Why is Dussehra celebrated: भारत एक ऐसा देश है जिसे आप त्यौहारों का देश भी कह सकते है.. चुंकि भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है, इसलिए हर महीने यहां त्यौहारों की सौगात होती है.. चाहे किसी भी धर्म के त्यौहार हो, बड़ी धूम धाम से मनाये जाते है.. लेकिन कुछ त्यौहार ऐसे भी है जिन्हें एक साथ कई धर्म में मनाया तो जाता है लेकिन उनके अर्थ और मनाने का तरीके बिल्कुल अलग होते है। जैसा कि हिंदू धर्म में मनाये जाने वाला दशहरा जिन्हें विजयदशमी कहा जाता है, उनका महत्व बौद्ध धर्म में भी काफी अहम है.. वहीं हिंदू धर्म की परंपराओं और त्योहारों को लेकर बौद्ध धर्म में काफी ऐसी बातें कहीं गई है. जिससे ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या दशहरा वाकई में हिंदू त्यौहार है, या फिर बौद्ध धर्म का इससे कोई गहरा रिश्ता है। जानेंगे विजयदशमी का बौद्ध धर्म से क्या रिश्ता है।
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दशहरा और बौद्ध धर्म का क्या संबंध है?
विजय दशमी को अक्सर लोग दशहरा कहते है और हिंदू धर्म में विजयदशमी को रावण दहन करके अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक कहा जाता है, लेकिन क्या आप ये जानते है कि रावण दहन जैसी परंपरा तो भारत की आजादी से पहले तक थी ही नहीं… जो परंपरा आज की जनता के नशों में भर दी गई है.. वो कुछ दशक पहले थी ही नहीं.. इतिहासकारो की माने तो रावण दहण आजादी के बाद पाकिस्तान से आये शरणार्थियों ने बिहार के रांची में किया था, जो समय के साथ प्रभावशाली होता गया, और फिर ये परंपार 17 अक्टूबर 1953 को दिल्ली में भी शुरु हुई.. तब से ये आज भी जारी है.. लेकिन क्या आप ये जानते है कि विजय दशमी को अशोक दशमी के रूप में तीसरी शताब्दी से ही बौद्ध धर्म में उत्सव के रूप में मनाया जाता है। यानि की विजयदशमी को सही मायने में उत्सव मान कर मनाने की परंपरा बौद्ध धर्म में ही शुरु हुई थी।
विजयदशमी के दिन अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया
इतिहासकारों की माने तो सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद हिंसा छोड़ कर सत्य औऱ अंहिसा के मार्ग पर चलने का फैसला किया जिसके लिए बचपन से उन्हें प्रेरित करने वाले धर्म बौद्ध धर्म को चुना। बुद्ध का मार्ग उन्हें बचपन से शांति प्रदान करता था, उन्होंने इसी रास्ते पर चल कर बौद्ध धर्म को दुनिया में पहुंचाने का फैसला किया..इसके लिए दस दिनों तक हर्षोलास के साथ उत्सव मनाया गया था दसवें दिन अशोक ने पूरे राजपरिवार के साथ पूज्य भंते मोग्गिलिपुत्त तिष्य से धम्म दीक्षा ग्रहण कर ली थी। जिस दिन अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया वो विजयदशमी का ही दिन था, इसलिए बौद्ध अनुयायी इस दिन को अशोक विजयदशमी के रूप में मनाते है। अशोक बौद्ध धर्म के प्रमिख अनुयायियों में गिने जाते है जिन्होंने बौद्ध धर्म को न केवल भारत के कोने कोने में पहुंचाया था बल्कि भारत के बाहर भी अशोक ने ही बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया था।
नवयान परंपरा की शुरुआत भी विजयदशमी
वहीं आधुनिक समय में भी बाबा साहब भीम राव अंबेडकर द्वारा बौद्ध धम्म अपनाने औऱ नवयान परंपरा की शुरुआत करने का दिन भी विजयदशमी का ही था, 14 अक्टूबर 1956 को जब बाबा साहब ने नागपुर की दीक्षा भूमि पर अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना कर नवयान परंपरा की शुरुआत की थी तबउस दिन विजय दशमी ही था। इसलिए नवयान परंपरा को मानने वाले बौद्ध अनुयायियो के लिए विजय दशमी बेहद खास है। मगर बौद्ध धर्म के कमजोर होने के कारण बौद्ध परंपराओं को नजरअंदाज कर दिया गया और उसे सनातन धर्म से जोड़ कर लोगो को बरगलाया गया.. यानि की विजयदशमी को हिंदुओ का पारंपरिक त्यौहार कहने के बजाये बौद्ध पर्व कहा जाना चाहिए..आपकी क्या राय है, क्या जानबूझ कर बौद्ध को कमजोर करने, उनके परंपराओं को खत्म करने के लिए इसे हिंदू त्योहारों में बहुत अधिक मान्यता दी गई. ताकि वोग बौद्ध धर्म से जुड़ी इसकी जड़ो को ही भूल जायें।



