Babasaheb Ambedkar: ये तारीख थी 20 मार्च 1927 .. दलित आंदोलनों के इतिहात में एक ऐसी तारीख जिसे लंबे समय तक याद रखा जाने वाला है। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाड में हजारों की संख्या में चावदार तालाब के किनारे लोग इकट्ठा हुए थे.. इस भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे दलितो के मसीहा बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर… बाबा साहब ने सदियों पुरानी रूढ़ीवादी, जातपात के भेदभाव के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए सवर्णों के लिए बनाये गए चावदार तालाब से पानी पिया। जिसके बाद एक के बाद वहां मौजूद हर एक शख्स ने तालाब का पानी पीकर ये घोषणा कर दी थी कि नदी तालाब किसी की जागीर नहीं…वो सार्वजनिक है.. सबके लिए है.. ये आंदोलन था महाड़ सत्याग्रह.. जिसे चावदार सत्याग्रह भी कहा गया.. लेकिन ये आंदोलन केवल यहीं खत्म नहीं हुआ। सवर्णों को बाबा साहब की इस हिम्मत ब्राह्मणवादी विचारदारा की नींव हिलाने वाली लगी..जिसके कारण दलितों की प्रताड़ित और बढ़ गई, लेकिन बाबा साहब अब पीछे हटने वाले नहीं थे.. ये लड़ाई अब सामाजिक नहीं कानूनी होने वाली थी। अपने इस लेख में आज हम चावदार तालाब से जुड़े उस मुकदमे के बारे में जानेंगे.. जिसे 10 सालों तक बाबा साहब लड़ते रहे थे।
इस सत्याग्रह के करीब 10 सालों के बाद बॉम्बो हाइकोर्ट की अदालत में फिर से भीड़ जमा हुई थी। लेकिन इस बार भीड़ किसी आंदोलन के लिए नहीं बल्कि उस शख्स के लिए खड़ी हुई जो आजीवन दलितों और वंचितो के हक के लिए लड़ रहा था..बाबा साहब अंबेडकर, यहां एक आदोंलनकारी नहीं बल्कि एक वकील थे..और सामने थे सड़ चुकी रूढ़ीवादी व्यवस्था को जबरन बनाये रखने की कोशिश करने वाले सवर्ण और ब्राह्मण.. ये मुकदमा खुद बाबा साहब पर ही थी.. औऱ वकील भी वो स्वयं ही थे।
और पढ़े: Chandrashekhar Azad: सुविधाओं की मांग को लेकर छात्रों का प्रदर्शन, चंद्रशेखर आजाद ने सरकार को घेरा
क्यों किया गया मुक़दमा
1927 में जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए बम्बई विधान परिषद ने एसके बोले की अध्यक्षता में एक नियम लागू किया.. जिसके मुताबिक ब्रिटिश सरकार जिन भी तालाबों औऱ सार्वजनिक स्थानों का संचालन करती है अब से उसका इस्तेमाल बिना किया भेदभाव के समाज का हर व्यक्ति कर सकता है। प्रस्ताव के पास होने के बाद महाराष्ट्र के अलग अलग नगर पालिका में प्रस्ताव को भेजा गया जहां से लोगो की मिली जुली प्रतिक्रिया आई थी, लेकिन महाड़ नगर पालिका को ये प्रस्ताव मंजूर था.. लेकिन शायद ये केवल हाथी के दांतो की तरह ही थी, दिखाने के लिए सब ठीक था, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका विरोध किया गया।
तालाब दलितो को छूने तक नहीं दिया जाता था
