Delhi High Court: हाल ही में राजधानी दिल्ली से जुड़ा एक खबर सामने आई है, जहां दिल्ली हाइकोर्ट (High Court) ने नीजि ऑफिस में जातिगत भेदभाव और टिप्पणी को लेकर बड़ा बयान देते हुए नीजि केबिन में अकेले में की गई जातिगत टिप्पणी एससीएसटी एक्ट के 3(1) (x) के दायरे में नहीं आयेगी.. इसका फैसला सुनाया है।
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निजि ऑफिस में जातिगत टिप्पणी SCST ACT से बाहर
अक्सर ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं कि लोगों को जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करके अपमानित किया जाता है; हालाँकि, अगर कोई व्यक्ति ऑफिस के अंदर किसी दूसरे व्यक्ति के खिलाफ जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल करता है, जब कोई तीसरा व्यक्ति मौजूद न हो—यानी किसी गवाह की गैर-मौजूदगी में—तो यह ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989’ की धारा 3(1)(x) के तहत अपराध नहीं माना जाता है। वही इस मामले को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट जज जस्टिस मधु जैन (Delhi High Court Judge Justice Madhu Jain) ने सीधे कहा कि एससी एसटी एक्ट (SC/ST Act) के दायरे में आने के लिए अपमान सार्वजनिक नजर में होना चाहिए।
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बीएनएस की धाराओं में मामला चलेगा
यानि की अपमान करते समय अलग से भी लोग मौजूद हो..हालांकि ऐसे मामलो में भले ही एससी एसटी एक्ट लागू नहीं होगा लेकिन भारतीय न्याय संहिता की धाराओं में मामला जरूर हो सकता है। एससी एसटी एक्ट एक गैर जमानती प्रावधान है… इसलिए जब तक अपराध उसके क्राइटेरियां में नहीं होता तब तक एससी एसटी एक्ट (SC/ST Act) नहीं लगाया जा सकता है। बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट ने 2008 के एक मामले में ट्रांस वर्ल्ड रेडियो इंडिया (Trans World Radio India) पर कानूनी कार्रवाई के दौरान ये फैसला सुनाया है।
जिस पर एक कर्मचारी ने ऑफिस में जातिगत टिप्पणी का आरोप लगाया था.. जिसका फैसला करीब 18 सालो के बाद आया है। 18 साल बाद ही सहीं कंपनी को राहत मिली है,.. लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि एससी एसटी एक्ट (SC/ST Act) के लिए सार्वजनित तौर पर अपराध होना चाहिए, लेकिन अकेले में की गई टिप्पणी के कारण जो मानसिक आघात होता उसकी भरपाई कौन करेगा।



