Article 23 and 24: 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और भारत दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र देश बन गया, लेकिन जहां देश की जनता को भारत के गणतंत्र होने की खुशी थी तो वहीं बाबा साहब आंबेडकर ने अपने बनाए संविधान में जो सम्मान और समानता के लिए कानून बनाए थे, वो उसके भविष्य को लेकर विचार कर रहे थे। उन्होंने अपने बनाए इस संविधान में सदियों से शोषण झेल रहे अनुसूचित जाति अनुसूचित जाति और पिछड़ों को भी ये ताकत दे दी थी कि वो अब इस शोषण के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद कर सकें। कहां आजादी से पहले दलितों का शोषण सवर्ण अपना अधिकार समझते थे। वहीं अब दलितों को नज़रे उठा कर विरोध करने का हथियार बाबा साहब ने उन्हें दे दिया था, और इस ताकत का नाम है शोषण के विरुद्ध अधिकार यानी कि right against exploitation। संविधान के अनुच्छेद 23 और 24 में भारत के किसी भी नागरिक को वो अधिकार मिले जो उन्हें अपने साथ होने वाले अत्याचारों से बचा सकता है। अपने इस लेख में हम शोषण के विरुद्ध अधिकार के बारे में जानेंगे। साथ ही कैसे और किसके लिए ये अनुच्छेद काम करता है।
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शोषण के विरुद्ध अधिकार – Article 23 and 24
सविधान के अनुच्छेद 23 औऱ 24 हर एक भारतीय को दिये गए मौलिक अधिकीरों में से एक अधिकार शोषण के विरूद्ध अधिकार के बारे में बताया है। शोषण के विरूध् अधिकार में कहा गया है कि ये दोनो अनुच्छेद भारत के नागरिकों को किसी भी नीजि या सरकारी संस्था को गैरकानूनी रूप से, या अकारण किये जा रहे शोषण से बचाता है। किसी भी व्यक्ति से जबरन बल के माध्यम से या उचित मुआवजे औऱ मेहनताना दिये बिना कार्य करवाना, शोषण कहलाता है। शोषण के विरूद्ध अधिकार के प्रावधानों में जिन बिंदुओ को निषेध करार दिया गया है अगर उनमें से किसी का भी उल्लंघन किया जाता है तो वो अपराधिक गतिविधियों में गिना जायेगा।
संविधान के अनुच्छेद 23 भारत के हर व्यक्ति को अधिकार देता है कि अगर वो मानव तस्करी, बेगार और जबरन श्रम करवाने के शिकार हो रहे है तो वो कानून का सहारा ले सकते है। भारत में मानव तस्करी और जबरन बेगारी कराने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा हुआ है। किसी को जबरन उठाना या उसकी इच्छा के खिलाफ खरीद फरोख्त करना एक गैर कानूनी अपराध है। जिसे अनुच्छेद 23 में निषेध करार दिया गया ।
Article 23 and 24 उपधारा
इसके दो उपधारा है, जिसमें बताया गया है कि कोई भी व्यक्ति किसी की इच्छा के बिना उससे कार्य नही करवा सकता है भले ही उसके बदले उसे पेमेंट ही क्यों न मिल रही हो.. वहीं बिना पैसे दिये कराये जा रहे बेगार को तो पूरी तरह से प्रतिबंध कर दिया गया। प्रतिबंध होने के बाद भी कोई इसका उल्लंघन करता है तो वो कानूनन अपराध माना जायेगा और उसके अपराधिक मुकदमा चलाया जायेगा। वहीं उपधारा 2 में राज्य सरकारों को ये अधिकार दिया गया है कि वो सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जो जरूरी सेवा है वो लागू कर सकते है लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना अनिवार्य है कि सेवा के दौरान धर्म, नस्ल, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।
वहीं अनुच्छेद 23 के अनुपालन में महिलाओं एवं बालिकाओं के अनैतिक व्यापार दमन अधिनियम, 1956, तथा बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 लागू किया गया था, क्योंकि अनुच्छेद 35 संसद को ये अधिकार देता है कि वो अनुच्छेद 23 के अनुसार निषेध किये गए अपराधों में दंडित कर सकने का कानून बनाने का अधिकार है।
अनुच्छेद 24 भारत में बाल श्रम को पूरी तरह से निषेध करार देता है। इसके मुताबिक 14 साल से कम उम्र के बच्चो को किसी भी कारखान, फैक्ट्री या नीजि या सार्वजनिक स्थानो पर मजदूरी करना निषेध है। हालांकि इसमे एक कमी भी है, अनुच्छेद के मुताबिक बच्चों को केवल उन कामो में नहीं नियुक्त किया जा सकता है, जिसमें खतरनाक उद्योगों, कारखानों या खदानों शामिल हो, औऱ उन्हें शारीरिक रूप से नुकसान हो सकता है। हालांकि बच्चों को अपने पारिवारिक व्यवसाय में हाथ बटाने की इजातत है लेकिन वो भी गैर-खतरनाक कार्यें होना चाहिए औऱ उससे उस बच्चे का शिक्षा का अधिकार न छिन रहा हो। ये कानून बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य की रक्षा करने के लिए बनाया गया.. ताकि उनका बचपन नष्ट न हो। बच्चो के बचपन की रक्षा करने के लिए 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 लागू किया गया, जिसके मुताबिक भारत के हर बच्चे जो 6 से 14 साल के है, उन्हें निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है। बच्चों की मजदूरी और बाल श्रम को खत्म करने के लिए Child Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986 भी लाया गया है। अनुच्छेद 23 और 24 भारतीय को एक ऐसे शोषण से बचाता है जो उन्हें समान न होने पर सहना पड़ता है।



