मंदिर 20 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। इस मंदिर का निर्माण विश्व त्रिपिटक फाउण्डेशन ने करवाया है। साल 2010 में बनाये गए इस मंदिर में उस वक्त करीब 3 करोड़ रूपय का खर्च आया था। इस मंदिर का मुख्य आकर्षण इसके 12 विशाल गुबंद है जो कि बर्मी वास्तुकला से सुसज्जित है।

थेरवाद बौद्ध मंदिर, ईटानगर – Theravada Buddhist Temple

अरूणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में बौद्ध धर्म की परंपरा को बढ़ावा देने वाले भव्य थेरवाद बौद्ध मंदिर स्थित है। ये मंदिर ईटानगर के चिंपू क्षेत्र में बना हुआ है जो बेहद शांत और आध्यात्मिकता के करीब ले जाना वाला है। तिबब्त में प्रचलित थेरवाद परंपरा का ये मंदिर तिब्बती वास्तुकला से भी प्रभावित है।

यहां का प्रकृति छटा आने वाले श्रद्धालुओ की साधना के लिए काफी अहम मानी है। यहां एक पार्थना कक्ष औऱ एक बड़ा स्तूप बनाया गया है। इस मंदिर से ईटानगर की खूबसूरत वादियों को देखा जा सकता है। ये यहां का सबसे प्रचलित बौद्ध मंदिर है। ये वो मंदिर है जो न केवल बौद्ध धर्म को बढ़ावा दे रहे है बल्कि हमारी सास्कृतिक धरोहर को भी सहेज रहे है।

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