Dr. Ambedkar: बाबा साहब डॉ भीम राव अंबेडकर के संघर्षों का दौर तो उसी वक्त शुरु हो गया था जब पिता के रिटायर होने के बाद उन्हें अपने उसी गांव लौटना पड़ा जहां उनके पिता के ओहदे से नहीं बल्कि उनकी जाति से उनकी पहचान की जाती थी। वैसे तो उनके पिता रामजी सकपाल, ब्रिटिश सेना में हवलदार थे, मगर उससे उनकी जाति की कड़वी सच्चाई नहीं बदल सकी.. लेकिन संघर्ष का दौर और बुरा हो गया जब मात्र 3 साल की उम्र में मां का साया उठ गया।
बचपन की उमंग संघर्ष में बदल गई.. गांव के बच्चों को स्कूल जाते देखा तो खुद भी पढ़ने की इच्छा हुई, लेकिन वो उस बस्ती से आते थे जो अछूतों की कहलाती थी। फिर भला कैसे किसी अछूत को सवर्णों के साथ बैठ कर पढ़ने की इजाजत मिलती.. मगर बाबा साहब भी कम जिद्दी नहीं थे। तमाम शर्ते लगाई गई, तमाम विवाद हुए मगर वो हार नहीं माने। स्कूल भी गए और गांव के पहले मैट्रिक पास करने वाले अछूत भी बने लगा था शिक्षित हासिल करेंगे तो भेदभाव खत्म हो जायेगा, मगर सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। ऐसा क्या हुआ औऱ क्यों.. जिसे बाबा साहब ने अपना सबसे बड़ा दुश्मन माना था।
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गोलमेज सम्मेलन में बाबा साहब अंबेडकर भाग
साल 1930 का समय था, लंदन में आयोजित होने वाले गोलमेज सम्मेलन में बाबा साहब अंबेडकर ने भी भारत के बहुजन समाज का प्रतिनिधि करने का फैसला किया और उन्होंने पहली बार भारत में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और दुर्वव्यावहार को लेकर आवाज उठाई थी.. गोलमेज सम्मेलन में ही बाबा साहब ने पहली बार दलितों के अलग प्रतिनिधि और अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग की। बाबा साहब ने कहा कि हमें अलग निर्वाचन क्षेत्र इसलिए चाहिए क्योंकि वैसे तो हम हिंदू कहलाते है लेकिन हम हिंदू समाज का हिस्सा नहीं है। हिंदू समाज हमें इंसान भी नहीं मानता है,. इसलिए हमारे लिए उनके प्रतिनिधि के खड़े होने से कोई लाभ नहीं है। दलितो को अलग निर्वाचन मंडल होना चाहिए, ताकि वो अपना प्रतिनीधि स्वयं ही चुन सकें।
जान का हवाला देकर जबरन पुना पैक्ट पर हस्ताक्षर करवाया
अगर अछूतो को समाज में बराबरी चाहिए तो राजनैतिक अधिकार होने चाहिए, अंग्रेजो ने उनकी इस मांग को मान भी लिया था, लेकिन वहीं दूसरी तरफ महात्मा गांधी पुणे के य़रवड़ा जेल में अनशन पर बैठ गए.. औऱ उनकी जान का हवाला देकर जबरन पुना पैक्ट पर हस्ताक्षर करवाया गया। जहां दलितों को बराबरी और न्याय भरा समाज मिलने वाला था। वहां बंटवारे का नाम लेकर उनकी मांग को दबा दिया गया.. बाबा साहब काफी दुखी थे, वो जिस लड़ाई को लड़ रहे थे। उन्हें धीरे धीरे समझ आया कि असली दुश्मन आखिर है कौन.. बाबा साहब, जो कि अमेरिका और लंदन पढ़ने गए थे। वहां उन्होंने पहली बार ऐसा समाज देखा था जो भेदभाव और जातिपाति से मुक्त था.. उन्हें तब लगा था कि शायद उनकी शिक्षा ही उन्हें जागरूक बनाती है। कि सबी इंसान है और भेदभाव जैसी भावना का कोई अर्थ नहीं है.. सभी सामान है। इसलिए उन्होंने 32 डिग्रिया हासिल की, 9 भाषायें सीखी.. यानि की एक व्यक्ति जितना शिक्षित हो सकता था।