सवर्ण चावदार तालाब का पानी किसी कीमत पर दलितो को छूने तक नहीं देना चाहते थे.. लेकिन जब बाबा साहब और दलितों ने पानी को पिया.. तो अफवाह फैलाई गई कि दलितो ने पानी को दूषित कर दिया.. नतीजा सैकड़ो सवर्णो ने दलितो पर हमला कर दिया.. कई दिनो तक ये चलता रहा.. चावदार तालाब का शुद्धिकरण तक किया गया.. लेकिन बाबा साहब इससे हारने वाले नहीं थे इसलिए उन पर केस कर दिया गया.. कि चावदार तालाब सवर्णो की नीजि संपत्ति है कोई सार्वजनिक नहीं, यहां तक कि कोर्ट से ऑर्डर लिया गया कि जब तक मामला कोर्ट में चलेगा तब तक दलित चावदार तालाब का पानी को नहीं छुयेंगे औऱ पहली बार बाबा साहब को अपने लिये मुकदमा लड़ना था। बाबा साहब भी कमर कस चुके थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन दलितों के हक के लिए लड़ने में लगा दिया था भला उन्हें कोर्ट कचहरी और उसकी बढ़ती तारीखो से कौन डरा सकता था।
दस्तावेजो को कोर्ट के सामने पेश किया
मुकदमा शुरु हुआ और सवर्णों के वकील ने हिंदू धर्म ग्रंथो का हवाला देकर दलितों को नीचा दिखाते हुए कहा कि जो तालाब सवर्णों के लिए है, वो अछूतो के छूने से अपवित्र हो जाता है, औऱ चावदार तालाब सवर्णो की संपत्ति है जिसपर सदियों से उनका हक रहा है। बाबा साहब ने अछूतो के साथ उसे छू कर दूषित किया है, जो सवर्णों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली हरकत थी। अब बारी थी बाबा साहब के दलीलों की.. बाबा साहब ने कोई इधर उधर की बातें किये बिना कुछ दस्तावेज सामने रखे, और बोलना शुरु किया.. कानून हमारी भावनाओं, परंपराओ औऱ संस्कृति से नहीं चलता, बल्कि वो चलता है सबूतों और गवाहों पर.. फैक्ट्स पर और उसकी सत्यता पर.. बाबा साहब ने महार नगर निगम के उन दस्तावेजो को कोर्ट के सामने पेश किया, जिसके मुताबिक चावदार तालाब की देखरेख , उसकी साफ सफाई का काम महार नगर निगम ही कर रही थी।
यानी की सरकारी खर्चों पर.. बाबा साहब ने कहा कि सरकारी खर्चा कोई सरकार अपनी जेब से लाती नहीं.. ये आम लोगो का ही दियी हुआ पैसा है, जो टैक्स के रूप में सरकार लेती है.. जब तालाब के रखरखाव का काम जनता के पैसो से होता है तो वो सवर्णों की नीजि संपत्ति कैसे हो गई। फिर तो वो सबके लिए होनी चाहिए.. चाहे किसी भी धर्म का हो या किसी भी जाति का.. तालाब का पानी सबके लिए होना चाहिए.. क्योंकि टैक्स तो सभी देते है.. विरोधी वकीलो ने जिस धर्म की आड़ में तालाब के पानी को सवर्णों का कहा है, वो मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं करता..इसलिए ये धर्म नहीं बल्कि ऐसी कुप्रथा है जो जानवारों को तो तालाब छूने का हक देते है लेकिन इंसानो को ही जाति के नाम पर अलग थलग कर दिया गया। ये मामला चलता रहा और 10 साल बीत गए.. मगर बाबा साहब अपने उसूलो के धनी थे.. वो हार नही मानने वाले थे।
बाबासाहेब की ऐतिहासिक जीत
बाबा साहब ने दलील दी कि पुरानी रूढ़ीवादी प्रथा को कानून का नाम देने के बजाय हमें ये देखना चाहिए की कोई भी प्रथा कानून के मूल सिद्धांत से उपर नहीं है.. न्याय, समानता और शुद्ध अंतरात्मा से किया गया कार्य। न्याय की दृष्टि में सभी समान है और कोई भी फैसला केवल परंपरा के नाम पर नहीं लिये जा सकते है.. जो प्रथा जो इंसानों को जानवरों से भी बदतर समझे, उसे खत्म कर देना ही बेहतर है। बाबा साहब ने सबको चुप करा दिया था.. उन्होंने न केवल वो मुकदमा जीता था बल्कि इंसान को इंसान समझने की लड़ाई में भी जीत हासिल की थी, पूरा कोर्ट बाबा साहब की जयकार से गूंज उठा था.. क्योंकि उन्होंने वो लड़ाई जीती थी, जिसके लिए वो सदियों से लड़ रहे थे। बाबा साहब ने जीत दर्ज सवर्णों की उस व्यवस्था को कारार तमाचा जड़ा था जिसपर वो खोखला अंहकार किया करते थे।



