Dr. B.R. Ambedkar का वो भाषण, जिसने सामाजिक व्यवस्था की बुनियाद पर खड़े किए थे तीखे सवाल

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Dr. B.R. Ambedkar: बाबा साहब एक ऐसी शख्सियत थे जिनसे शिक्षा और ज्ञान के मामले में बहस करने से बड़े बड़े विद्वान भी कतराते थे, क्योंकि वो जानते थे कि बाबा साहब खुद एक ज्ञान का भंडार है, वो एक चलती फिरती लाइब्रेरी है.. उनसे बहस करने का अर्थ था कि अपनी फजीहत करवाना.. इसिलए अक्सर उनकी जाति को लेकर उन्हें कमजोर करने और नीचा दिखाने की कोशिष की जाती थी, लेकिन कहते है कि जो सोना भट्टी की आग में जलकर कुंदन बना है भला उसके आलोचनाओं की आग क्या ही जला पायेगी.. कुछ ऐसा ही बाबा साहब के साथ भी था। बाबा साहब के लाये गए प्रस्ताव हमेशा से देश के हित में होते थे.,. जिन्हें धार्मिक परंपरा और जातिवाद का हवाला देकर आगे बढ़ने से रोक लिया जाता था, लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया जब बाबा साहब अकेले बोलते रहे लेकिन उनका सामना करने की या फिर उनका विरोध करने की हिम्मत कोई जुटा नहीं सकां। अपने इस लेख में हम बात करेंगे बाबा साहब के एक उस ऐतिहासिक भाषण के बारे में जिस पर आज भी मनुवादी बहस करने से डरते है, या मुंह छिपाते है।

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डॉ. अम्बेडकर का ऐतिहासिक भाषण

हम सभी जानते है कि बाबा साहब अंबेडकर के कंधों पर भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी..वैसे को संविधान बनने में पूरे 2 साल 11 महीने और 18 दिनो का समय लगा था, लेकिन 26 नवंबर 1949 को उसे फाइनल रूप देने से पहले संविधान सभा में उसका मसौदा तैयार करके 3 बार पेश किया गया था। इसके लिए 11 सत्र आयोजित किये गए और 114 दिनों केवल संसद में मसौदे पर चर्चा ही हुई.. पहली चर्चा 4 नवंबर 1948 से लेकर 9 नवंबर 1948तक चली थी, दूसरी चर्चा 15 नवंबर 1948 से लेकर 17 अक्टूबर 1949 तक चली थी। जिसमें 7653 संशोधन का प्रस्ताव रखा गया और 2473 पर चर्चा हुई थी औऱ तीसरी बार 14 नवंबर से 26 नवंबर 1949 तक चर्चा हुई और आखिरकार इसे बाबा साहब ने The Constitution as settled by the Assembly be passed’ प्रस्ताव नाम दिया और 26 नवंबर को ही ये पारित कर दिया गया।

जिसके बाद हम सभी जानते है कि 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू कर दिया गया और भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र देश बन गया.. लेकिन बाबा साहब के जिस संविधान पर आज गर्व महसूस किया जाता है। उसे तैयार करने में बाबा साहब ने जो संघर्षों का सामना किया था उसे बाबा साहब ने 26 नवंबर 1949 को संसद में संविधान के पारित होने से ठीक एक दिन पहले 25 नंवबर 1949 को पूरे संसद के सामने बताया.. ये वो भाषण जो आज भी ऐतिहासिक है।

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बाबा साहब ने बोलना शुरु किया.. उनका विषय था राजनीति में उत्तपन्न होने वाला विरोधाभाष, समाजिक लोकतंत्र , राजनैतिक रूप से तो बराबरी होगी लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में अब भी असमानता होगी..सामने बाबा साहब जैसे ज्ञानी थे तो सबने एक गहरी खामोशी से उन्हें सुनना शुरु किया। बाबा साहब ने कहा कि अब से देश लोकतंत्र होगा, सत्ता की ताकत लोगो के हाथों में होगी और एक वोट से किसी का भविष्य तय हो सकता है लेकिन वोट डालना लोकतंत्र की तरफ बढ़ने पर पहला ही कदम है, सच्चा लोकतंत्र तबी मुमकिन है जब सामाजिक रूप से बराबरी होगी। चुंकि भारत के हिंदू बहुल देश है तो जातिगत भेदभाव को लेकर लोगो की सोच में क्या बदलाव आय़ा या आ सकता है, जो देश की तरक्की में सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है, उसका अंदाजा बाबा साहब को भी हो चुका था।

गणतंत्र लागू होने के करीब 76 साल होने के बाद भी समाज नहीं बदला.. उसकी सोच नहीं नहीं बदली. औऱ जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, संविधान भी इसमें कुछ नहीं कर सकता है। लोकतंत्र तभी काम करती है जब जनता खुद सरकार से सवाल करें, उसके कमियों को बतायें.. लेकिन अगर जनता किसी एक को फॉलो करने लगे और अँधभक्तों की तरह केवल उनकी पूजा करते रहे.. अच्छा बुरा बिन कुछ सोचे ही चले तो ऐसी स्थिति में लोकतंत्र कमजोर ही होगा। आज धर्म का इस्तेमाल सत्ता के लिए होने लगा है, जिससे लोगों को बांटना आसान हो गया है। हम तभी सही मायने में स्वतंत्र है जब हम किसी जाति धर्म के कसौटी पर खुद को न तौल कर जो सही है उसके लिए कार्य करें।

समाज में बदलाव तभी होगा जब हम सभी एक जुट होकर, संगठित होकर चले। लेकिन जो डर था वहीं हुआ। आज जैसे जैसे भाषण में बाबा साहब ने समाज को बांटने और राजनैतिक सत्ता पर जातिवाद और धर्मवाद के हावी होने की बात कहीं थी क्या अब ऐसा ही नहीं हो रहा है। जाति और धर्म के नाम पर ही सबसे ज्यादा राजनीति की जा रही है। बाबा साहब ने संविधान दे कर एक कानून तो बना दिया है जो आपके अधिकारो की रक्षा कर सकता है, जो आपको ये बता सकते है कि सवाल कैसे करना है, लेकिन क्या सवाल करना है, और किससे सवाल करना है ये केवल आपका विवेकशील मन बता सकता है। कानून से आप किसी की दकियानूसी सोच को नहीं हरा सकते है। जब तक लोगो की सोच नहीं बदलेगी तब तक ये बंटवारा ऐसे ही लोगो को छलेगा, और उन्हें उनका इस्तेमाल होने देगा। बाबा साहब का ये भाषण भारत के आने वाले भविष्य की रूपरेखा थी, लेकिन दुख की बात तो ये है कि तब उनकी बातों को काफी हल्के में ले लिया गया था। लेकिन ये वो बातें थे जिनपर आज भी कोई मनुवादी बहस नहीं कर सकती है, क्योंकि उनके भाषण का एक एक शब्द आज सत्य साबित हो रहा है।

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