चोरी छिपे गेस्ट हाउस में रहे बाबा साहेब
उससे कई गुणा ज्यादा बाबा साहब शिक्षित हुए थे, उन्हें उम्मीद थी कि शायद अब उन्हें भारत में बहिष्कार और छुआछूत का सामना न करना पड़े..लेकिन जब वो वापिस लौट कर बड़ौदा रियासत में सैन्य साचिव के उंचे पद पर आसीत हुए तो उनका भ्रम टूट गया। जातिगत भेदभाव को उनकी शिक्षा दूर नहीं कर सकी थी, चपरासी उन्हें अब भी अलग बर्तन में पानी देता था। फाइलों को दूर से ही रख कर चला जाता था, किराये पर जाति के कारण मकान नहीं दिया गया तो चोरी छिपे एक गेस्ट हाउस में रहने लगे। लेकिन जब वहां भी पता चला कि बाबा साहब एक अछूत जाति से है तो किसी ने उनकी शिक्षा और ओहदा नहीं देखा, उनकी जाति देखी और गेस्ट हाउस से बाहर निकाल दिया।
बाबा साहब ने स्वतंत्र मजदूर पार्टी बनाई
धीरे धीरे बाबा साहब को समझ आया कि समाज में कमजोर होने, गरीब होने, अनपढ़ होने आपको भेदभाव का शिकार नहीं बनाता है बल्कि इसका कारण है लोगों की कुंठित सोच.. जातिवादि सोच, और बंटवारे की नीति के कारण ही हिंदू धर्म में भेदभाव व्याप्त है। जब तक इस सोच में बदलाव नहीं आयेगा तब तक उस सामाजिक व्यवस्था को बदलना नामुमकिन है। बाबा साहब ने पहले कमजोर मजदूरों के अधिकारों के लिए स्वतंत्र मजदूर पार्टी बनाई, जो समाज के गरीब और वंचित मजदूरों और किसानों के लिए आवाज उठा रहे थे। उन्होंने ये विश्वास दिलाया कि किसान और मजहदूर देश की नींव है, उनके बिना देश का विकास संभव नहीं है। वहीं दलितों को अधिकार दिलाने के लिए शेड्यूल कास्ट फेडरेशन का गठन किया। दलितों को एकजुट करने की बाबा साहब की ये कोशिश बेहद सराहनीय तो थी लेकिन उंची जाति की पार्टियों को ये कभी मंजूर नहीं था, बाबा साहब पर देश को तोड़ना का आरोप लगा।
कांग्रेस ने बाबा साहब को राजनैतिक शक्ति न देने की पूरी कोशिश
बाबा साहब किसी भी हाल में इन रूकावटो से झुकने वाले नहीं थे, जाहिर है कि दलितों ने पहली बार अपने अधिकारों, सामाजिक बराबरी के लिए लड़ना सीख लिया था., अब लड़ाई बीच में नहीं छोड़ी जा सकती थी, संविधान सभा का हिस्सा बनने के लिए भी उनका संघर्ष कम नहीं था। कांग्रेस के कई कद्दावर नेताओ ने बाबा साहब को राजनैतिक शक्ति न देने की पूरी कोशिश भी की थी.. मगर बाबा साहब जिद पर थे, उनकी जिद के कारण ही उन्होंने दलितों को संविधान के जरिए बराबरी और सम्मान देने का प्रय़ास किया था, लेकिन आजादी के इतने सालों के बाद भी आज जातिगत भेदभाव जारी है, कुछ खास बदलाव नहीं आया है सामाजिक व्यवस्था में.. वजह साफ है जातिय व्यवस्था को लेकर लोगों की सोच। ये सोच ही बाबा साहब की सबसे बड़ी दुश्मन थी..जिससे शायद बाबा साहब चाह कर भी हरा नहीं पाये थे। जो उनके बौद्ध धर्म अपनाने का भी कारण बना था।



